आपदा/दुर्घटना

केदारनाथ: आस्था के आंगन में मंडराता भू-वैज्ञानिक संकट

लेखक: प्रो0 महेंद्र प्रताप बिष्ट 

कल मैंने श्री केदारनाथ धाम का एक छायाचित्र साझा किया था, जिसे आप सभी ने ‘आस्था’ के दृष्टिकोण से देखा और सराहा। लगभग 18,000 लोगों तक पहुँची उस पोस्ट पर मिले आपके समर्थन के लिए आभार। किंतु आज, मैं उसी छायाचित्र के माध्यम से एक भू-वैज्ञानिक (Geological) पक्ष आपके सम्मुख रखना चाहता हूँ। यह विश्लेषण केवल शोध नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है।

1. सुरक्षा दीवार और मानवीय हस्तक्षेप: एक विश्लेषण

केदारनाथ मंदिर (ऊंचाई ~22 मीटर) के पीछे आदि गुरु शंकराचार्य जी की समाधि के समीप एक 15 मीटर ऊंची ‘U-आकार’ की सुरक्षा दीवार खड़ी की गई है। भू-वैज्ञानिक दृष्टि से विचारणीय तथ्य यह है कि इसका आधार ग्लेशियर के कच्चे मलबे (Moraine) में मात्र 1.5 मीटर गहरा है।

यही नहीं, इस दीवार के निचले भाग में स्थित उन विशालकाय शिलाखंडों (Boulders) को, जो हजारों वर्षों से वहां प्राकृतिक अवरोधक के रूप में जमे थे, मशीनों और विस्फोटों (Blasting) से तोड़कर समतल मैदान बना दिया गया है। वीआईपी हेलीपैड के लिए भी इसी ‘मोरेनिक मलबे’ को काटकर पहाड़ के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ की गई है।

2. हिमनदों (Glaciers) की विशालता और खतरा

मंदिर के ठीक पीछे दो विशाल हिमनद—चोराबाड़ी (Chorabari) और कंपैनियन (Companion) ग्लेशियर—स्थित हैं। इनकी लंबाई लगभग 7 किमी है। इनके मुहाने (End Moraine) की ऊंचाई हेलीपैड से 165 मीटर और मुख्य मंदिर के आंगन से लगभग 200 मीटर ऊपर है।

इन हिमनदों के मुहाने से मंदाकिनी और सरस्वती नदियों का उद्गम होता है। 2013 की त्रासदी के बाद इन दोनों ने अपना मार्ग बदला है और अब ये मंदिर के नीचे संगम बनाती हैं।

3. ग्लेशियर की संरचना और ‘GLOF’ का भय

एक शोधार्थी के रूप में समझना आवश्यक है कि ग्लेशियर केवल बर्फ का ढेर नहीं है:

  • Moraines (मोरेन): ग्लेशियर अपने साथ भारी मात्रा में मलबा लाता है, जो किनारों पर (Lateral Moraine) और बीच में (Medial Moraine) जमा होता है। यही मलबा कभी-कभी प्राकृतिक बांध बना देता है।

  • Moraine Dammed Lake: जब ग्लेशियर के मुहाने पर झील बनती है, तो उसे ‘मोरेन डैम लेक’ कहते हैं। चोराबाड़ी ताल (गांधी सरोवर) ऐसा ही एक उदाहरण था जो 2013 में टूट गया। आज भी ग्लेशियरों के ऊपर Supra-Glacial Lakes बन रही हैं, जो GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) के खतरे को बढ़ाती हैं।

4. केदारनाथ का भू-वैज्ञानिक अर्थ: ‘दलदल के नाथ

संस्कृत में ‘केदार’ का अर्थ ही ‘दलदल’ है। वैज्ञानिक सत्य यह है कि संपूर्ण न्यू केदारपुरी दो हिमनदों के ‘Outwash Plain’ (नदियों द्वारा बहाकर लाए गए मलबे का मैदान) पर बसी है।

यहाँ ‘Frost Action’ (Freez and Thaw) की प्रक्रिया निरंतर चलती है। मलबे के नीचे दबी बर्फ दिन में पिघलती है और रात में जमती है। मंदिर के पास स्थित ‘उदक कुंड’ (उदक का अर्थ: हिचकी) से निकलने वाले बुलबुले इसी भौतिक प्रक्रिया का प्रमाण हैं कि ज़मीन के भीतर गैस और तापमान का संतुलन निरंतर बदल रहा है।

प्रश्न यह है: जहाँ आधार ही गतिशील और अस्थिर मलबे पर टिका हो, वहाँ कंक्रीट के भारी ढांचे कितने सुरक्षित हैं?

5. प्राकृतिक सुरक्षा चक्र से छेड़छाड़: एक बड़ी भूल

हमने मंदिर के पीछे के उन प्राकृतिक रक्षकों (विशाल पत्थरों) को हटा दिया है जो वेग को कम कर सकते थे। यदि भविष्य में पीछे स्थित 7 किमी लंबे विशाल ग्लेशियर का एक छोटा हिस्सा भी टूटकर नीचे आता है, तो बिना प्राकृतिक अवरोधों के जो मंजर होगा, वह कल्पना से परे है।

प्रकृति के संकेतों को अनदेखी:

वैश्विक तापमान (Global Warming), अनियंत्रित वर्षा और हिमालय की संवेदनशीलता के बीच हम विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के संकेतों को अनदेखा कर रहे हैं। आस्था अपनी जगह है, लेकिन विज्ञान की अवहेलना हमें विनाश की ओर ले जा सकती है।

मेरा उद्देश्य किसी की श्रद्धा को ठेस पहुँचाना नहीं, अपितु अपनी आने वाली पीढ़ी को इस गंभीर संकट के प्रति सचेत करना है।

सावधान रहें, प्रकृति का सम्मान करें।

(लेखक जाने माने भू वैज्ञानिक हैं, जिनको उत्तराखंड हिमालय और उसके गर्भ के चप्पे चप्पे की जानकारी है – एडमिन)


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