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चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल …

अरुण श्रीवास्तव देहरादून-

किसी भी लोकतांत्रिक देश में हर संस्था की भूमिका पर उंगलियां उठना लाजिमी है। फिर तो तड जब हम खुद को दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का ढिंढोरा पीटते हैं, खुद को मदर ऑफ डेमोक्रेसी कहते हैं।
कुछ वर्षों से सुनने को मिल रहा है कि ‘न्याय होना ही काफी नहीं है होते हुए दिखना भी चाहिए’। यह सिर्फ न्यायपालिका के लिए ही नहीं हर संवैधानिक संस्थाओं चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई पर भी लागू होनी चाहिए। यही नहीं सरकारी नियंत्रण में होते हुए भी दूरदर्शन को पक्षपाती नहीं होना चाहिए। चुनाव के समय आयोग के लिए भी जरूरी है कि उसको निष्पक्ष होना ही नहीं निष्पक्ष होते हुए दिखना भी चाहिए। हालांकि हर सरकार चाहे वो कांग्रेस की रही या भाजपा की चुनाव आयोग की पर सवालिया निशान लगाये जाते रहे।
ताज़ा मामला स्पेशल इन्सेंटिव रिपोर्ट (एसआईआर) को लेकर है। 2024 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद आयोग ने आनन-फानन में एसआईआर कराने का निर्णय लिया। हालांकि हर साल रिवीजन का प्रावधान है।
एसआईआर पहली बार हो रहा है। इसके पहले 2023 में आईआर हुआ था। इसकी शुरूआत बिहार से तब हुई जब चुनाव सिर पर थे और सीज़न धान की बुवाई का था। फ़िर देश के तमाम हिस्सों सहित बिहार भी बाढ़ की चपेट में था और काग़ज़ दाखिल करने का समय काफ़ी कम‌। बिहार की अधिसंख्य आबादी पूरे देश में फैली हुई है जो खेती बाड़ी व भवन निर्माण कार्य में लगी है। बिहारवासी एक बार एसआईआर के लिए आएं फिर कुछ समय बाद वोट देने के लिए।
एसआईआर की शुरुआत यूपी, उत्तराखंड, केरलम, तमिलनाडु, बंगाल व पुडुचेरी से भी तो हो सकती थी‌। इन राज्यों में चुनाव 2027 में होने हैं। बहरहाल सुधार के लिए भी काफ़ी कम समय दिया गया और प्रक्रिया भी जटिल थी। उसमें जो कागजात मांगे गए उनमें आधार कार्ड नहीं था जबकि सर्वाधिक लोगों के आधार कार्ड ही है। आधार कार्ड को शामिल कराने के लिए कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी, मामला अब भी चल रहा है। यानी एसआईआर पर सुनवाई भी चल रही है और चुनाव भी हो रहे हैं।
हाल में पांच राज्यों में विधानसभा के लिए चुनाव हुए। बंगाल में केंद्रीय चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट सबका उद्देश्य बीजेपी को कुर्सी दिलाना लग रहा था। पहली बार हुआ कि आयोग ने किसी दल का नाम लेते हुए चेतावनी जारी की। यह भी पहली बार हुआ कि सरकार चुनाव के बीच नारी वंदन अधिनियम ले आई जो कि, तीन साल पहले पास हो गया था। गोया बिल पास होते ही बंगाल चुनाव में लागू कर दिया जाएगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि बिल पेश करने के दो-तीन दिन पहले अधिसूचित हुआ था। बिल पास नहीं हुआ इसका रोना पूरे देश में रोया गया। यूपी और उत्तराखंड की विधानसभाओं में निंदा प्रस्ताव पारित किए गए।
अब एक नज़र कोर्ट के रवैए पर। सुप्रीम कोर्ट के उस बयान पर हंसी आती है कि जो मतदाता छूट गए हैं वो “अगली बार वोट डाल देंगे!” मानो वोटिंग कोई वैकल्पिक खेल हो। इसके पहले भी कोर्ट तरह-तरह की टिप्पणियां करता रहा। कभी आयोग को धमकाता रहा कि, हमें लगा कि एसआईआर ग़लत है तो हम रद भी कर सकते हैं और पुचकारता रहा कि वह स्वायत्तशासी है हम उसे रोक नहीं सकते। माना कि आयोग को कानून ने विशेष अधिकार दिए हैं तो क्या इसमें मनमानी का अधिकार भी है। कानून बनाने का अधिकार विधायिका को है पर यदि वह मूल भावना की हत्या कर रहा है तो न्यायपालिका के पास उसे रद करने का अधिकार भी है। फिर जब कोर्ट ने कहा ऐसे लोगों को हमारे पास ले आएं जो जीवित हैं पर वोटर लिस्ट में मरे दर्शाए गए हैं। याचिकाकर्ता योगेन्द्र यादव सूची में मृत कई लोगों को लेकर गए कोर्ट ने योगेन्द्र यादव के तर्कों की सराहना भी की। इसी बीच राहुल गांधी ऐसे बहुत से लोगों को बुलाकर उनके साथ चाय भी पी जिनके नाम मृतकों की सूची में हैं। ऐसे मामले में भी कोर्ट की भूमिका पल्ला झाड़ लेने वाली रही। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार तोड़ी गई। अदालत ने साफ किया कि, सिर्फ यह मान लेना कि कुछ विधायक नाराज हैं सरकार गिराने का लाइसेंस नहीं है‌। राज्यपाल को राजनीतिक घटनाक्रम के निर्देशक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। अब इसे कोर्ट द्वारा दिया गया उपदेश ही माना जाएगा क्योंकि सजा किसी पक्ष को नहीं मिली लिहाजा शिंदे सरकार ने भी अपना कार्यकाल पूरा किया और चुनाव चिह्न भी उसके पास रहा। कोर्ट के तमाम फैसले विवादास्पद रहे। रहे़ भी क्यों न !!! जब मुख्य न्यायाधीश ही अपने खिलाफ लगे यौन शोषण के आरोप की खुद ही सुनवाई कर फैसला देते हैं‌ तो सवालिया निशान लगेंगे और उंगलियां भी उठेंगी। फिर रिटायरमेंट के बाद किसी आयोग का चेयरमैन बनना, राज्यसभा में जाना सवालिया निशान तो लगायेगा ही‌‌। अब राम जन्मभूमि के फैसले को ही लें। कोर्ट ने माना कि विवादित ढांचे को गिराना आपराधिक कृत है पर इस अपराध के लिए किसी को सजा नहीं दी गई।
वापस मुद्दे पर कर्नाटक में संवाददाताओं के सामने चुनाव में गड़बड़ियों को उजागर किया बावजूद इसके उनके तर्कों को आयोग ने स्वीकार नहीं किया। राहुल गांधी ने संवाददाताओं को बुला कर स्क्रीन पर दिखाया कि किस तरह से एक कमरे वाले मकान में सैकड़ों लोगों के नाम दर्ज हैं। एक विदेशी मॉडलर की तस्वीर एक से अधिक बार चस्पा है, नाम और पते में थोक में गड़बड़ियां हैं। किसी एक की शिकायत पर दर्जनों लोग सूची से बाहर निकल दिए गए। एक शिकायतकर्ता ने तो ‘ब्रह्म मुहूर्त’ में कई लोगों के नाम कटवाए।
बंगाल में हुए एसआईआर में कथित धांधली को लेकर ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं और अपना पक्ष रखा। केंद्रीय कर्मचारियों की बड़ी संख्या में नियुक्ति व बड़े पैमाने पर सुरक्षाबलों की तैनाती को रेखांकित किया। उनके अनुसार अन्य चार राज्यों की अपेक्षा अकेले बंगाल में कई गुना ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात थे। बावजूद इसके कोर्ट से उन्हें फटकार मिली जो की आयोग के लिए शह थी।
ज्यादातर मामलों में चुनाव आयोग और कोर्ट ‘धृतराष्ट्र’ बने रहे। यही हाल ईवीएम को लेकर भी रहा। मतदान के बाद ‘सुरक्षा’ में रखी गई ईवीएम जब मतगणना के दिन खोली गई तो 90 फीसद बैट्री चार्ज मिली। वीवीपैड से निकली पर्ची का शत-प्रतिशत मिलान न करना, मतदान पूर्व प्रदर्शन के दौरान किसी भी बटन दबाने पर वोट बीजेपी प्रत्याशी को जाना दर्शाता है कि सब कुछ मैनेज है।
इन सबसे ऐसा लगता है कि गुलामी का दौर चल रहा, जहां स्वायत्त संस्थाएं तक सत्ता की कठपुतली बनीं हुईं हैं। ईडी और सीबीआई भूमिका पर एक नहीं दर्जनों बार सवालिया निशान लगे पर नतीजा इस बार भी ‘ढाक के तीन पात’ रहा। टीएमसी की चुनाव व्यवस्था देख रही संस्था के निदेशक को ईडी ने गिरफ्तार कर लिया, फिर वोटिंग के बाद रिहा कर दिया गया। इसी तरह चुनाव से पहले कांग्रेस के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया था और तुर्रा यह कि हम लोकतांत्रिक देश हैं।
एक समय था जब बंगाली समाज को प्रगतिशील सोच के लिए जाना जाता था, लेकिन अब स्थितियां बदली हुईं नजर आती हैं। कहते हैं कि बंगाली समाज अपने समय से पचास साल आगे की सोचता है। पर इस चुनाव में हिंदी पट्टी की तरह बात बात में जिस तरह से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए जा रहे हैं उससे तो ऐसा लगने लगा है कि ये वो बंगाल नहीं है जहां के लोग पचास साल आगे की सोचते रहे हों। राम मर्यादा के प्रतीक हैं। जरा जरा सी बात पर ‘जय श्रीराम’ का नारा सुन कर ऐसा लगता है कि लोगों को डराने के लिए लगाया जा रहा है। इस बार के चुनावी हालात को देख कर ऐसा लगता है कि केंद्रीय चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट सबका उद्देश्य बीजेपी को कुर्सी दिलाना लग रहा है। केंद्र से भेजे गए एक आब्जर्वर एक समुदाय विशेष के प्रभावशाली व्यक्ति के घर के करीब कैमरे के सामने धमकाते हुए देखे गए। आब्जर्वर का रोल चीजों पर नज़र रखने की होती है न की सक्रिय भूमिका निभाने की। अब चुनाव आयोग इसे संज्ञान में लेकर संबंधित अधिकारी को दंडित करेगा क्या? भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी यही आरोप लगा था कि चुनाव में उन्होंने सरकारी अधिकारी की मदद ली थी। क्या आपातकाल हटने के बाद से अब तक हुए और खासकर बंगाल चुनाव में सरकारी एजेंसियों व अधिकारियों की मदद नहीं ली गई ? चुनाव आयोग का दोहरा चरित्र तो इससे भी झलकता है कि जब तेजस्वी यादव के पास दो-दो वोटर आईडी की बात सामने आई तो उसके मुखिया ने संवाददाता सम्मेलन कर तेजस्वी यादव की जमकर क्लास ली पर जब ऐसा ही मामला उप मुख्यमंत्री रहे विजय सिन्हा के लिए आया तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जुबान जैसे तालू से चिपक गई हो। यही नहीं जुबान तालू से तब भी चिपक गई जब भाजपा सांसद राकेश सिन्हा ने दो-दो जगहों पर वोट डाले थे जो कि असंवैधानिक है‌। बावजूद इसके चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की।
क्या ये लोकतंत्र है या बीजेपी का निजी ड्रामा? इन सबको देख ऐसा लगता है कि देश में गुलामी का दौर चल रहा है जहां स्वायत्त संस्थाएं तक सत्ता की कठपुतली बनी हुई हैं। क्या यही लोकतंत्र है जिसमें पांच साल में एक बार ‘कथित’ लोकतंत्र की रक्षा जनता के हाथों में आती है। यानी वोट डालो, उंगली में स्याही लगवाओ फिर सेल्फी लो सोशल मीडिया पर डालो और घर जाकर अगले पांच साल का इंतजार करो। कहने को हम सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं पर अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार नहीं है। चुनाव आये तो उसके खाते में कुछ रकम डाल कर, किसान सम्मान निधि की किश्त जारी कर,महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाओं के टुकड़े फेंककर भरमाया जाता है।
हालांकि भरमाया तो तब भी जाता था जब गांव के गरीब गुरबा को एक दारू की बोतल, कंबल व कुछ पैसे नक़द देकर उसका मत लूटा जाता था। पर जो चीज पहले गलत थी और तत्कालीन विपक्ष उसकी निंदा करता था वही अब उसी प्रकार के चोर रास्ते अपनाता है और तब का सत्ता पक्ष अब उसे ग़लत ठहराता है। अब वो दिन लद गए जब जनता वोट की चोट से सरकार बदल सकती थी या फिर कहें कि लोकतंत्र था और लोकतंत्र में निर्णय जनता के वोट से होता था अब ऐसा कुछ नहीं है। मौजूदा परिस्थितियों में जीतेगा वही जिसके साथ देश को लूटने वाले उद्योगपति, पूंजीपति तमाम एजेंसियां और चुनाव आयोग साथ में खड़ा हो। बस इलेक्शन के समय दिखावे के लिए फ्री का प्रलोभन देना होगा। मुफ्त रूपी रेवड़ियां बांटनी होंगी। इन सबको देख कर तो ऐसा लगता है कि अब जनता के वोट की वैल्यू ही क्या बची। सत्ता परिवर्तन जनता के हाथ से काफी दूर जा चुकी है। जिसके भयानक परिणाम भविष्य में देखने को मिल सकते है. (लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं, जिनसे एडमिन की सहमति जरूरी नहीं है। — एडमिन )

 

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