ब्लॉग

नारद जी जैसे स्वतंत्र चिंतक इतिहास में मुश्किल से मिलेंगे

-गोविन्द प्रसाद बहुगुणा-
नारद जी One Man Mission थे उन्हें कभी किसी संस्था या सताधारी प्रतिष्ठान की sponsorship की दरकार नहीं रही‌और न किसी उपाधि पाने की इच्छा रही जैसे विश्वामित्र और वशिष्ट ऋषियों के बीच ब्रह्मर्षि पद पाने की होड़ रही I अध्ययनप्रेमी , संगीत प्रेमी और समाजसेवी
सोशल एक्टिविस्ट की तरह वह अपने समकालीन लेखकों से निरंतर संपर्क में रहते थे और उनसेमालूम करते रहते थे कि आजकल साहित्य जगत में क्या चल रहा है । उन्होंने बहुतों का पथ प्रदर्शन किया लेकिन इसको व्यवसाय नहीं बनाया‌ , कोई आश्रम वाश्रम नहीं चलाया। उन्होंने अपना गुरु वाद(Gurudum) स्थापित नहीं किया बल्कि निःशुल्क परामर्श दिया I
वाल्मीकि और वेदव्यास जैसे महान रचनाकारों ने भी उनसे परामर्श लिया। वाल्मीकि जी ने रामायण के प्राक्कथन में लिखा है कि राम के चरित्र पर काव्य लिखने की प्रेरणा उन्हें नारद जी से मिली
“तपःस्वाध्यायिनं नित्यं वाग्मिनं वरदं मुनिम्।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम्॥ (१.१.१)’
इसी तरह वेदव्यास जी ने भी श्रमद्भागवत महापुराण में लिखा है कि नारद जी ने ही उन्हें सलाह दी थी कि आप अब ऐसी रचना कर डालिये जिससे आपको शांति मिले और पढ़ने वालों को भी आनन्द आये। उनकी विद्वता का लोहा देवता और दानव दोनों मानते थे और उनसे नि:संकोच राय लेते थे क्योंकि उन्हें इस बात का भरोसा था कि वह किसी के एजेंट नहीं हैं -नारद जी सेल्फमेड मैन थे।
पद्मपुराण में उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में नि:संकोच होकर बताया कि मैं एक गृह परिचारिका का बेटा हूँ ,सांप के डसने से मेरी मां की मृत्यु हुई ,मैं आश्रमों में संतों की जूठन खाकर पला बढ़ा हूँ -लेकिन मेरा कोई God father नहीं है -भले ही लोगों ने उनको वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा जी का मानस पुत्र प्रचारित किया हो लेकिन नारद जी ने कभी अपने मुख से नहीं कहा कि मैं ब्रह्मा को अपना पिता मानता हूँ। देवता भी उनकी निष्पाप और निष्पक्ष स्पष्टवादिता से डरते थे, सत्ता पाने के लिए देवताओं क ई कर्म किये इसलिए उन्हे खुश करने के लिए उनको “देवर्षि” का टाइटल दे दिया ताकि वह देवताओं की पोल न खोले लेकिन, नारद जी ने देवर्षि टाइटल को अलंकरण के रूप में कभी प्रयोग नहीं किया जैसे आजकल के लेखक बुरा मानते हैं अगर उनके नाम के आगे पद्मश्री, पद्मभूषण या पद्मविभूषण भूषण क उपाधि न जोड़ी जाय -नारद जी कहते थे कि उपाधियाँ भी एक तरह की व्याधि है, यह बुद्धि और शरीर को रोगग्रस्त कर देती हैं,बंधक बना देती है ।
नारद जी को लोग पहला स्वतंत्र खोजी पत्रकार मानते हैं क्योंकि उनकी दखल राज भवनों से लेकर सड़क के आदमी तक थी -श्रीमद्भगवद में एक दिलचस्प प्रसंग है कि जब श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश बने तो एक दिन नारद जी उनकी दिनचर्या देखने पहुँच गए श्रीकृष्ण भांप गए कि ये श्रीमान जी क्या पता करने आये होंगे । उन्होंने उनका खूब सत्कार किया लेकिन नारद जी फिर भी उनकी रानियों के महलों के जाकर उनका हाल-चाल पूछने चले गए -कृष्ण ठहरे होशियार वे नारद जी के कहां पहुँचने से पहले ही उन रानियों के महल में विराजमान दिखे -नारद जी ने मान लिया कि कृष्ण सचमुच *जगद्गुरु* हैं यानि गुरुओं के गुरु-
—मेरे पास नारद जी की किताब* नारद भक्ति सूत्र* और नारद पुराण भी है जिसमें शास्त्रीय संगीत में रागों के बारे में विस्तृत जानकारी और उनकी अपनी स्थापनाएं हैं इसलिए नारद जी ने अपने साथ वीणा रखते थे -संगीत का चिंतन से गहरा सम्बन्ध है –शेष फिर कभी या कल ही क्रमश .

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!