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लोक संस्कृति की प्रहरी बनी निहारिका सती

 

जागर और मांगल परंपरा को नई पहचान देने में जुटी नंदानगर की बेटी

हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट
थराली, 21 जून। देवभूमि उत्तराखंड केवल पर्वतों, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य की भूमि ही नहीं, बल्कि लोक आस्था, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का भी केंद्र है। यहां की जागर, मांगल और लोकगायन की सदियों पुरानी परंपराएं प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का आधार रही हैं। लेकिन बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव के बीच ये अमूल्य लोक विधाएं धीरे-धीरे विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं.

ऐसे दौर में चमोली जिले के नंदानगर (घाट) क्षेत्र के कुरूड़ गांव की युवा लोकगायिका नीतू उर्फ निहारिका सती इन परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। उन्होंने उस रूढ़िवादी सोच को चुनौती दी, जिसमें जागर गायन को केवल पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। अपनी सुरीली आवाज और समर्पण के बल पर उन्होंने न केवल इस विधा में पहचान बनाई, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया।
हालांकि, पिछले लगभग एक दशक से लगातार कार्य करने के बावजूद उन्हें वह सम्मान और मंच नहीं मिल सके हैं, जिसकी वे वास्तविक रूप से हकदार हैं। उनकी कहानी केवल एक लोकगायिका के संघर्ष की नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति को बचाने की मुहिम की कहानी भी है।
पुरुष प्रधान परंपरा में बनाई अपनी अलग पहचान
एक समय ऐसा था जब जागर गायन को मुख्य रूप से पुरुषों तक सीमित माना जाता था और महिलाओं की भागीदारी नगण्य थी। ऐसे माहौल में निहारिका सती ने परंपरागत सीमाओं को तोड़ते हुए इस क्षेत्र में कदम रखा और अपनी प्रतिभा के बल पर अलग पहचान स्थापित की।
आज वे उत्तराखंड के गांवों से लेकर देश के विभिन्न राज्यों में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों, धार्मिक आयोजनों तथा विश्वविद्यालयों के मंचों तक जागर और मांगल की परंपरा को पहुंचा रही हैं। उनके प्रयासों से अनेक युवा अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और उससे जुड़ने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
क्या हैं मांगल गीत?
उत्तराखंड के मांगल गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि लोकजीवन, आस्था और सामाजिक परंपराओं का अभिन्न अंग हैं। विवाह, नामकरण संस्कार तथा अन्य शुभ अवसरों पर इन गीतों का विशेष रूप से गायन किया जाता है।
इन गीतों में भगवान गणेश, भगवान विष्णु, सूर्य, चंद्रमा, पंचनाम देवताओं तथा विभिन्न देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए परिवार और समाज की सुख-समृद्धि एवं मंगल की कामना की जाती है। उत्तराखंड के मांगल गीतों का संबंध विशेष रूप से माता नंदा देवी तथा भगवान शिव-पार्वती की पौराणिक परंपराओं से भी जुड़ा माना जाता है।
जागर: केवल लोकगीत नहीं, आस्था का सशक्त माध्यम
उत्तराखंड की लोक संस्कृति में जागर का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह केवल लोकगायन नहीं, बल्कि एक धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा है, जिसके माध्यम से देवी-देवताओं, लोकदेवताओं और पितरों का आह्वान किया जाता है।
निहारिका सती का मानना है कि जागर केवल संगीत नहीं, बल्कि श्रद्धा और आस्था की वह अभिव्यक्ति है जो सीधे लोकमानस और देवपरंपरा से जुड़ती है। उनका कहना है कि यदि यह परंपरा समाप्त हो गई तो उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को गहरा आघात पहुंचेगा।
मां और दादी से मिली सांस्कृतिक विरासत
निहारिका सती अपनी सांस्कृतिक यात्रा का श्रेय अपनी मां और दादी को देती हैं। उनके अनुसार उनकी दादी मांगल गीतों की उत्कृष्ट गायिका थीं। बाद में उनकी मां ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया और जीवनभर मांगल एवं जागर के संरक्षण में योगदान दिया।
बचपन से घर के वातावरण में लोकगीतों की धुन सुनते-सुनते निहारिका ने इन विधाओं को आत्मसात किया। वे कहती हैं कि उनकी मां ही उनकी पहली गुरु हैं और आज भी उन्हें निरंतर मार्गदर्शन देती हैं।
दस वर्षों का संघर्ष, फिर भी नहीं टूटा हौसला
निहारिका सती पिछले लगभग दस वर्षों से लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए कार्य कर रही हैं। वे बताती हैं कि शुरुआती दौर में लोगों ने उनके प्रयासों को गंभीरता से नहीं लिया। कई बार उनका उपहास भी किया गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
उनका कहना है कि आज तक उन्हें न तो अपेक्षित सरकारी मंच मिले हैं और न ही वह सम्मान, जिसकी वे अधिकारी हैं। इसके बावजूद वे पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने में जुटी हुई हैं।
युवाओं की उदासीनता बनी सबसे बड़ी चुनौती
निहारिका सती के अनुसार आज की युवा पीढ़ी आधुनिक संगीत और डिजिटल मनोरंजन की ओर अधिक आकर्षित हो रही है, जबकि जागर और मांगल जैसी पारंपरिक विधाओं के प्रति रुचि कम होती जा रही है।
वे मानती हैं कि यदि युवाओं को इन परंपराओं का महत्व समझाया जाए और उन्हें इनके सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पक्ष से परिचित कराया जाए, तो वे अवश्य इससे जुड़ेंगे। इसके लिए विद्यालयों और महाविद्यालयों में लोक संस्कृति आधारित पाठ्यक्रम, कार्यशालाएं और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जानी चाहिए।
डिजिटल मंच बन सकते हैं संस्कृति संरक्षण के प्रभावी साधन
निहारिका सती का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया आज लोक संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। यदि जागर, मांगल और अन्य लोक परंपराओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से युवाओं तक पहुंचाया जाए, तो इनका संरक्षण अधिक व्यापक और प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
वे वर्तमान में विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक एवं मांगलिक आयोजनों में अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का कार्य कर रही हैं।
सांस्कृतिक आयोजनों के लिए उपलब्ध
लोकगायिका नीतू उर्फ निहारिका सती उत्तराखंड की पारंपरिक मांगल गीत, जागर तथा लोक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए विभिन्न धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में आमंत्रित की जाती हैं। आयोजक अपने कार्यक्रमों में पारंपरिक लोक संस्कृति की प्रस्तुति के लिए उन्हें आमंत्रित कर सकते हैं।

कौन हैं निहारिका सती?
मूल निवासी: कुरूड़, नंदानगर (घाट), जनपद चमोली
पहचान: लोकगायिका एवं जागर-मांगल परंपरा की संरक्षक
विशेष उपलब्धि: पुरुष प्रधान मानी जाने वाली जागर परंपरा में सफल पहचान
कार्यकाल: लगभग 10 वर्षों से लोक संस्कृति संरक्षण में सक्रिय
उद्देश्य: जागर, मांगल और लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना।

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