ब्लैक डेथ से 5,000 साल पहले भी कहर बरपा रहा था प्लेग
साइबेरिया की कब्रों में शिकारी–संग्राहकों के बीच खोजे गए सबसे पुराने ज्ञात मामले इस सिद्धांत को चुनौती देते हैं कि यह बीमारी कभी हल्की थी।
-कार्ल ज़िम्मर-
मानव इतिहास की सबसे भयावह महामारियों में से एक ‘ब्लैक डेथ’ को आमतौर पर 14वीं शताब्दी के यूरोप से जोड़ा जाता है, जब प्लेग ने करोड़ों लोगों की जान ले ली थी। लेकिन अब साइबेरिया की प्राचीन कब्रों से मिले नए साक्ष्य इस बीमारी के इतिहास को और भी पीछे धकेल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने 5,500 वर्ष पुराने मानव अवशेषों में प्लेग पैदा करने वाले बैक्टीरिया के निशान खोजे हैं। यह अब तक का सबसे पुराना ज्ञात प्रमाण है, जो संकेत देता है कि प्लेग मानव सभ्यता के प्रारंभिक दौर में ही एक घातक हत्यारा बन चुका था।
साइबेरिया में बैकाल झील के आसपास मिले शिकारी-संग्राहकों के कंकालों की जांच के दौरान शोधकर्ताओं ने प्लेग के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया यर्सिनिया पेस्टिस का डीएनए खोज निकाला। इस खोज ने वैज्ञानिकों की उस लंबे समय से चली आ रही धारणा को चुनौती दी है, जिसके अनुसार प्लेग के शुरुआती रूप अपेक्षाकृत हल्के थे और बाद में विकसित होकर घातक महामारी का कारण बने।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के आनुवंशिकीविद् एस्के विलर्सलेव के शब्दों में, “यह खोज हमारे पुराने मॉडल से मेल नहीं खाती, लेकिन जब आंकड़े कुछ और कहते हैं तो हमें उन्हें स्वीकार करना पड़ता है।”
आज यर्सिनिया पेस्टिस मुख्य रूप से चूहों और अन्य कृदकों में पाया जाता है। संक्रमित पिस्सू जब किसी जानवर या इंसान को काटते हैं तो बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर जाता है। इससे लिम्फ नोड्स में सूजन आ जाती है, जिसे ‘बुबोनिक प्लेग’ कहा जाता है। आधुनिक चिकित्सा के अभाव में यह बीमारी बेहद घातक साबित होती थी और संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु कुछ ही दिनों में हो सकती थी।
आज प्लेग के मामले दुनिया भर में बहुत कम हैं, लेकिन इतिहास में इस बीमारी ने कई बार सभ्यताओं को हिला कर रख दिया। लंबे समय तक वैज्ञानिक मानते रहे कि कृषि और शहरों के विकास ने प्लेग को फैलने का अवसर दिया। अनाज के भंडार चूहों को आकर्षित करते थे और उनके साथ रहने वाले पिस्सू बीमारी को मनुष्यों तक पहुंचाते थे। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे विनाशकारी महामारियों का रूप ले लेती थी।
करीब तीन दशक पहले वैज्ञानिकों ने प्राचीन मानव अवशेषों से डीएनए निकालने की तकनीक विकसित की। तब पता चला कि प्लेग से मरने वाले लोगों के दांतों और हड्डियों में बैक्टीरिया के आनुवंशिक निशान हजारों वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं। 2015 में एस्के विलर्सलेव और उनके सहयोगियों ने 5,000 वर्ष पुराने दांतों में प्लेग के डीएनए की पहचान कर एक नया रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन उस समय भी वैज्ञानिकों का मानना था कि यह बैक्टीरिया अभी अपने शुरुआती विकास चरण में था।
दिलचस्प बात यह थी कि वे लोग किसान या शहरों में रहने वाले नहीं थे, बल्कि रूस और यूक्रेन के घास के मैदानों में घूमने वाले पशुपालक थे। उनके भीतर मिले प्लेग बैक्टीरिया में वे महत्वपूर्ण आनुवंशिक बदलाव भी नहीं पाए गए थे जो आज की घातक प्लेग प्रजातियों में मौजूद हैं। यहां तक कि उनमें वह जीन भी नहीं था जो पिस्सुओं के शरीर में जीवित रहने के लिए आवश्यक माना जाता है।
इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि शुरुआती प्लेग अपेक्षाकृत कम घातक रहा होगा और बाद में विकसित होकर महामारी का रूप ले पाया होगा। लेकिन नया अध्ययन इस धारणा को उलट देता है।
हाल ही में बैकाल झील के पास स्थित प्राचीन कब्रिस्तानों से मिले 46 कंकालों के दांतों का डीएनए विश्लेषण किया गया। इनमें से 18 व्यक्तियों में यर्सिनिया पेस्टिस के प्रमाण मिले। सबसे पुराना नमूना लगभग 5,500 वर्ष पुराना था, जो अब तक का सबसे पुराना रिकॉर्ड है।
इस खोज को और भी महत्वपूर्ण बनाता है वहां रहने वाले लोगों का जीवन। वे न तो पशुपालक थे और न किसान। वे छोटे-छोटे समूहों में रहने वाले शिकारी-संग्राहक थे, जो मछली पकड़ते, शिकार करते और जंगली पौधों पर निर्भर रहते थे। यानी प्लेग का संबंध केवल कृषि समाजों या घनी आबादी वाले नगरों से नहीं था।
सबसे चौंकाने वाली बात संक्रमण की व्यापकता थी। जिन लोगों के अवशेषों की जांच की गई, उनमें लगभग 39 प्रतिशत में प्लेग के डीएनए मिले। यह अनुपात लगभग वैसा ही है जैसा ब्लैक डेथ के दौरान मरने वालों के अवशेषों में पाया गया है। इससे संकेत मिलता है कि उस समय भी प्लेग बेहद घातक था और संभवतः उसने स्थानीय आबादी का बड़ा हिस्सा खत्म कर दिया था।
विलर्सलेव के अनुसार, “मेरी जानकारी में यह पहला प्रत्यक्ष प्रमाण है कि प्लेग के शुरुआती रूप भी अत्यंत घातक थे। यह सचमुच एक खतरनाक बीमारी थी।”
शोधकर्ताओं ने मृतकों के बारे में कुछ और महत्वपूर्ण संकेत भी पाए। बड़ी संख्या में बच्चों के अवशेष मिले और कई मृतक आपस में रिश्तेदार थे। इससे संभावना मजबूत होती है कि बीमारी परिवारों और छोटे समुदायों के भीतर तेजी से फैली होगी।
कब्रिस्तानों की आयु का विश्लेषण यह भी दर्शाता है कि प्लेग इस क्षेत्र में एक बार नहीं, बल्कि अलग-अलग समय में कई बार आया। यानी यह कोई एकमात्र स्थानीय घटना नहीं थी, बल्कि लंबे समय तक लौट-लौटकर हमला करने वाली बीमारी थी।
और भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि बैकाल झील क्षेत्र में मिले प्लेग बैक्टीरिया का आनुवंशिक संबंध लगभग 3,000 मील दूर वर्तमान लातविया में मिले 5,000 वर्ष पुराने नमूने से भी पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि यह बीमारी हजारों मील के विशाल भूभाग में फैल चुकी थी।
जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक अलेक्जेंडर हेरबिग, जो इस अध्ययन में शामिल नहीं थे, कहते हैं कि यह खोज साबित करती है कि बड़े शहरों, घनी आबादी या पशुपालन के बिना भी गंभीर प्लेग प्रकोप संभव थे।
अब सबसे बड़ा रहस्य यह है कि उस समय प्लेग फैला कैसे? यदि बैक्टीरिया में पिस्सुओं में जीवित रहने वाले जीन नहीं थे, तो संक्रमण एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा कैसे?
विलर्सलेव का अनुमान है कि एशिया और यूरोप के विशाल क्षेत्रों में फैले कृदक बैक्टीरिया के भंडार बने हुए थे और किसी अज्ञात तरीके से संक्रमण सीधे इंसानों तक पहुंचता था। लेकिन सभी विशेषज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं।
नॉर्दर्न एरिजोना विश्वविद्यालय के माइक्रोबियल आनुवंशिकीविद् डेविड वैगनर का मानना है कि प्लेग संभवतः सीधे इंसान से इंसान में फैलता था। आज भी प्लेग का एक रूप, जिसे ‘न्यूमोनिक प्लेग’ कहा जाता है, संक्रमित व्यक्ति की खांसी और सांस की बूंदों के जरिए फैल सकता है।
जब बीमारी फेफड़ों तक पहुंच जाती है, तो मरीज की खांसी के साथ लाखों बैक्टीरिया हवा में फैल जाते हैं। आसपास मौजूद लोग इन्हें सांस के साथ भीतर ले सकते हैं और संक्रमित हो सकते हैं। वैगनर के शब्दों में, “यदि समय पर इलाज न मिले तो यह लगभग मौत की सजा है।”
यह नया अध्ययन न केवल प्लेग के इतिहास को हजारों वर्ष पीछे ले जाता है, बल्कि यह भी बताता है कि मानव सभ्यता के शुरुआती दौर में भी संक्रामक रोग उतने ही विनाशकारी हो सकते थे जितने बाद के इतिहास में दिखाई देते हैं। साइबेरिया की इन शांत कब्रों से निकला डीएनए आज हमें याद दिला रहा है कि महामारियों का इतिहास मानव इतिहास जितना ही पुराना है।
