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एक प्रदेश में दो विधान, क्यों चल रहे श्रीमान!

दिनेश शास्त्री
उत्तराखंड में विभागीय लेखा संवर्ग का कैडर एकीकरण तो हो गया, लेकिन उससे जुड़े नियम-कायदों में अब तक अपेक्षित एकरूपता दिखाई नहीं दे रही है। ताजा मामला चमोली जिले का है, जहां एक ओर विभागीय लेखा निदेशालय के आदेश हैं, तो दूसरी ओर जिला स्तर पर अलग व्यवस्था लागू होती नजर आ रही है। सवाल यह है कि यदि एकीकरण के बाद भी पूरे प्रदेश में समान व्यवस्था लागू नहीं हो पा रही है, तो फिर इस पूरी कवायद का औचित्य क्या रह जाता है?
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने लेखा संवर्ग का कैडर एकीकरण करते समय यह अपेक्षा जताई थी कि पूरे प्रदेश में एक समान व्यवस्था लागू होगी। एकीकरण के बाद सभी प्रशासनिक अधिकार निदेशक, विभागीय लेखा को सौंप दिए गए। इसके तहत निदेशक ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पदोन्नति और स्थानांतरण संबंधी आदेश भी जारी किए। किंतु विडंबना यह है कि कई विभागों में इन आदेशों का समुचित पालन नहीं हो रहा है और जिला स्तर पर अधिकारी अपनी-अपनी व्यवस्था लागू कर रहे हैं। इससे एकीकरण की मूल भावना पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।
जानकारी के अनुसार कई विभाग लेखा कर्मचारियों को कार्यमुक्त (रिलीव) नहीं कर रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण चमोली जिले में सामने आया है। आरोप है कि मुख्य विकास अधिकारी, चमोली ने उत्तराखंड शासन के शासनादेश संख्या 210176/ई-46821/2024 दिनांक 9 मई 2024 तथा शासनादेश संख्या 211237/2024 दिनांक 15 मई 2024 के साथ ही निदेशक, विभागीय लेखा, उत्तराखंड द्वारा जारी आदेशों का अनुपालन नहीं किया है।
बताया जा रहा है कि शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद चमोली में दो लेखाकार—सुमित रावत एवं सुश्री बबीता रतूड़ी—को निदेशक, विभागीय लेखा द्वारा जारी कार्यमुक्ति आदेशों के अनुरूप अब तक कार्यमुक्त नहीं किया गया है। यदि ऐसा है, तो इसे शासनादेशों एवं सक्षम प्राधिकारी के आदेशों की अवहेलना के रूप में देखा जा सकता है।
इस संबंध में लेखा संवर्ग के कार्मिकों ने निदेशक के माध्यम से वित्त सचिव से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि सभी विभागों को शासन एवं निदेशालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित कराया जाए, अन्यथा कैडर एकीकरण का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
चमोली में ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई, यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि निदेशक, विभागीय लेखा ने शासनादेशों के अनुरूप आदेश जारी कर दिए हैं, तो उनमें अनावश्यक हस्तक्षेप प्रशासनिक भ्रम और असमंजस को जन्म दे सकता है। अब देखना यह है कि शासन इस मामले में कब तक स्थिति स्पष्ट कर एकरूपता सुनिश्चित कर पाता है।

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