देश के 25 उच्च न्यायालयों में 355 न्यायाधीशों के पद रिक्त, इलाहाबाद हाईकोर्ट में सबसे अधिक 52 खाली
नई दिल्ली। देश के 25 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के कुल 355 पद रिक्त हैं। 1 जुलाई 2026 की स्थिति के अनुसार उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 1,222 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 867 न्यायाधीश कार्यरत हैं। यह जानकारी केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 और 224 तथा वर्ष 1998 में तैयार मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) के अनुसार की जाती है। यह प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के द्वितीय और तृतीय न्यायाधीश मामलों में दिए गए निर्णयों के अनुरूप निर्धारित की गई है।
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायपालिका में रिक्तियों को भरना कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच समन्वित एवं निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के प्रस्ताव संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श के बाद भेजे जाते हैं, जबकि अंतिम सिफारिश उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम करता है।
सरकार ने बताया कि एमओपी के अनुसार किसी पद के रिक्त होने से कम से कम छह महीने पहले संबंधित उच्च न्यायालय को नियुक्ति की सिफारिश भेजनी चाहिए, लेकिन अधिकांश मामलों में इस समय-सीमा का पालन नहीं हो पाता। राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की टिप्पणियों तथा उपलब्ध रिपोर्टों पर विचार करने के बाद प्रस्ताव उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम के पास भेजे जाते हैं। केवल उन्हीं नामों पर नियुक्ति की जाती है, जिनकी सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम करता है।
आंकड़ों के अनुसार इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सबसे अधिक 52 पद रिक्त हैं। इसके बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय में 31, पंजाब एवं हरियाणा में 30, मद्रास में 24, बंबई में 19, गुजरात में 18, जबकि दिल्ली और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालयों में 16-16 पद खाली हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में स्वीकृत 11 पदों के मुकाबले 8 न्यायाधीश कार्यरत हैं और 3 पद रिक्त हैं।
सरकार का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया में केंद्र और राज्य सरकारों सहित विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं से परामर्श और अनुमोदन आवश्यक होने के कारण यह एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया है, जिसे समयबद्ध बनाने के लिए सभी पक्षों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
