2030 तक हेपेटाइटिस मुक्त भारत की राह: रोकथाम, जांच और इलाज की नई रणनीति
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India is systematically breaking down healthcare barriers to achieve its 2030 goal of combating hepatitis. National Viral Hepatitis Control Program has adopted a health systems approach and integrated with various national programs to prevent infection and provide services including free drugs and diagnostics to the people affected with the disease. |
– उषा रावत –
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य के बड़े खतरे के रूप में समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। भारत ने भी इस दिशा में महत्वाकांक्षी कदम उठाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अभियान शुरू किया है। देश में लाखों लोग हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी से प्रभावित हैं, लेकिन समय पर जांच, टीकाकरण और आधुनिक उपचार के माध्यम से इस बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने न केवल उपचार सुविधाओं का विस्तार किया है, बल्कि रोकथाम, जागरूकता और डिजिटल निगरानी को भी अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
27 जुलाई को विश्व हेपेटाइटिस दिवस से पहले केंद्र सरकार ने दोहराया है कि भारत 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की बाधाओं को लगातार दूर कर रहा है। इसके लिए वर्ष 2018 में शुरू किया गया नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम (NVHCP) देशव्यापी अभियान का आधार बना है।
आखिर क्या है हेपेटाइटिस?
हेपेटाइटिस का अर्थ है यकृत (लिवर) में सूजन। यह वायरस, अत्यधिक शराब सेवन, कुछ दवाओं, विषैले रसायनों अथवा ऑटोइम्यून बीमारियों के कारण हो सकता है। वायरल हेपेटाइटिस के पांच प्रमुख प्रकार—ए, बी, सी, डी और ई—पहचाने गए हैं। इनमें हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी सबसे अधिक चिंता का विषय हैं क्योंकि ये लंबे समय तक शरीर में बने रहकर सिरोसिस, लिवर फेल्योर और लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
विश्व स्तर पर भी वायरल हेपेटाइटिस हर वर्ष लाखों लोगों की जान लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अधिकांश संक्रमित लोगों में वर्षों तक कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। परिणामस्वरूप बीमारी का पता तब चलता है, जब लिवर को गंभीर क्षति पहुंच चुकी होती है।
भारत में कितनी गंभीर है स्थिति?
भारत सरकार के अनुसार, 2021 के राष्ट्रीय सीरो-सर्विलांस आंकड़ों में लगभग 0.85 प्रतिशत आबादी हेपेटाइटिस-बी तथा 0.29 प्रतिशत आबादी हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित पाई गई। इसका अर्थ है कि लगभग हर 118 में से एक व्यक्ति हेपेटाइटिस-बी तथा हर 345 में से एक व्यक्ति हेपेटाइटिस-सी से प्रभावित है। भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में यह संख्या लाखों लोगों तक पहुंचती है।
इसी कारण सरकार ने वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता में शामिल करते हुए मुफ्त जांच और उपचार की व्यवस्था की है।
पांच प्रकार के हेपेटाइटिस, पांच अलग चुनौतियां
हेपेटाइटिस-ए और हेपेटाइटिस-ई मुख्यतः दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलते हैं। खराब स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल की कमी इनके प्रसार का प्रमुख कारण है। अधिकांश मामलों में ये संक्रमण कुछ सप्ताह में स्वयं ठीक हो जाते हैं, लेकिन गंभीर रोगियों को चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है।
इसके विपरीत हेपेटाइटिस-बी संक्रमित रक्त, शरीर के तरल पदार्थों तथा प्रसव के दौरान मां से नवजात शिशु में फैल सकता है। यह पूरी तरह टीके से रोकी जा सकने वाली बीमारी है। इसलिए जन्म के 24 घंटे के भीतर नवजात को हेपेटाइटिस-बी का पहला टीका देना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
हेपेटाइटिस-सी मुख्यतः संक्रमित सुई, असुरक्षित इंजेक्शन, दूषित रक्त अथवा चिकित्सा प्रक्रियाओं के दौरान फैलता है। इसकी अभी तक कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, लेकिन आधुनिक डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल (DAA) दवाओं से 12 से 24 सप्ताह के भीतर लगभग सभी मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं।
हेपेटाइटिस-डी केवल उन्हीं लोगों में होता है जो पहले से हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित होते हैं। इसलिए हेपेटाइटिस-बी का टीकाकरण अप्रत्यक्ष रूप से हेपेटाइटिस-डी से भी सुरक्षा प्रदान करता है।
रोकथाम ही सबसे प्रभावी उपाय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वायरल हेपेटाइटिस की रोकथाम इलाज से कहीं अधिक सरल और कम खर्चीली है। सुरक्षित पेयजल, स्वच्छ भोजन, हाथ धोने की आदत, सुरक्षित इंजेक्शन, रक्त चढ़ाने से पहले उसकी अनिवार्य जांच तथा एक बार उपयोग होने वाली सिरिंजों का प्रयोग संक्रमण को काफी हद तक रोक सकता है।
हेपेटाइटिस-बी के विरुद्ध सार्वभौमिक टीकाकरण भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम के अंतर्गत नवजात शिशुओं को जन्म के समय तथा बाद में निर्धारित अंतराल पर तीन अतिरिक्त खुराक दी जाती हैं।
राष्ट्रीय कार्यक्रम की बहुआयामी रणनीति
भारत सरकार का नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम केवल इलाज तक सीमित नहीं है। इसकी रणनीति में जागरूकता, समय पर जांच, उपचार, निगरानी और अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ समन्वय शामिल है।
इस कार्यक्रम के तहत हेपेटाइटिस-बी और सी के मरीजों को मुफ्त जांच तथा आवश्यक एंटीवायरल दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। पहले जहां ये सुविधाएं केवल जिला अस्पतालों तक सीमित थीं, अब इन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्थानीय स्वास्थ्य संस्थानों तक विस्तारित किया जा रहा है।
मरीजों की निगरानी और उपचार की प्रगति दर्ज करने के लिए डिजिटल एनवीएचसीपी-एमआईएस पोर्टल विकसित किया गया है, जिससे रिकॉर्ड रखने और रिपोर्टिंग की पूरी प्रक्रिया कागजरहित बन गई है।
अन्य राष्ट्रीय कार्यक्रमों से समन्वय
सरकार ने हेपेटाइटिस नियंत्रण को अलग-थलग कार्यक्रम न बनाकर अन्य स्वास्थ्य योजनाओं से भी जोड़ा है।
गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच के माध्यम से मां से बच्चे में संक्रमण रोकने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत उच्च जोखिम वाले समूहों की हेपेटाइटिस-बी और सी की जांच की जाती है तथा स्वास्थ्य कर्मियों का टीकाकरण सुनिश्चित किया जाता है।
राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) की आधुनिक आणविक जांच मशीनों का उपयोग भी हेपेटाइटिस की जांच में किया जा रहा है। वहीं ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेवाओं के माध्यम से संक्रमित रक्तदाताओं की पहचान कर उन्हें उपचार प्रणाली से जोड़ा जाता है।
सस्ती दवाओं से बढ़ी उम्मीद
भारत की एक बड़ी सफलता सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता है। इनके कारण हेपेटाइटिस-सी का इलाज पहले की तुलना में कहीं अधिक सुलभ हो गया है। आधुनिक दवाओं से अधिकांश मरीज कुछ ही महीनों में संक्रमण मुक्त हो सकते हैं। इससे न केवल मरीजों का जीवन बचता है बल्कि भविष्य में लिवर कैंसर और सिरोसिस जैसी महंगी बीमारियों का खतरा भी कम होता है।
जागरूकता अब भी सबसे बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार भारत की सबसे बड़ी चुनौती बीमारी नहीं, बल्कि इसके प्रति जागरूकता की कमी है। बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होने के बावजूद स्वयं को स्वस्थ समझते रहते हैं क्योंकि प्रारंभिक अवस्था में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। थकान, भूख कम लगना, पीलिया या पेट में सूजन जैसे लक्षण अक्सर देर से सामने आते हैं।
इसीलिए चिकित्सक जोखिम वाले लोगों—जैसे बार-बार रक्त चढ़ाने वाले मरीज, डायलिसिस पर रहने वाले व्यक्ति, असुरक्षित इंजेक्शन का इतिहास रखने वाले लोग तथा संक्रमित व्यक्ति के परिवार के सदस्यों—को समय-समय पर जांच कराने की सलाह देते हैं।
2030 का लक्ष्य कितना संभव?
भारत ने 2018 से अब तक जांच, उपचार, टीकाकरण और डिजिटल निगरानी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब सरकारी प्रयासों के साथ समाज की भागीदारी भी बढ़े। सुरक्षित व्यवहार अपनाना, नवजातों का समय पर टीकाकरण, जोखिम वाले लोगों की नियमित जांच और संक्रमित मरीजों का पूरा उपचार इस लक्ष्य की कुंजी हैं।
यदि स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुंच गांवों तक मजबूत होती रही, मुफ्त दवाओं और जांच की उपलब्धता बनी रही तथा लोगों में जागरूकता बढ़ती गई, तो आने वाले वर्षों में भारत वायरल हेपेटाइटिस के बोझ को काफी हद तक कम करने में सफल हो सकता है। यह केवल एक बीमारी पर विजय नहीं होगी, बल्कि देश के करोड़ों लोगों को लिवर रोगों और असमय मृत्यु से बचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि भी साबित होगी।
