भौगोलिक संकेत (GI Tag): भारत की समृद्ध विरासत, अर्थव्यवस्था और वैश्विक पहचान का आधार
— A PIB FEATURE-
बनारस की गलियों में एक बुनकर हफ्तों की अनवरत मेहनत और असाधारण कौशल के बाद जब एक बनारसी साड़ी तैयार करता है, तो वह केवल एक वस्त्र नहीं बुनता, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखता है। जटिलतापूर्ण जरी के काम का हर धागा अत्यधिक सटीकता के साथ बुना जाता है। ये तकनीकें रातोंरात नहीं सीखी जातीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही हैं। हालांकि, इस कठिन परिश्रम के बावजूद कई प्रामाणिक बनारसी साड़ियां अक्सर अपने वास्तविक मूल्य से बहुत कम कीमत पर बिक जाती हैं, क्योंकि आम खरीदार असली हाथ की बुनाई और नकल में फर्क नहीं कर पाते। यहीं पर जीआई टैग (भौगोलिक संकेत) निर्णायक भूमिका निभाता है। यह प्रमाणित करता है कि साड़ी वास्तव में पारंपरिक तरीकों से बनारस में ही बनी है, जिससे खरीदारों को प्रामाणिकता का विश्वास मिलता है और बुनकरों को उनके हुनर का सही आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
परंपरा, अर्थव्यवस्था और आजीविका में जीआई का महत्व
जीआई टैग केवल एक कानूनी प्रमाण-पत्र या लेबल नहीं है, बल्कि यह कारीगरों के शिल्प को नकल, दुरुपयोग और अनधिकृत व्यावसायीकरण से बचाता है। वस्त्र मंत्रालय के अनुसार, एक जीआई टैग ग्रामीण कारीगरों की आय को 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। यह उत्पाद की उत्पत्ति और अनूठी विरासत को प्रमाणित कर खरीदारों में विश्वास पैदा करता है और बाजार में उत्पाद की मांग को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक के चन्नापटना के लकड़ी के खिलौनों को 2006 में जीआई मान्यता मिली, जो वहां की विशिष्ट लाह कला को संरक्षित करते हुए स्थानीय कारीगरों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर पैदा कर रही है। बढ़ती वैश्विक मांग के कारण आज कारीगरों को बेहतर दृश्यता, प्रीमियम बाजारों तक पहुंच और मजबूत सौदेबाजी की शक्ति मिल रही है।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर गुड़ की सफलता की कहानी इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। जीआई टैग ने मुजफ्फरनगर गुड़ की विशिष्ट गुणवत्ता और उत्पत्ति को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। इसी मान्यता का लाभ उठाते हुए बृजनंदन एग्रो फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी ने 2025 में बांग्लादेश को 30 मीट्रिक टन गुड़ का सफलतापूर्वक निर्यात किया। जीआई प्रमाणन से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा बढ़ा, जिससे इस किसान-नेतृत्व वाली कंपनी के 545 सदस्यों की आय की संभावनाएं काफी मजबूत हुईं।
इतिहास, दर्जा और कानूनी ढांचा
भारत में जीआई सुरक्षा की शुरुआत दार्जिलिंग चाय से हुई, जो उत्पाद और उसके लोगो दोनों के लिए जीआई टैग प्राप्त करने वाला देश का पहला उत्पाद बना। इसके बाद केरल के पारंपरिक हस्तशिल्प अरनमुला कन्नडी और तेलंगाना के पोचमपल्ली इकत को यह दर्जा मिला। आज भारत 800 से अधिक पंजीकृत जीआई उत्पादों का घर है, जिनमें से 607 जीआई वर्ष 2014 के बाद प्रदान किए गए हैं। पिछले एक दशक में जीआई टैग के अधिकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या 365 से बढ़कर जनवरी 2025 तक 29,000 हो चुकी है। प्रक्रिया को और अधिक सुलभ बनाने के लिए 2025 में जीआई नियमावली में संशोधन कर आवेदन शुल्क में 80 प्रतिशत की कमी की गई है, जबकि नवीनीकरण शुल्क को ₹3,000 से घटाकर मात्र ₹500 कर दिया गया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई को पेरिस कन्वेंशन और विश्व व्यापार संगठन के ट्रिप्स (TRIPS) समझौते के तहत मान्यता प्राप्त है। भारत में इसका संचालन ‘वस्तुओं का भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999’ के तहत होता है, जिसे 2003 में लागू किया गया और पंजीकरण प्रक्रिया 2004-05 में शुरू हुई। इसका मुख्य कार्यालय भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री, चेन्नई में स्थित है, जिसका क्षेत्राधिकार संपूर्ण भारत में है।
प्रमुख क्षेत्र, प्रांतीय स्थिति और पंजीकरण नियम
भारत हस्तशिल्प, कृषि, निर्मित वस्तुओं, खाद्य और प्राकृतिक श्रेणी में विविध जीआई उत्पादों का केंद्र है। दिसंबर 2025 तक पंजीकृत 445 हस्तशिल्प उत्पादों में जम्मू-कश्मीर की पश्मीना, बंगाल की बालूचरी और बनारस की गुलाबी मीनाकारी शामिल हैं। इसके अलावा 251 कृषि उत्पाद, 64 विनिर्माण उत्पाद (जैसे कन्नौज परफ्यूम), 66 खाद्य उत्पाद (जैसे तिरुपति लड्डू, बर्धमान मिहिदाना) और 5 प्राकृतिक उत्पाद (जैसे मकराना मार्बल, चुनार बलुआ पत्थर) पंजीकृत हैं। राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश 81 जीआई उत्पादों के साथ देश में शीर्ष पर है, जिसके बाद तमिलनाडु (76) और महाराष्ट्र (55) का स्थान आता है।
जीआई पंजीकरण के लिए उत्पादकों का कोई भी संघ, संगठन या कानूनी रूप से स्थापित प्राधिकरण आवेदन कर सकता है। जीआई पंजीकरण 10 वर्षों के लिए वैध होता है, जिसे समय-समय पर नवीनीकृत कराया जा सकता है। हालांकि, सामान्य नाम, उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले संकेत, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले या गैर-कानूनी शब्दों को जीआई दर्जा नहीं दिया जा सकता। अधिनियम की धारा 27 के तहत धोखाधड़ी से प्राप्त या अप्रासंगिक हो चुके जीआई पंजीकरण को रद्द या संशोधित भी किया जा सकता है।
सरकारी प्रोत्साहन, निर्यात और वैश्विक विस्तार
सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के तहत जीआई उत्पादों को लगातार बढ़ावा दे रही है। इसके लिए राज्यों में ₹5,000 करोड़ के आवंटन से ‘पीएम एकता मॉल’ (यूनिटी मॉल) और रेलवे स्टेशनों पर ‘वन स्टेशन वन प्रोडक्ट’ (OSOP) स्टॉल स्थापित किए जा रहे हैं। साथ ही, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए फ्रांस की वाइन टूर की तर्ज पर ‘जीआई ट्रेल’ विकसित की जा रही हैं, जैसे असम में घोषित मुगा सिल्क ट्रेल। वित्तीय सहायता के रूप में एमएसएमई अभिनव योजना के तहत जीआई पंजीकरण लागत की 100 प्रतिशत तक प्रतिपूर्ति (अधिकतम ₹2 लाख) दी जाती है, जबकि विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) कार्यालय द्वारा कानूनी खर्चों के लिए ₹1.5 लाख तक की सहायता मिलती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एपीडा (APEDA) के प्रयासों से भारत के कृषि जीआई उत्पादों का निर्यात तेजी से बढ़ा है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक के जीआई नींबू का मालदीव निर्यात होने से किसानों को 40-50% अधिक लाभ मिला, जबकि तेजपुर लीची के दुबई निर्यात से उत्पादकों को 10% से अधिक का फायदा हुआ। इसके अलावा, भारत-ओमान CEPA, न्यूजीलैंड के साथ व्यापार प्रतिबद्धताओं और भारत-यूरोपीय संघ (EU) एफटीए वार्ता में जीआई उत्पादों के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था शामिल की जा रही है।
वर्ष 2030 तक 10,000 जीआई पंजीकरण के लक्ष्य के साथ भारत अपनी विरासत-आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और अपने अनूठे क्षेत्रीय उत्पादों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।
