रोग मुक्त पशुधन की दिशा में बढ़ता भारत, एफएमडी और ब्रुसेलोसिस के मामलों में आई कमी
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत 2019 में की गई। यह भारत के सबसे बड़े पशुधन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक है। इसका उद्देश्य देशव्यापी टीकाकरण और निगरानी के माध्यम से खुरपका और मुंहपका रोग (एफएमडी) तथा ब्रूसेलोसिस पर नियंत्रण और इनका उन्मूलन है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत एफएमडी के 147.16 करोड़ टीके लगाए गए जिसका लाभ 8.04 करोड़ किसानों को मिला है। रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि से रोगों के मामले घटाने में काफी मदद मिली है। 2019 में एफएमडी के 132 मामले सामने आए थे जिनकी संख्या 2025 में घट कर 40 हो गई। इसी तरह, ब्रूसेलोसिस के मामले भी 2019 में 22 से घट कर 2025 में 15 हो गए। एनएसपी एंटीबॉडी की मौजूदगी भी 2019 में 20.8 प्रतिशत से घट कर 2025 में 8.1 प्रतिशत रह गई है। इससे साक्ष्य आधारित निगरानी और रोग नियंत्रण की निरंतर कोशिशों के परिणामस्वरूप एफएमडी के प्रसार में कमी आने का संकेत मिलता है। देश में पिछले 3 वर्षों में सीरोटाइप एशिया-1 से उत्पन्न एफएमडी का कोई भी मामला सामने नहीं आया है। इस कार्यक्रम को मजबूत पशु चिकित्सा अवसंरचना, पशुधन के बारे में डिजिटल आंकड़ों, अनुसंधान संस्थानों और वन हेल्थ पहलकदमियों से सहायता मिली है। भारत पशुधन पोर्टल पर 39.00 करोड़ से अधिक मवेशी पंजीकृत हैं। 4019 सचल पशु चिकित्सा इकाइयों ने 136 लाख किसानों को उनके घर पर सेवा मुहैया कराते हुए 276 लाख मवेशियों का इलाज किया है। एनएडीसीपी रोग नियंत्रण, डिजिटल निगरानी और महामारी की तैयारी को समेकित करते हुए भारत में रोगों से सुरक्षित पशुधन क्षेत्र में योगदान कर रहा है।
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम से टीकाकरण, निगरानी और डिजिटल पशु स्वास्थ्य व्यवस्था को मिली मजबूती
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) की शुरुआत सितंबर 2019 में की गई थी। इसका उद्देश्य देशव्यापी टीकाकरण और निगरानी के जरिए खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) तथा ब्रुसेलोसिस पर नियंत्रण और इनके उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ना है। यह भारत के सबसे बड़े पशुधन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में शामिल है।
कार्यक्रम के तहत अब तक एफएमडी के 147.16 करोड़ टीके लगाए जा चुके हैं, जिससे 8.04 करोड़ किसानों को लाभ मिला है। टीकाकरण और निगरानी से पशुओं में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी है और रोग के मामलों में कमी दर्ज की गई है। एफएमडी के रिपोर्ट किए गए मामले 2019 में 132 थे, जो 2025 में घटकर 40 रह गए। इसी तरह ब्रुसेलोसिस के मामले 2019 के 22 से घटकर 2025 में 15 रह गए।
एफएमडी के प्रति एनएसपी एंटीबॉडी की मौजूदगी भी 2019 के 20.8 प्रतिशत से घटकर 2025 में 8.1 प्रतिशत रह गई। पिछले तीन वर्षों में देश में एशिया-1 सीरोटाइप से होने वाले एफएमडी का कोई मामला सामने नहीं आया है।
पशुधन स्वास्थ्य पर जोर
पशुधन ग्रामीण भारत में कृषि और संबद्ध गतिविधियों से जुड़ी आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। 2019 की 20वीं पशुधन गणना के अनुसार देश में कुल पशुधन आबादी 535.78 करोड़ थी, जिसमें 302.79 करोड़ गोवंशीय पशु शामिल थे। इतनी बड़ी पशुधन आबादी के लिए रोग नियंत्रण और स्वास्थ्य सेवाओं का महत्व स्पष्ट है।
एफएमडी एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है, जो गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर जैसे विभाजित खुर वाले पशुओं को प्रभावित करता है। इससे दूध उत्पादन, विकास, प्रजनन और कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इसका प्रभावी नियंत्रण संवेदनशील पशुओं के नियमित सामूहिक टीकाकरण पर निर्भर करता है।
ब्रुसेलोसिस Brucella abortus नामक जीवाणु से होने वाला संक्रामक रोग है। यह मुख्य रूप से गाय और भैंसों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है। इससे गर्भपात, प्रजनन संबंधी समस्याएं और दूध उत्पादन में कमी हो सकती है। मवेशियों में इसके उपचार की सीमाओं को देखते हुए टीकाकरण को प्रमुख नियंत्रण उपाय माना जाता है।
एनएडीसीपी के तहत एफएमडी के लिए सभी पात्र पशुओं का साल में दो बार टीकाकरण और 4 से 8 माह की बछियों का ब्रुसेलोसिस से बचाव के लिए जीवनकाल में एक बार टीकाकरण किया जाता है।
टीकाकरण से निगरानी तक
कार्यक्रम में हर छह महीने में गायों और छोटे जुगाली करने वाले पशुओं का एफएमडी के खिलाफ सामूहिक टीकाकरण किया जाता है। इसके साथ कान टैगिंग, पशु पंजीकरण और भारत पशुधन पोर्टल पर डेटा अपलोड किया जाता है।
टीकाकरण से पहले और बाद में नमूनों की जांच के जरिए सीरो-निगरानी की जाती है। टीकों की गुणवत्ता, कोल्ड-चेन व्यवस्था, महामारी निगरानी, वायरस पृथकीकरण और सीरोटाइप की पहचान पर भी जोर दिया गया है। क्वारंटाइन और जांच चौकियों के जरिए पशुओं की आवाजाही को नियंत्रित करने तथा लगातार आंकड़े जुटाकर कार्यक्रम के प्रभाव का आकलन करने की व्यवस्था है।
टीकाकरण कर्मियों को लगाए गए प्रत्येक टीके पर कम से कम तीन रुपये की दर से प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।
सीरो-निगरानी से प्रतिरोधक क्षमता का आकलन
सीरो-निगरानी में आबादी के स्तर पर एंटीबॉडी की मौजूदगी का आकलन कर रोग के जोखिम और प्रतिरोधक क्षमता का अनुमान लगाया जाता है। वहीं, सीरो-सर्विलांस के माध्यम से समय के साथ एंटीबॉडी स्तरों में होने वाले बदलाव की निगरानी की जाती है।
एफएमडी के टीकाकरण के बाद की निगरानी में वायरस के सीरोटाइप ओ, ए और एशिया-1 के खिलाफ औसत सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा क्रमशः 78.1, 71.7 और 77.6 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह व्यापक स्तर पर विकसित प्रतिरोधक क्षमता का संकेत है।
एफएमडी में टाइप ओ भारत और दुनिया के कई हिस्सों में सबसे आम सीरोटाइप है। टाइप ए अत्यधिक परिवर्तनशील है और इसके लिए वायरस से मेल खाते प्रभावी टीके जरूरी होते हैं। एशिया-1 मुख्यतः दक्षिण एशिया में पाया जाता है और भारत में भी इसका प्रकोप रहा है।
चरवाहों के पशुओं का भी टीकाकरण
2024 से चरवाहों की भेड़ों और बकरियों को भी एफएमडी टीकाकरण अभियान में शामिल किया गया है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले पशु झुंडों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य पशुओं की आवाजाही के दौरान रोग के प्रसार के जोखिम को कम करना है।
ब्रुसेलोसिस नियंत्रण
एनएडीसीपी के तहत 4 से 8 माह की आयु की गाय और भैंस की बछियों को जीवन में एक बार ब्रुसेलोसिस का टीका लगाया जाता है। 2025 की टीकाकरण-पश्चात निगरानी में गाय की बछियों में सेरोकनवर्जन दर 75.63 प्रतिशत और भैंस की बछियों में 67.17 प्रतिशत दर्ज की गई।
ब्रुसेलोसिस के रिपोर्ट किए गए मामले 2019 के 22 से घटकर 2025 में 15 रह गए हैं। यह टीकाकरण और निगरानी व्यवस्था के प्रभाव का संकेत देता है।
दूध उत्पादन और उत्पादकता में बढ़ोतरी
पशु स्वास्थ्य और बेहतर प्रबंधन के साथ देश में दूध उत्पादन तथा पशुओं की उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। देशी और मिश्रित नस्ल के मवेशियों की औसत उत्पादकता 2014-15 में 927 किलोग्राम प्रति पशु प्रति वर्ष से बढ़कर 2024-25 में 1,343.2 किलोग्राम हो गई। यह 44.89 प्रतिशत की वृद्धि है।
इसी अवधि में भैंसों की उत्पादकता 1,880 किलोग्राम से बढ़कर 2,365.2 किलोग्राम प्रति पशु प्रति वर्ष हुई, जो 25.80 प्रतिशत की वृद्धि है।
गोवंशीय पशुओं की औसत उत्पादकता 2014-15 के 1,640 किलोग्राम से बढ़कर 2024-25 में 2,250 किलोग्राम प्रति पशु प्रति वर्ष हो गई। यह 36.63 प्रतिशत की वृद्धि है।
भारत का दूध उत्पादन भी 2014-15 के 146.31 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 247.87 मिलियन टन हो गया, यानी करीब 69.4 प्रतिशत की वृद्धि। सरकार का लक्ष्य पशुओं की उत्पादकता को और बढ़ाकर 2030 तक औसतन 3,000 किलोग्राम प्रति पशु प्रति वर्ष करने का है।
पशु स्वास्थ्य के लिए मजबूत ढांचा
एफएमडी और ब्रुसेलोसिस नियंत्रण के लिए प्रमुख आईसीएआर संस्थानों को वैक्सीन अनुसंधान, गुणवत्ता परीक्षण, रोग निगरानी, सीरो-सर्विलांस, बीमारी की मॉडलिंग और राज्यवार नमूना संग्रह के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को टीकाकरण सामग्री तथा कोल्ड-चेन अवसंरचना मजबूत करने में सहायता दी जा रही है। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (एएचआईडीएफ) के जरिए निजी कंपनियों, उद्यमियों और अन्य पात्र संस्थाओं को पशु चिकित्सा टीकों और दवाओं के विनिर्माण की इकाइयां स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।
घर तक पहुंच रही पशु चिकित्सा सेवा
पशुपालकों को घर के नजदीक पशु स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयू) का विस्तार किया गया है। 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 4,019 एमवीयू संचालित हैं। टोल-फ्री नंबर 1962 के माध्यम से ये इकाइयां घर-घर पशु चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराती हैं।
अब तक इन सेवाओं से 136 लाख किसानों को लाभ मिला है और 276 लाख पशुओं का उपचार किया गया है।
भारत पशुधन पोर्टल से डिजिटल निगरानी
भारत पशुधन पोर्टल पर पशुओं का पंजीकरण, टीकाकरण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी एकीकृत की जा रही है। प्रत्येक पशु को 12 अंकों की विशिष्ट टैग आईडी दी जाती है। जुलाई 2026 तक पोर्टल पर 39 करोड़ से अधिक पशु पंजीकृत किए जा चुके थे।
डिजिटल रिकॉर्ड से पशुओं की ट्रेसबिलिटी, टीकाकरण की निगरानी और बीमारी के प्रसार का आकलन आसान हुआ है। भविष्य में एआई आधारित विश्लेषण, रीयल-टाइम डैशबोर्ड और बेहतर डेटा प्रबंधन से रोग निगरानी और संसाधनों के आवंटन को और मजबूत किया जा सकता है।
किसानों की भागीदारी और जागरूकता
पशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों को गांवों तक पहुंचाने में बहुउद्देशीय कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन (एमएआईटीआरआई) की भी भूमिका बढ़ाई गई है। वित्तीय सहायता के जरिए अब तक 39,810 तकनीशियनों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। इन माध्यमों से पशुपालकों तक टीकाकरण, प्रजनन और पशु स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
वन हेल्थ दृष्टिकोण
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम को ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण से भी जोड़ा गया है। इस अवधारणा के तहत मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य को परस्पर जुड़ा हुआ माना जाता है। पशु रोगों की समय पर पहचान, निगरानी और नियंत्रण से उन बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है जो पशुओं से मनुष्यों में फैल सकती हैं।
7 जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (पीएम-एसटीआईएसी) की 21वीं बैठक में अंतर-मंत्रालयी प्रयासों के साथ राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन की स्थापना को मंजूरी दी गई थी। इसका उद्देश्य देश में चल रही वन हेल्थ गतिविधियों का समन्वय, समर्थन और एकीकरण करना है।
एनडीडीबी के ब्रुसेलोसिस नियंत्रण मॉडल में टीकाकरण, सुरक्षित अपशिष्ट निपटान, जैव-सुरक्षा, जन जागरूकता और विभिन्न विभागों के समन्वय पर जोर दिया गया है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मनुष्यों में ब्रुसेलोसिस का कई बार समय पर पता नहीं चल पाता।
महामारी की तैयारी के लिए पशु स्वास्थ्य सुरक्षा
2024 में सरकार ने ‘भारत में महामारी की तैयारी और उससे निपटने के लिए पशु स्वास्थ्य सुरक्षा सुदृढ़ीकरण’ नामक महामारी कोष परियोजना शुरू की। 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर की यह परियोजना जी20 महामारी कोष के सहयोग से एशियाई विकास बैंक, खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व बैंक की साझेदारी में लागू की जा रही है।
परियोजना का उद्देश्य पशु स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत कर महामारी की तैयारी बढ़ाना है। इसमें जीनोमिक और पर्यावरणीय निगरानी, प्रयोगशाला अवसंरचना के उन्नयन तथा सीमा-पार सहयोग पर जोर दिया गया है। इससे पशुजनित और सीमा-पार फैलने वाले रोगों की समय पर पहचान और नियंत्रण में मदद मिलने की उम्मीद है।
इसके तहत सरकार ने मानक पशु चिकित्सा उपचार दिशानिर्देश (एसवीटीजी) और पशु रोगों के लिए संकट प्रबंधन योजना (सीएमपी) जैसे दस्तावेज भी तैयार किए हैं। एसवीटीजी वैज्ञानिक उपचार पद्धतियों, दवाओं के तर्कसंगत उपयोग और रोगाणुरोधी प्रतिरोध से निपटने पर केंद्रित है। वहीं सीएमपी का उद्देश्य बीमारी के प्रकोप के दौरान तैयारियों और त्वरित कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय रूपरेखा उपलब्ध कराना है।
व्यापक पशु स्वास्थ्य ढांचे की ओर
एनएडीसीपी के अनुभव को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एलएचडीसीपी) के तहत रोग नियंत्रण, पशु चिकित्सा सेवाओं और पशु स्वास्थ्य देखभाल को एकीकृत किया है। संशोधित व्यवस्था में एनएडीसीपी, पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण घटक तथा ‘पशु औषधि’ पहल को व्यापक योजना के तहत शामिल किया गया है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम का कुल बजट परिव्यय 2,010 करोड़ रुपये है।
आगे की चुनौती
एनएडीसीपी ने देश में पशु रोग नियंत्रण को टीकाकरण से आगे बढ़ाकर निगरानी, डिजिटल डेटा, प्रयोगशाला क्षमता और आपदा तैयारी से जोड़ने का आधार तैयार किया है। एफएमडी और ब्रुसेलोसिस के मामलों में आई कमी तथा टीकाकरण के बाद प्रतिरोधक क्षमता में सुधार इसके प्रमुख परिणाम हैं।
अब चुनौती इन उपलब्धियों को स्थायी बनाना है। एफएमडी-मुक्त स्थिति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप निगरानी, प्रयोगशाला क्षमता का विस्तार, जीनोमिक सर्विलांस, बेहतर डिजिटल डेटा और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप रोग निगरानी व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी।
पशु स्वास्थ्य में निवेश का सीधा संबंध किसानों की आय, दूध उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से है। साथ ही, पशुजनित रोगों की समय पर पहचान भविष्य में संभावित महामारियों के जोखिम को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इस लिहाज से एनएडीसीपी केवल पशुओं के टीकाकरण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत के पशुधन क्षेत्र को अधिक सुरक्षित, उत्पादक और डेटा आधारित बनाने की दिशा में विकसित हो रही एक व्यापक व्यवस्था है।
