23 साल बाद भी अधूरी कंडलसेरा-द्वारी-भौन सड़क, 12-13 किमी डामरीकरण तक सिमटा विकास
–प्रभुपाल रावत की रिपोर्ट-
रिखणीखाल/नैनीडांडा, 23 अगस्त। लैंसडौन विधानसभा क्षेत्र के रिखणीखाल और नैनीडांडा विकासखंडों की बड़ी आबादी को जोड़ने वाली कंडलसेरा-द्वारी-भौन सड़क करीब 23 वर्ष बाद भी पूरी तरह यातायात के लिए सुचारू नहीं हो पाई है। लगभग 29 किलोमीटर लंबी इस सड़क का निर्माण कार्य वर्ष 2003-04 में शुरू हुआ था, लेकिन अब तक करीब 12-13 किलोमीटर हिस्से में ही डामरीकरण हो पाया है। ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क का डामरीकरण भी कई स्थानों पर घटिया गुणवत्ता का है और मार्ग जगह-जगह गड्ढों, मलबे और पत्थरों से भरा है।
यह सड़क कंडलसेरा, मेलधार, सिद्धपुर, इंदिरा कॉलोनी (हरिजन बस्ती), द्वारी, भातखाल, भंडूखाल, नावेतल्ली, चंदनपुर और हरपाल समेत कई गांवों को जोड़ती है। इसके आगे नैनीडांडा क्षेत्र के चैड-चैनपुर, मल्ला खोला, तल्ला खोला, मंजखोला, छुड़खोला, सुकिलधार, चैबाड़ा, देदार, असनेत, डंडधार, सुखरौ, अन्दरोली और भौन तक सड़क जाती है। इस मुख्य मार्ग से डल्ला, क्वीराली, सिलगांव, नावेतल्ली और तोलियोडांडा समेत कई गांवों के लिए संपर्क मार्ग भी जुड़े हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, इस सड़क पर कई स्कूल, शिक्षण संस्थान, ग्राम पंचायतें और बड़ी आबादी निर्भर है। सड़क को तत्कालीन विधायक लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) टी.पी.एस. रावत के कार्यकाल में स्वीकृति मिली थी। करीब दो दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद सड़क का पूरा निर्माण और डामरीकरण नहीं हो पाना क्षेत्र के लोगों के लिए गंभीर समस्या बना हुआ है।
चैड-चैनपुर से भौन तक हालत खराब
स्थानीय लोगों का कहना है कि चैड-चैनपुर से आगे भौन तक सड़क की स्थिति सबसे अधिक खराब है। कई हिस्सों में मार्ग इतना जर्जर है कि नियमित यातायात चलाना मुश्किल है। सड़क पर जगह-जगह मलबा और पत्थर पड़े रहने से दुर्घटना का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि मार्ग की नियमित सफाई और मलबा हटाने की व्यवस्था नहीं होने से बरसात में समस्या और बढ़ जाती है।
मुख्य मार्ग छोड़ संपर्क सड़क पर बस
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतने लंबे मार्ग पर अब तक नियमित सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था शुरू नहीं हो सकी है। फिलहाल दिन में केवल एक बार करीब 20-25 सीट वाली छोटी बस तोलियोडांडा तक चलती है। ग्रामीणों के अनुसार, तोलियोडांडा मुख्य मार्ग पर नहीं बल्कि एक संपर्क मार्ग पर स्थित है। आरोप है कि बस संचालक अपनी सुविधा के अनुसार मुख्य मार्ग के बजाय संपर्क मार्ग पर बस संचालित कर रहे हैं। इससे मुख्य सड़क से जुड़े गांवों के लोगों को अपेक्षित परिवहन सुविधा नहीं मिल पा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बस में क्षमता से अधिक यात्रियों के बैठने से उन्हें असुविधाजनक और जोखिम भरा सफर करना पड़ता है। उनका कहना है कि जब मुख्य सड़क ही नियमित यातायात के लिए विकसित नहीं हुई तो वर्षों से सड़क निर्माण पर खर्च किए जा रहे धन का अपेक्षित लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है।
गैस आपूर्ति तक प्रभावित
ग्रामीणों के मुताबिक सड़क की खराब स्थिति का असर केवल यात्री परिवहन पर नहीं बल्कि जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर भी पड़ रहा है। खराब मार्ग के कारण गैस आपूर्ति करने वाले वाहन भी इस सड़क पर आने से कतराते हैं। इससे दूरदराज के गांवों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होती है और लोगों को अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क की बदहाली के लिए केवल किसी एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। लंबे समय से सड़क को पूरा कराने और नियमित यातायात शुरू कराने के लिए जनप्रतिनिधियों, लोक निर्माण विभाग और शासन स्तर पर प्रभावी पहल की जरूरत है।
ग्रामीण अब सवाल उठा रहे हैं कि आखिर 23 वर्ष बाद भी 29 किलोमीटर की यह सड़क पूरी तरह यातायात योग्य क्यों नहीं बन पाई? उनका कहना है कि शासन और लोक निर्माण विभाग को सड़क की वर्तमान स्थिति का स्थलीय निरीक्षण कर शेष हिस्से का निर्माण, गुणवत्तापूर्ण डामरीकरण, मलबा हटाने और नियमित बस सेवा शुरू कराने के लिए ठोस कार्ययोजना बनानी चाहिए। लोगों का कहना है कि सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र के स्कूलों, बाजारों, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी जीवनरेखा है।
