प्याज-चीनी ने बिगाड़ा रसोई का बजट, कई जरूरी खाद्य वस्तुओं के दाम तेजी से चढ़े
नई दिल्ली, 29 अगस्त। आम उपभोक्ता को महंगाई के मोर्चे पर एक बार फिर खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर प्याज, चीनी, गुड़, सूरजमुखी तेल और धनिया के दाम पिछले एक साल में तेजी से बढ़े हैं। उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि उपभोक्ता मामलों के विभाग की निगरानी वाली आवश्यक वस्तुओं में करीब एक-तिहाई ऐसी हैं, जिनकी कीमतें साल भर पहले की तुलना में छह प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं। इनमें सबसे ज्यादा उछाल प्याज में दिखाई देता है।
साझा किए गए आंकड़ों में 26 अगस्त 2025 और 26 अगस्त 2026 की अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमतों की तुलना की गई है। इसके अनुसार प्याज की कीमत एक साल में 28.70 रुपये से बढ़कर 46.80 रुपये प्रति किलो हो गई। यानी इसमें 63.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हालांकि सरकारी मूल्य निगरानी के अलग दैनिक आंकड़ों में 26 अगस्त 2026 को प्याज का अखिल भारतीय औसत 37.87 रुपये प्रति किलो दर्ज है। विभिन्न स्रोतों में यह अंतर बाजार केंद्रों, समय और आंकड़ा-संकलन के तरीके के कारण हो सकता है। सरकार ने बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक से प्याज निकालना शुरू कर दिया है और दिल्ली सहित प्रमुख उपभोग केंद्रों पर 35 रुपये किलो की दर से बिक्री की व्यवस्था की है।
प्याज के बाद सबसे बड़ा झटका चीनी ने दिया है। चित्र में दिए आंकड़ों के अनुसार इसका औसत खुदरा भाव 46.30 रुपये से बढ़कर 65.10 रुपये प्रति किलो हो गया, यानी सालाना वृद्धि करीब 40.6 प्रतिशत रही। सरकारी आंकड़े भी इस रुझान की पुष्टि करते हैं। 26 अगस्त को अखिल भारतीय औसत खुदरा चीनी मूल्य 65.05 रुपये किलो तक पहुंच गया था, जो एक साल पहले के 46.27 रुपये की तुलना में लगभग 41 प्रतिशत अधिक है। त्योहारी मांग बढ़ने को ताजा तेजी का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। सरकार द्वारा 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति के बाद 27 अगस्त को औसत भाव कुछ घटकर 64.33 रुपये किलो आया, लेकिन कीमत अभी भी ऊंचे स्तर पर है।
गुड़ भी इससे अछूता नहीं है। साझा आंकड़ों में इसका भाव 56.50 रुपये से बढ़कर 67.10 रुपये प्रति किलो दिखाया गया है। इस तरह साल भर में करीब 18.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। चीनी और गुड़ दोनों की कीमतों में एक साथ वृद्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनका सीधा असर घरेलू खपत के साथ मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ और छोटे खाद्य कारोबारों की लागत पर भी पड़ता है।
खाने के तेल ने भी रसोई के खर्च पर दबाव बढ़ाया है। चित्र के अनुसार पैक्ड सूरजमुखी तेल की औसत कीमत 161.70 रुपये से बढ़कर 191.50 रुपये प्रति किलो, यानी करीब 18.5 प्रतिशत ऊपर चली गई। भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण काला सागर मार्ग से सूरजमुखी तेल की आपूर्ति बाधित हुई है। अगस्त में लगभग 1.50 लाख टन सूरजमुखी तेल की खेप में देरी की बात सामने आई, जिसके कारण भारतीय खरीदार सोयाबीन तेल की ओर मुड़े हैं। अगस्त में सोयाबीन तेल का आयात रिकॉर्ड 6.20 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया।
पश्चिम एशिया का तनाव भी खाद्य महंगाई के लिए जोखिम बना हुआ है। भारत कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भर है और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति की अनिश्चितता परिवहन, जहाज भाड़े और अंततः आयातित वस्तुओं की लागत को प्रभावित कर सकती है। अगस्त में एशिया का कच्चा तेल आयात युद्ध-पूर्व स्तर से नीचे रहा और भारत में पश्चिम एशिया से आने वाले तेल की मात्रा भी प्रभावित हुई है।
मसालों में धनिया भी महंगा हुआ है। चित्र में 250 ग्राम धनिया की कीमत 37.20 रुपये से बढ़कर 42.80 रुपये बताई गई है, जो करीब 15.2 प्रतिशत की वृद्धि है। इस तरह समस्या केवल एक-दो वस्तुओं तक सीमित नहीं है। प्याज से लेकर मिठास, मसाले और खाद्य तेल तक एक साथ महंगे होने पर घरेलू रसोई पर इनका सम्मिलित प्रभाव कहीं अधिक महसूस होता है।
महंगाई की इस तस्वीर में एक राहत भी है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार दालों में अरहर, चना, मसूर, उड़द और मूंग तथा सब्जियों में टमाटर और आलू की कीमतें फिलहाल अपेक्षाकृत स्थिर दायरे में हैं। सरकार देशभर के सैकड़ों केंद्रों से आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की नियमित निगरानी कर रही है। प्याज के मामले में बफर स्टॉक की लक्षित बिक्री शुरू की गई है।
कुल मिलाकर मौजूदा खाद्य महंगाई के पीछे घरेलू उत्पादन और मौसमी आपूर्ति में उतार-चढ़ाव, त्योहारी मांग, आयात पर निर्भरता और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से पैदा हुई आपूर्ति बाधाएं एक साथ काम करती दिखाई देती हैं। सबसे चिंताजनक पहलू प्याज और चीनी जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं में तेज वृद्धि है। यदि आने वाली खरीफ फसल और आपूर्ति शृंखला सामान्य नहीं रहती, तो रसोई के बजट पर दबाव कुछ समय और बना रह सकता है। दूसरी ओर बफर स्टॉक, आयात और बाजार हस्तक्षेप का असर तेजी से खुदरा स्तर तक पहुंचा तो उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।
