राम तेरी गंगा फिर भी मैली की मैली रह गयी
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गंगा के पांच राज्यों में सीवेज शोधन क्षमता से 32 प्रतिशत अधिक गंदा पानी
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उत्तराखंड में रोजाना 554.5 एमएलडी सीवेज, शोधन क्षमता 430.9 एमएलडी; गंगा और सहायक नदियों में गिर रहे नाले अब भी बड़ी चुनौती
–उषा रावत द्वारा-
देहरादून, 29 अगस्त। गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए वर्षों से चल रहे प्रयासों के बावजूद उसके किनारे बसे पांच प्रमुख राज्यों में सीवेज प्रबंधन की तस्वीर चिंताजनक बनी हुई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से सूचना के अधिकार के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में प्रतिदिन करीब 11,785.5 मिलियन लीटर सीवेज पैदा होता है, जबकि उपलब्ध सीवेज शोधन क्षमता केवल 8,026.7 एमएलडी है। यानी इन राज्यों में पैदा होने वाले सीवेज और उसे शोधित करने की क्षमता के बीच लगभग 3,758.8 एमएलडी अथवा 32 प्रतिशत का अंतर है।
एक अंग्रेजी अखबार में आज प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इन पांच राज्यों में सबसे अधिक सीवेज उत्तर प्रदेश में पैदा होता है। उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन करीब 5,500 एमएलडी सीवेज के मुकाबले शोधन क्षमता 4,836.1 एमएलडी है। पश्चिम बंगाल में 4,158 एमएलडी सीवेज के मुकाबले केवल 2,080.7 एमएलडी, बिहार में 1,100 एमएलडी के मुकाबले 525 एमएलडी और झारखंड में 473 एमएलडी के मुकाबले केवल 154 एमएलडी शोधन क्षमता है।
उत्तराखंड की स्थिति इन राज्यों की तुलना में कुछ बेहतर जरूर है, लेकिन यहां भी लगभग पांचवां हिस्सा सीवेज मौजूदा स्थापित क्षमता से बाहर है। राज्य में प्रतिदिन 554.5 एमएलडी सीवेज पैदा होने का अनुमान है, जबकि 70 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की कुल क्षमता 430.9 एमएलडी बताई गई है। इस हिसाब से करीब 123.6 एमएलडी का अंतर है। रिपोर्ट में इसे लगभग 22.3 प्रतिशत बताया गया है। उत्तराखंड में एसटीपी की संख्या उत्तर प्रदेश के 158 संयंत्रों के बाद इन पांच राज्यों में दूसरी सबसे अधिक है।
सबसे गंभीर स्थिति झारखंड की बताई गई है, जहां सीवेज उत्पादन और उपचार क्षमता के बीच करीब 67.4 प्रतिशत का अंतर है। बिहार में यह अंतर 52.3 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में करीब 50 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में क्षमता का अंतर करीब 12.1 प्रतिशत बताया गया है।
उत्तराखंड में 198 नाले भी चिंता का विषय
उत्तराखंड के संदर्भ में समस्या केवल एसटीपी की कुल क्षमता तक सीमित नहीं है। सीपीसीबी की 2025 की प्री-मानसून निगरानी रिपोर्ट इस चुनौती की दूसरी तस्वीर पेश करती है। इसके अनुसार राज्य में गंगा, उसकी मुख्य सहायक नदियों और उनसे जुड़े जलस्रोतों में पानी पहुंचाने वाले 198 नालों की निगरानी की गई थी। इनमें 191 घरेलू और सात मिश्रित प्रकृति के नाले थे। इनमें से 127 नालों को विभिन्न एसटीपी से जोड़ा गया पाया गया। इन नालों के माध्यम से शोधित-अशोधित अपशिष्ट जल और वर्षाजल सहित लगभग 1,461 एमएलडी प्रवाह दर्ज किया गया था।
अखबार में उद्धृत दस्तावेजों के अनुसार उत्तराखंड में ऐसे नालों की सबसे अधिक संख्या पौड़ी में 47, उसके बाद चमोली में 30 और रुद्रप्रयाग में 27 बताई गई है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि इनमें से अधिकांश नाले सूखे रहते हैं और नदी प्रदूषण में उनका वास्तविक योगदान सीमित हो सकता है।
इस बीच उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि राज्य में सीवेज शोधन की कमी दूर करने के लिए नए संयंत्रों पर काम हो रहा है। विशेषकर कुमाऊं क्षेत्र में नए एसटीपी परीक्षण की प्रक्रिया में हैं, जबकि काशीपुर और रुद्रपुर में संयंत्र निर्माणाधीन बताए गए हैं। यमुना कार्ययोजना के तहत भी नई योजनाएं प्रस्तावित हैं।
केवल एसटीपी बनाना पर्याप्त नहीं
समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि स्थापित शोधन क्षमता और वास्तव में शोधित होने वाला सीवेज एक ही बात नहीं है। यदि घरों और प्रतिष्ठानों की सीवर लाइन एसटीपी से जुड़ी नहीं है, संयंत्र पूरी क्षमता से नहीं चलता अथवा शोधन के बाद निकला पानी निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरता तो कागज पर उपलब्ध क्षमता का पूरा पर्यावरणीय लाभ नहीं मिल पाता।
इसी वर्ष सामने आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम संबंधी लेखा परीक्षा में भी इस पहलू पर सवाल उठे थे। इसमें कहा गया कि 2018 से 2023 के बीच कई एसटीपी घरेलू सीवर नेटवर्क से या तो जुड़े नहीं थे या आंशिक रूप से जुड़े थे। सात नगरों में 21 एसटीपी के घरेलू कनेक्शन से नहीं जुड़ने जैसी कमियां भी सामने आईं।
केदारनाथ इसका एक उदाहरण रहा है। सीपीसीबी ने पहले वहां निर्माणाधीन एसटीपी के दायरे से बाहर बड़ी संख्या में अस्थायी आवास और टेंटों से निकलने वाले अपशिष्ट का मुद्दा उठाया था। बाद में फरवरी 2026 में जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण को बताया कि एसटीपी का निर्माण और परीक्षण पूरा कर लिया गया है तथा सीवर कनेक्शन जोड़ने का काम किया जा रहा है।
इसलिए गंगा की स्वच्छता का वास्तविक पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने एसटीपी बने और उनकी घोषित क्षमता कितनी है। महत्वपूर्ण यह है कि कितना सीवेज वास्तव में संयंत्रों तक पहुंच रहा है, उसमें से कितना निर्धारित मानकों के अनुरूप शोधित हो रहा है और अंततः नदियों में कितना अशोधित प्रदूषित पानी जा रहा है।
गंगा की ऊपरी जलधाराओं वाले उत्तराखंड के लिए यह प्रश्न विशेष महत्व रखता है। गंगा की निर्मलता की शुरुआत उसके उद्गम क्षेत्र से होती है। तीर्थाटन, पर्यटन और तेजी से बढ़ते पर्वतीय नगरों में मौसमी आबादी कई गुना बढ़ जाती है। इसलिए स्थायी आबादी पर आधारित सीवेज उत्पादन के आंकड़ों के साथ चारधाम यात्रा और पर्यटन के चरम समय की अस्थायी आबादी को भी भविष्य की शोधन क्षमता तय करते समय शामिल करना जरूरी होगा। तभी गंगा में सीवेज रोकने के लिए बनाए जा रहे बुनियादी ढांचे की वास्तविक उपयोगिता सुनिश्चित हो सकेगी।
