उत्तराखंड की सेवा के लिए समर्पित एक महिला की आत्मकथा

-गोविन्द प्रसाद बहुगुणा-
“A Life in two Worlds”-An Autobiography ofMahatma Gandhi’s English Disciple – Catherine Mary Heilemann (सरला बहन ) Translation from Hindi by David Hopkins-
“We are grateful for the power of the mountains
O Lord, the Lord of our forefathers,
You have made your people powerful
Through the touch of the soil of the mountains.”-
यह एक ऐसी आत्मकथा है जो लिखने वाली की कम और उत्तराखंड के लोक जीवन की अधिक है । यह स्वाभाविक है कि जिस व्यक्ति से जीवन में एक बार भी कभी मुलाकात हुई हो तो उसकी आत्मकथा पढ़ने की तीब्र इच्छा होती है। मुझे अंग्रेज कवि John Milton, का यह बयान बहुत सटीक लगता है जो सरला बहिन की इस आत्मकथा पर सटीक बैठता है कि –
“A good book is the precious life-blood of a master spirit, embalmed and treasured up on purpose to a life beyond life.”
यह किताब मैने यहीं देहरादून के परेड ग्राउंड में सितंबर २०१७ में पुस्तक मेले में खरीदी थी।मेरा सौभाग्य रहा कि मैं इस पुस्तक के लेखक से दो बार मिला हूं । पहली बार मैं उनके साथ सहयात्री के रूप में मैं १९७० के प्रारंभ में बिजनौर गया था , केन्द्रीय गांधी स्मारक निधि दिल्ली की तरफ से हमें बिजनौर भेजा गया था जहां एक सक्रिय सर्वोदय कार्यकर्ता श्री सच्चिदानंद जी की हत्या हो गई थी , मुझे सरला बहन के साथ उस शांति मिशन में बतौर सहायक भेजा गया था ।इस घटना के गवाह स्व० चन्द्रसिंह जी सेवानिवृत्त आईएएस भी रहे, जो उस समय बिजनौर में डिप्टी कलेक्टर तैनात थे । दिल्ली से रेल मार्ग से चलकर मध्यरात्री में हम श्री चंद्र सिंह जी के आवास पर पहुंचे थे .. चंद्र सिंह जी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के हालैंड हाल हास्टल में मैरे रुम मेट रहे इसलिए बिना पूर्व सूचना के मध्यरात्रि में निःसंकोच उनके सरकारी आवास पर रात्रि विश्राम के लिए पहुंच गये ।
..दूसरा अवसर उनसे सानिध्य का तब मिला जब १९७० में टिहरी में श्री सुन्दरलाल जी बहुगुणा ने पर्वतीय क्षेत्रों में शराब बन्दी करने की मांग को लेकर आमरण भूख हड़ताल पर बैठ गये थे तो उनको समर्थन देने के लिए सरला बहिन जी भी अन्य गांधीवादी कार्यकर्ताओं के साथ टिहरी पहुंची थी , उस समय मेरे मित्र अनुपम मिश्र (सुपुत्र भवानीप्रसाद जी मिश्र, सुप्रसिद्ध कवि एवं संपूर्ण गांधी वांग्मय के संपादक ) ने सरला बहिन के साथ मेरा चित्र भी लिया था, जो एक पुस्तक में प्रकाशित भी हुआ , खैर .
Catherine Mary Heilman उर्फ सरला बहिन का जन्म सन् १९०१ में गुड फ्राइडे के दिन लंदन में हुआ था । वह लिखती हैं- “दादी मेरी जर्मन मूल की,पिता स्विट्जरलैंड में जन्मे और विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए मेरी दादी मां अपने बेटे को लेकर किसी तरह फ्रांस के रास्ते इंग्लैंड पहुंचने में कामयाब हुई इसलिए मेरे दिमाग में बचपन से ही राष्ट्रीयता और भाषाओं को लेकर कोई संकीर्ण भावना नहीं रही है,” …..
..सरला बहिन की इस आत्मकथा का यह अंग्रेजी अनुवाद *पहाड़* पत्रिका के सौजन्य से उसके स्थापना वर्ष के २५वर्ष पूर्ण करने के उपलक्ष्य में डेविड ग्रेरार्ड हॉपकिन्स ने बड़ी सहज सरल भाषा में किया है , जो अत्यन्त दिलचस्प और पठनीय अनुवाद है । .गांधी जी का क्या करिश्माई व्यक्तित्व रहा होगा जो इतनी दूर से लोगों को आकर्षित कर यहां खींच लाया ..राउण्ड टेबल कांफ्रेंस के दौरान युवा सरला बहन ने उनसे मिलने की दो बार कोशिश की और हर बार मिस कर गई ,किसी तरह फिर पासपोर्ट बीजा बनाकर समुद्री जहाज से वह भारत पहुंची ..
.उनकी जीवन यात्रा का अधिकांश उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में उनके द्वारा स्थापित लक्ष्मी आश्रम में बीता, जहां उन्होने विभिन्न सामाजिक सरोकार के मामलों में पहाड़ की महिलाओं को शिक्षित और उत्साहित किया ..उनमें श्रीमती बिमला बहुगुणा, राधा बहिन (राधा भट्ट)और शशीप्रभा रावत आदि मुख्य थे । उनके घनिष्ठ सहयोगी मानसिंह रावत,सोहनलाल भूभिक्षु, सुन्दरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट,केदारसिंह कुंजवाल और लोककवि घनश्याम रतूूूड़ी रहे हैं …यह किताब यदि आप पढना शुरू करेंग..।
