एवरेस्ट पर बढ़ता इंसानी बोझ: हजारों लीटर मूत्र भी पिघला रहा है हिमनद!

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के बेस कैंप में पर्यटन, ईंधन और मानवीय गतिविधियां बन रही हैं बर्फ के लिए नई चुनौती
Edited by- Usha Rawat
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट केवल जलवायु परिवर्तन की मार ही नहीं झेल रही है, बल्कि उस पर पहुंचने वाले मनुष्यों की बढ़ती संख्या भी उसके नाजुक हिमनदीय पर्यावरण पर असर डाल रही है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने एक चौंकाने वाले स्थानीय कारण की ओर ध्यान खींचा है—एवरेस्ट बेस कैंप में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाला हजारों लीटर मानव मूत्र भी बर्फ और हिम के पिघलाव में योगदान दे रहा है।
एवरेस्ट का खुम्बू हिमनद वर्षों से बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित हो रहा है। अब वैज्ञानिकों ने पाया है कि बेस कैंप पर हजारों लोगों की मौजूदगी, उनके लिए आवश्यक सुविधाएं और ऊर्जा का बढ़ता उपयोग स्थानीय स्तर पर हिमनद के पिघलाव को और बढ़ा सकता है।
प्रतिदिन 6,000 लीटर से अधिक मूत्र
अध्ययन के अनुसार, पर्वतारोहण के मौसम में एवरेस्ट बेस कैंप में मौजूद पर्वतारोहियों, गाइडों, शेरपाओं और अन्य सहयोगी कर्मियों द्वारा प्रतिदिन 6,000 लीटर से अधिक मूत्र उत्पन्न हो सकता है।
ऊंचाई वाले क्षेत्रों में शरीर को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए लोगों को बार-बार पानी पीना पड़ता है और परिणामस्वरूप मूत्र की मात्रा भी अधिक होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस मानवीय अपशिष्ट का स्थानीय हिम और बर्फ पर प्रभाव पड़ सकता है।
अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि मानव मूत्र से जुड़ी प्रक्रिया के कारण लगभग 154 टन बर्फ के पिघलाव के बराबर प्रभाव हो सकता है। हालांकि वैज्ञानिक यह स्पष्ट करते हैं कि एवरेस्ट बेस कैंप के आसपास हिमनद के पिघलने का सबसे बड़ा स्थानीय कारण मूत्र नहीं, बल्कि ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला ईंधन और उससे उत्पन्न गर्मी है।

बर्फ के बीच बन चुका है एक अस्थायी शहर
हर वर्ष पर्वतारोहण के मौसम में एवरेस्ट बेस कैंप एक अस्थायी लेकिन विशाल बस्ती का रूप ले लेता है। हजारों पर्वतारोही और सहयोगी कर्मचारी यहां पहुंचते हैं। सैकड़ों और हजारों तंबू लगाए जाते हैं और आधुनिक सुविधाओं का भी विस्तार हो चुका है।
कई अभियानों में अब कॉफी, एस्प्रेसो, इंटरनेट, गर्म पानी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं। लेकिन इन सुविधाओं की एक पर्यावरणीय कीमत भी है। खाना पकाने, तंबुओं को गर्म रखने, बिजली और प्रकाश की व्यवस्था के लिए बड़ी मात्रा में ईंधन का उपयोग किया जाता है।
गैस, मिट्टी का तेल और पेट्रोल से पैदा हो रही गर्मी
साल 2023 में एवरेस्ट बेस कैंप में ऊर्जा की जरूरतों के लिए 824 तरलीकृत पेट्रोलियम गैस सिलेंडर, लगभग 18,935 लीटर मिट्टी का तेल और 5,130 लीटर पेट्रोल का उपयोग किया गया। उस समय वहां करीब 1,600 तंबू स्थापित थे।
ईंधन के उपयोग से पैदा होने वाली गर्मी आसपास के हिम और बर्फ के लिए गंभीर समस्या बन सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पर्वतारोहण के मौसम में मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न ऊर्जा के कारण बड़ी मात्रा में बर्फ पिघलने का अनुमान है।
यह समस्या केवल वैश्विक तापमान वृद्धि की नहीं है। यह उस स्थानीय गर्मी की भी कहानी है जो सीधे हिमनद की सतह पर या उसके आसपास मानवीय गतिविधियों के कारण पैदा हो रही है।
बेस कैंप का तापमान बाकी हिमनद से तेजी से बढ़ा
शोधकर्ताओं ने 1991 से 2023 तक उपलब्ध उपग्रहों से प्राप्त तापीय आंकड़ों और बादल रहित चित्रों का अध्ययन किया। उन्होंने एवरेस्ट बेस कैंप के तापमान की तुलना खुम्बू हिमनद के अन्य बर्फीले क्षेत्रों से की।
अध्ययन के निष्कर्षों ने वैज्ञानिकों को चिंतित किया। बेस कैंप क्षेत्र का तापमान हिमनद के दूसरे बर्फ से ढके हिस्सों की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ता पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के साथ स्थानीय मानवीय गतिविधियां भी हिमनद के पर्यावरण को प्रभावित कर रही हैं।
शौचालय हैं, लेकिन मूत्र सीधे बर्फ पर
बेस कैंप में हजारों लोगों के लिए गड्ढानुमा शौचालयों की व्यवस्था की जाती है। ठोस मानव अपशिष्ट को नीचे ले जाने की व्यवस्था भी मौजूद है। लेकिन अधिकांश लोगों द्वारा मूत्र त्याग सीधे हिमनद या उसके आसपास ही किया जाता है।यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि हिमनद केवल बर्फ का एक विशाल भंडार नहीं है। इससे निकलने वाला पानी नीचे रहने वाले समुदायों के जीवन से जुड़ा हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालयी हिमनदों के प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण को अब केवल पर्यटन की समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पिघलते हिमनद से बढ़ सकते हैं नए खतरे
एवरेस्ट और पूरे हिमालय क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमनद तेजी से बदल रहे हैं। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि 2009 के बाद एवरेस्ट क्षेत्र के हिमनदों में बर्फ क्षय की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
हिमनदों के तेजी से पिघलने का असर केवल पर्वतारोहण पर नहीं पड़ता। यह स्थानीय पेयजल स्रोतों, कृषि, जलविद्युत परियोजनाओं और करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। हिमनदों के अस्थिर होने से हिमस्खलन और हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली विनाशकारी बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है। हिमालय जैसे युवा और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में यह विशेष रूप से चिंताजनक है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी: स्थानीय दबाव को भी कम करना होगा
शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के वैश्विक प्रयासों के साथ-साथ पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय मानवीय दबाव को कम करना भी आवश्यक है।एवरेस्ट बेस कैंप पर ईंधन के उपयोग को कम करने, स्वच्छ ऊर्जा के विकल्प तलाशने, मानव अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन और पर्यावरण-अनुकूल पर्वतारोहण व्यवस्था विकसित करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
विशेषज्ञों ने भविष्य में बेस कैंप को हिमनद से हटाकर अधिक स्थिर भूमि पर स्थापित करने की संभावना पर भी विचार करने की बात कही है। इससे हिमनद पर सीधा मानवीय दबाव कम किया जा सकता है।
एवरेस्ट की चेतावनी, पूरे हिमालय के लिए सबक
एवरेस्ट की समस्या केवल दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक सीमित नहीं है। यह पूरे हिमालय के लिए एक गंभीर चेतावनी है। आज हिमालय के अनेक संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन, सड़क निर्माण, होटल, ऊर्जा की बढ़ती मांग और मानव गतिविधियों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
हिमालयी पर्यावरण पहले से ही जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना कर रहा है। यदि इसके साथ स्थानीय स्तर पर बढ़ते प्रदूषण और मानवीय दबाव को नियंत्रित नहीं किया गया, तो हिमनदों का भविष्य और अधिक संकटपूर्ण हो सकता है।
एवरेस्ट हमें एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करता है—क्या हम दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों तक पहुंचने की अपनी महत्वाकांक्षा में उन प्राकृतिक प्रणालियों को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिनके आकर्षण ने हमें वहां तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया? बर्फ की दुनिया में बढ़ती मानवीय मौजूदगी अब केवल पर्वतारोहण की सफलता की कहानी नहीं है। यह हिमालय की सहनशक्ति की परीक्षा भी बनती जा रही है।
