नंदा की कैलाश यात्रा पर असमंजस, बड़ी जात जाएगी होमकुंड या वेदनी तक सिमटेगी लोकजात?
राजजात के बाद अब बड़ी जात और लोकजात के अलग-अलग कार्यक्रमों ने बढ़ाया भ्रम, पांच सितंबर को कुरूड़ से शुरू होनी है यात्रा

–हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट-
थराली, 3 सितम्बर। विश्व की सबसे लंबी और कठिन धार्मिक यात्राओं में शुमार नंदादेवी की कैलाश यात्रा इस बार शुरू होने से पहले ही असमंजस में घिर गई है। वर्ष 2027 में श्री नंदादेवी राजजात आयोजित करने की घोषणा को लेकर पहले से चला आ रहा विवाद अभी थमा भी नहीं था कि अब बड़ी जात और लोकजात के अलग-अलग कार्यक्रम सामने आने से नंदा भक्तों के बीच भ्रम और गहरा गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पांच सितंबर को नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ से निकलने वाली यात्रा बड़ी जात के रूप में होमकुंड तक जाएगी या लोकजात के रूप में वेदनी बुग्याल से ही लौट आएगी?
नंदा भगवती उत्तराखंड ही नहीं, देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्वरूपों और नामों से आराध्य हैं। हिमालय में उनकी कैलाश विदाई से जुड़ी जात यात्राएं सदियों पुरानी धार्मिक और लोक परंपराओं का हिस्सा हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से राजजात, बड़ी जात और लोकजात के आयोजन को लेकर जिस तरह अलग-अलग दावे और कार्यक्रम सामने आए हैं, उससे श्रद्धालुओं में असमंजस बढ़ा है। कई नंदा भक्त इसे धार्मिक परंपरा में अनावश्यक हस्तक्षेप मानते हुए सोशल मीडिया पर भी नाराजगी जता रहे हैं।
2026 से 2027 हुई राजजात तो शुरू हुआ विवाद
पिछली श्री नंदादेवी राजजात वर्ष 2014 में आयोजित हुई थी। तब 12 वर्षों के अंतराल के हिसाब से अगली राजजात 2026 में आयोजित होने की बात कही गई थी। इसी के अनुरूप 2025 के अंतिम महीनों तक श्री नंदादेवी राजजात समिति नौटी और राज्य सरकार के स्तर पर तैयारियां भी आगे बढ़ती रहीं। यात्रा को ‘सचल हिमालयी महाकुंभ’ के स्वरूप में आयोजित करने की बात कही गई और उच्चस्तरीय बैठकों के साथ इसकी रूपरेखा भी सामने आने लगी।
लेकिन 2026 के शुरुआती महीनों में नंदादेवी राजजात समिति नौटी ने यात्रा का आयोजन 2026 के बजाय 2027 में करने की घोषणा कर दी। यहीं से विवाद ने जोर पकड़ा। नंदानगर-घाट के नंदाक क्षेत्र और बधाण पट्टी के नंदा भक्तों के एक वर्ग ने राजजात एक वर्ष आगे बढ़ाए जाने पर आपत्ति जताई। इसके बाद बैठक कर 2026 में श्री नंदादेवी राजराजेश्वरी बड़ी जात यात्रा आयोजित करने की घोषणा कर दी गई। इसका मार्ग और विस्तृत कार्यक्रम भी महीनों पहले जारी कर दिया गया।
बड़ी जात का कार्यक्रम होमकुंड तक
घोषित बड़ी जात कार्यक्रम के अनुसार यात्रा पांच सितंबर को नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ से शुरू होनी है। 12 सितंबर को यात्रा नंदकेशरी पहुंचेगी, जहां गढ़वाल और कुमाऊं से आने वाली यात्राओं का भावपूर्ण मिलन प्रस्तावित है। 15 सितंबर को यात्रा लाटू सिद्धपीठ वांण पहुंचेगी। यहां अन्य देव डोलियों के साथ नंदादेवी के धर्म भाई लाटू देवता से भेंट होगी।
इसके बाद 16 सितंबर को यात्रा निर्जन पड़ाव गैरोलीपातल पहुंचेगी। 20 सितंबर को शिला समुद्र से आगे बढ़कर यात्रा होमकुंड पहुंचेगी। यहां बड़ी जात की परंपरागत पूजा-अर्चना के बाद चौसिंग्या खाडू को कैलाश के लिए विदा किए जाने का कार्यक्रम है।
वापसी में यात्रा जामुन डाली पहुंचेगी। 21 सितंबर को देव डोलियां और निशान नंदानगर के सुतोल गांव पहुंचेंगे। 22 सितंबर को अन्य देव डोलियां और निशान नंदानगर की ओर प्रस्थान करेंगे, जबकि बधाण की नंदादेवी की देव डोली वापस वांण गांव पहुंचेगी। इसके बाद 30 सितंबर को नंदादेवी की उत्सव डोली सिद्धपीठ देवराड़ा-थराली पहुंचेगी और मंदिर के गर्भगृह में छह माह के प्रवास के लिए विराजमान होगी।
फिर सामने आया लोकजात का अलग कार्यक्रम
बड़ी जात का कार्यक्रम जारी होने के कुछ महीने बाद अगस्त में नंदा सिद्धपीठ देवराड़ा-थराली से केंद्रीय समिति मां नंदादेवी राजराजेश्वरी बधाण थराली के अध्यक्ष सुशील रावत और सचिव पृथ्वीपाल सिंह बुटोला की ओर से ‘नंदादेवी राजराजेश्वरी लोकजात यात्रा कार्यक्रम 2026, परगना नंदाक-बधाण’ जारी किया गया।
इस कार्यक्रम के अनुसार तीन से पांच सितंबर तक नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ में तीन दिवसीय मेला आयोजित होना है। पांच सितंबर को कुरूड़ से लोकजात शुरू होगी और सप्तमी के दिन 18 सितंबर को वेदनी बुग्याल पहुंचेगी। वहां नंदादेवी की पूजा-अर्चना और कैलाश विदाई के बाद यात्रा वापस लौटेगी। अनंत चतुर्दशी के दिन 25 सितंबर को देवी की डोली छह माह के प्रवास के लिए नंदा सिद्धपीठ देवराड़ा में विराजमान हो जाएगी।
इस कार्यक्रम और पहले घोषित बड़ी जात में सबसे महत्वपूर्ण अंतर यात्रा के अंतिम हिमालयी पड़ाव को लेकर है। बड़ी जात का घोषित गंतव्य होमकुंड है, जबकि लोकजात वेदनी बुग्याल से ही वापस लौटनी है।
कुरूड़ समिति का भी लोकजात कार्यक्रम
असमंजस तब और बढ़ गया जब पिछले दिनों सोशल मीडिया पर नंदादेवी राजराजेश्वरी मंदिर एवं मेला कमेटी कुरूड़, नंदानगर के उपाध्यक्ष किशोर गौड़, सचिव सुनील गौड़ और कोषाध्यक्ष दयाराम गौड़ के नाम से भी श्री नंदादेवी राजराजेश्वरी लोकजात यात्रा कार्यक्रम-2026 सामने आया। इस कार्यक्रम में भी यात्रा का स्वरूप लगभग वही रखा गया है, जो बधाण समिति की ओर से जारी लोकजात कार्यक्रम में दिया गया है।
पांच सितंबर करीब, लेकिन सवाल अब भी कायम
अब यात्रा शुरू होने में कुछ ही समय शेष है। पांच सितंबर को नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ से देवी की कैलाश यात्रा निकलनी है, लेकिन श्रद्धालुओं के बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है—कुरूड़ से निकलने वाली डोली बड़ी जात के रूप में होमकुंड तक जाएगी या लोकजात के रूप में वेदनी बुग्याल से वापस लौटेगी?
राजजात को 2027 तक टालने के फैसले से शुरू हुआ मतभेद अब बड़ी जात और लोकजात के स्वरूप तक पहुंच गया है। अलग-अलग समितियों और आयोजकों की ओर से जारी कार्यक्रमों ने स्थिति स्पष्ट करने के बजाय श्रद्धालुओं का असमंजस बढ़ाया है। इसका असर सोशल मीडिया पर भी दिखाई दे रहा है, जहां अनेक नंदा भक्त आयोजकों से स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं।
नंदा भक्तों का कहना है कि नंदादेवी की जात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि गढ़वाल-कुमाऊं की साझा आस्था, लोक परंपरा और हिमालयी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए राजजात, बड़ी जात अथवा लोकजात—यात्रा का जो भी स्वरूप हो, उसके बारे में संबंधित पक्षों को समय रहते एकमत होकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि सदियों पुरानी आस्था की इस परंपरा पर विवाद और भ्रम की छाया न पड़े।
