जीडीपी के आंकड़ों पर उठे सवाल, सरकार ने कहा—आधार वर्ष बदलने से घटा पिछले साल का अनुमान
The Indian government has refuted allegations of deliberately deflating previous GDP estimates to inflate current economic growth. The controversy erupted after former Finance Secretary Subhash Chandra Garg argued that nominal Q1 growth was merely 2.6% using the older 2011–12 base, rather than the reported 7.8% real growth under the updated 2022–23 base series. The Ministry of Statistics clarified that comparing mismatched series is flawed; revisions stem from shifting base years, new data sources, and a double deflation methodology in manufacturing. While technical adjustments explain statistical gaps with CPI and WPI, maintaining data credibility requires transparent disclosures regarding how baseline estimates evolved…Jay Singh Rawat

–जयसिंह रावत-
देश की अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही के विकास आंकड़ों को लेकर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने सफाई दी है कि पिछले वर्ष की जीडीपी को जानबूझकर कम दिखाकर इस वर्ष की वृद्धि दर बढ़ाने का आरोप सही नहीं है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का कहना है कि जीडीपी की गणना का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 किए जाने, नए आंकड़ा स्रोतों और नई गणना पद्धतियों को शामिल करने के कारण पुराने अनुमानों में बदलाव हुआ है।
विवाद की जड़ 2025-26 की पहली तिमाही के जीडीपी अनुमान में आया बड़ा बदलाव है। अगस्त 2025 में पुरानी 2011-12 आधार वर्ष वाली श्रृंखला के तहत चालू कीमतों पर इस तिमाही की जीडीपी ₹86.05 लाख करोड़ आंकी गई थी। नई 2022-23 आधार वर्ष वाली श्रृंखला में यही आंकड़ा पहले ₹80.32 लाख करोड़ और बाद में संशोधित होकर करीब ₹80 लाख करोड़ रह गया। इसके मुकाबले 2026-27 की पहली तिमाही में चालू कीमतों पर जीडीपी ₹88.27 लाख करोड़ आंकी गई है।
पूर्व वित्त सचिव ने उठाया 2.6 प्रतिशत वृद्धि का सवाल
सरकारी स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि पिछले वर्ष की पहली तिमाही के मूल ₹86.05 लाख करोड़ के अनुमान में बदलाव नहीं किया गया होता तो इस वर्ष ₹88.27 लाख करोड़ की जीडीपी के आधार पर चालू कीमतों में वृद्धि लगभग 2.6 प्रतिशत ही होती।
इसी तर्क के आधार पर सवाल उठाया गया कि पिछले वर्ष का आधार छोटा हो जाने से वर्तमान वृद्धि दर अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे रही है। आलोचना का दूसरा प्रमुख बिंदु विनिर्माण क्षेत्र का ऋणात्मक अंतर्निहित अपस्फीतिकारक और जीडीपी अपस्फीतिकारक का उपभोक्ता तथा थोक मुद्रास्फीति से काफी नीचे होना है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। सरकार द्वारा घोषित 7.8 प्रतिशत वास्तविक जीडीपी वृद्धि और गर्ग द्वारा उठाया गया 2.6 प्रतिशत का सवाल एक ही प्रकार की वृद्धि दर नहीं हैं। 7.8 प्रतिशत स्थिर कीमतों पर वास्तविक वृद्धि है, जबकि 2.6 प्रतिशत वाला तर्क पुराने अनुमान को वर्तमान ₹88.27 लाख करोड़ से मिलाकर चालू कीमतों की वृद्धि से संबंधित है। इसलिए दोनों आंकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती।
सरकार का तर्क—दो अलग श्रृंखलाओं की तुलना गलत
सांख्यिकी मंत्रालय ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि ₹86.05 लाख करोड़ और ₹80 लाख करोड़ के आंकड़े एक ही सांख्यिकीय श्रृंखला के नहीं हैं। पहला आंकड़ा 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी श्रृंखला का था, जबकि दूसरा 2022-23 आधार वर्ष वाली नई श्रृंखला से निकला है।
मंत्रालय के मुताबिक फरवरी 2026 में नई जीडीपी श्रृंखला लागू होने के बाद पुराने वर्षों के आंकड़ों की भी नए आधार पर पुनर्गणना की गई। इस प्रक्रिया में 2025-26 की पहली तिमाही की जीडीपी ₹86.05 लाख करोड़ से बदलकर ₹80.32 लाख करोड़ हुई। जून में इसे ₹80.44 लाख करोड़ किया गया और बाद में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तथा उत्पादक मूल्य सूचकांक की नई श्रृंखला शामिल होने पर यह लगभग ₹80 लाख करोड़ रह गई।
सरकार का कहना है कि इसलिए ₹86.05 लाख करोड़ को सीधे 2026-27 के ₹88.27 लाख करोड़ से मिलाना दो अलग सांख्यिकीय श्रृंखलाओं की तुलना होगी।
विनिर्माण की कीमतें बढ़ीं, फिर अपस्फीतिकारक ऋणात्मक क्यों?
आलोचना का एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि उत्पादन और लागत दोनों बढ़ने के बावजूद विनिर्माण क्षेत्र का अंतर्निहित जीवीए अपस्फीतिकारक ऋणात्मक 1.5 प्रतिशत कैसे हो सकता है।
मंत्रालय ने इसके पीछे नई दोहरी अपस्फीति पद्धति को कारण बताया है। इसमें उत्पादन और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली मध्यवर्ती वस्तुओं की लागत को अलग-अलग मूल्य प्रभाव से मुक्त किया जाता है। सरकार के मुताबिक पहली तिमाही में कई विनिर्माण गतिविधियों में इनपुट कीमतें उत्पादन कीमतों से अधिक तेजी से बढ़ीं। परिणामस्वरूप चालू कीमतों पर विनिर्माण जीवीए की वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही, जबकि स्थिर कीमतों पर वास्तविक जीवीए वृद्धि 9.2 प्रतिशत निकली। इसी अंतर से ऋणात्मक 1.5 प्रतिशत का अंतर्निहित अपस्फीतिकारक सामने आया।
मंत्रालय का तर्क है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि बाजार में विनिर्मित वस्तुओं की कीमतें वास्तव में घट गईं। यह उत्पादन और इनपुट कीमतों की अलग-अलग गति का सांख्यिकीय परिणाम है।
सीपीआई-डब्ल्यूपीआई से जीडीपी महंगाई इतनी अलग क्यों?
जीडीपी आंकड़ों पर एक और सवाल यह उठा कि जब उपभोक्ता मुद्रास्फीति करीब 3.9 प्रतिशत और थोक मुद्रास्फीति 9 प्रतिशत से अधिक थी तो अंतर्निहित जीडीपी मुद्रास्फीति करीब 2.5 प्रतिशत कैसे रही।
मंत्रालय के अनुसार तीनों सूचकांकों की तुलना सीधे नहीं की जा सकती। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक घरों द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमत मापता है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक मुख्यतः वस्तुओं और कच्चे माल की कीमतों को दर्शाता है। जीडीपी अपस्फीतिकारक का दायरा कहीं व्यापक है और उसमें सरकारी खर्च, निवेश, निर्यात, बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी और रियल एस्टेट जैसी सेवाएं भी आती हैं। नई व्यवस्था में 300 से अधिक अलग-अलग मूल्य अपस्फीतिकारकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
सवाल पूरी तरह खत्म नहीं
सरकार का स्पष्टीकरण तकनीकी रूप से यह बताता है कि अलग-अलग आधार वर्षों वाली जीडीपी श्रृंखलाओं के आंकड़ों को सीधे जोड़कर वृद्धि दर निकालना उचित नहीं है। पूर्व वित्त आयोग अध्यक्ष एन.के. सिंह ने भी पुरानी और नई श्रृंखला की यांत्रिक तुलना को अनुचित बताते हुए नई पद्धति को अधिक विस्तृत और अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय लेखा मानकों के अनुरूप बताया है।
फिर भी बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष बना हुआ है। किसी आधार वर्ष में बदलाव के बाद यदि पुराने वर्ष के किसी प्रमुख तिमाही अनुमान में लगभग ₹6 लाख करोड़ का अंतर आता है तो यह जानना स्वाभाविक है कि इस बदलाव में कितना हिस्सा केवल आधार वर्ष बदलने का है और कितना नई पद्धति, नए मूल्य सूचकांकों, बेहतर कवरेज तथा संशोधित स्रोत आंकड़ों का। आंकड़ों की विश्वसनीयता के लिए इन प्रभावों का अलग-अलग और पारदर्शी विवरण सार्वजनिक बहस को अधिक स्पष्ट कर सकता है।
मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि पहली तिमाही के वर्तमान अनुमान उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित हैं और अधिक व्यापक आंकड़े मिलने पर उनमें आगे संशोधन हो सकता है। हालांकि उसका कहना है कि मौजूदा सांख्यिकीय विसंगतियों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आगे जीडीपी अनिवार्य रूप से ऊपर या नीचे संशोधित होगी।
इसलिए मौजूदा विवाद को केवल ‘7.8 प्रतिशत बनाम 2.6 प्रतिशत’ की लड़ाई मानना भ्रामक होगा। असली प्रश्न यह है कि नई जीडीपी श्रृंखला भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक गतिविधियों को पुरानी श्रृंखला की तुलना में कितनी बेहतर ढंग से पकड़ती है और पुराने आंकड़ों में हुए बड़े बदलावों की व्याख्या कितनी पारदर्शिता से की जाती है। सरकार ने तकनीकी जवाब दिया है; अब नई श्रृंखला की विश्वसनीयता की असली कसौटी आने वाले संशोधित और अंतिम आंकड़े होंगे।
नोट:- लेखक वरिष्ठ पत्रकार, कई पुस्तकों के लेखक और शोधार्थी हैं लेकिन इस लेख में प्रकट विचार और तर्क उनके निजी है जिनसे एडमिन की सहमति जरूरी नहीं है –एडमिन
