इंटरनेट क्रांति : अभी चाँद भी दूर खड़े हैं अपने गांव
–जयसिंह रावत
भारत ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट अंतरिक्ष यान उतार दिया, मंगल की कक्षा तक पहुंच गया और दुनिया के अनेक देशों के उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचा चुका है, लेकिन अपने ही दुर्गम गांवों तक निर्बाध तेज इंटरनेट पहुंचाने की चुनौती अब भी पूरी तरह हल नहीं हुई है। इस विरोधाभास को बदलने की दिशा में अब एक महत्वपूर्ण कदम उठा है। डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन ने उपग्रह संचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम शुल्क की व्यवस्था को मंजूरी दे दी है। प्रस्तावित व्यवस्था में उपग्रह कंपनियों से उनके समायोजित सकल राजस्व यानी एजीआर का 5 प्रतिशत स्पेक्ट्रम शुल्क लेने और अधिसूचित ग्रामीण तथा दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने पर इसे प्रभावी रूप से 4 प्रतिशत रखने का प्रावधान है। स्पेक्ट्रम पांच वर्ष के लिए आवंटित किया जाना प्रस्तावित है, जिसे दो वर्ष और बढ़ाया जा सकेगा। हालांकि मंत्रिमंडल की अंतिम मंजूरी और सुरक्षा संबंधी स्वीकृतियां अभी बाकी हैं।
यह फैसला केवल दूरसंचार बाजार में एक नई सेवा जोड़ने का मामला नहीं है। भारत जैसे विशाल और भौगोलिक विविधता वाले देश में इसका वास्तविक महत्व वहां दिखाई देगा, जहां मोबाइल टावर और ऑप्टिकल फाइबर आर्थिक या भौगोलिक कारणों से नहीं पहुंच पाते अथवा प्राकृतिक आपदाओं में बार-बार टूट जाते हैं।

तार से अंतरिक्ष तक लंबा सफर
भारत की संचार यात्रा अपने आप में असाधारण रही है। आजादी के समय टेलीफोन सुविधा शहरों और प्रशासनिक केंद्रों तक सीमित थी। फिर रेडियो और माइक्रोवेव संचार आया। अंतरिक्ष कार्यक्रम की संस्थागत शुरुआत 1962 में इनकोस्पार से हुई, 1969 में इसरो अस्तित्व में आया और 1975 में भारत का पहला उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ अंतरिक्ष में पहुंचा। इसके बाद उपग्रह भारत में केवल मौसम और वैज्ञानिक अनुसंधान के उपकरण नहीं रहे। इन्सैट प्रणाली ने दूरसंचार, मौसम विज्ञान, प्रसारण और आपदा चेतावनी को एक नए युग में पहुंचाया।
इसी उपग्रह क्षमता का एक ऐतिहासिक सामाजिक प्रयोग 1975-76 का ‘सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट’ यानी SITE था। इसने हजारों भारतीय गांवों तक शैक्षिक टेलीविजन कार्यक्रम पहुंचाकर दिखाया था कि अंतरिक्ष तकनीक भौगोलिक दूरी मिटा सकती है। लगभग आधी सदी बाद उसी विचार का कहीं अधिक शक्तिशाली रूप सैटेलाइट ब्रॉडबैंड के रूप में सामने है।
फाइबर क्रांति के बावजूद अंतिम गांव की चुनौती
भारत ने जमीन पर डिजिटल ढांचा खड़ा करने में भी विशाल निवेश किया है। 2011 में स्वीकृत राष्ट्रीय ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क आगे चलकर भारतनेट बना। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों तक उच्च गति ब्रॉडबैंड की रीढ़ पहुंचाना था। फरवरी 2026 तक करीब 2.18 लाख ग्राम पंचायतें भारतनेट के तहत सेवा के लिए तैयार की जा चुकी थीं। संशोधित भारतनेट कार्यक्रम अब शेष ग्राम पंचायतों और मांग के आधार पर गैर-पंचायत गांवों तक नेटवर्क पहुंचाने पर केंद्रित है।
फिर भी ‘फाइबर पहुंच गया’ और ‘हर घर को भरोसेमंद इंटरनेट मिल गया’ एक ही बात नहीं हैं। भारतनेट स्वयं देश के लगभग 6.4 लाख गांवों को जोड़ने की व्यापक चुनौती के संदर्भ में काम कर रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में अंतिम कुछ किलोमीटर का संपर्क अक्सर सबसे कठिन और महंगा हिस्सा बन जाता है। यहीं उपग्रह इंटरनेट की उपयोगिता सामने आती है।

भारत का भूगोल ही बताता है इसकी जरूरत
लद्दाख के अत्यधिक ऊंचाई वाले गांव, हिमाचल और उत्तराखंड की हिमालयी घाटियां, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के सीमांत क्षेत्र, पूर्वोत्तर के घने जंगल, राजस्थान का थार, कच्छ का रण और अंडमान-निकोबार तथा लक्षद्वीप के द्वीप—इन सबको एक ही स्थलीय दूरसंचार मॉडल से जोड़ना आसान नहीं है।
उत्तराखंड इसका जीवंत उदाहरण है। यहां किसी पहाड़ी गांव तक फाइबर पहुंचाने के लिए नदी, गदेरे, जंगल और भूस्खलन क्षेत्र पार करने पड़ सकते हैं। सड़क कटते ही ऑप्टिकल फाइबर भी टूट सकता है। बादल फटने, भूस्खलन या बाढ़ में मोबाइल टावर का बिजली और बैकहॉल संपर्क बाधित होते ही पूरा इलाका संचारविहीन हो सकता है।
उपग्रह कनेक्शन की विशेषता यह है कि उसे हर गांव तक सैकड़ों किलोमीटर तार बिछाने की आवश्यकता नहीं होती। उपयुक्त टर्मिनल, खुला आकाश और बिजली उपलब्ध हो तो अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रह से संपर्क स्थापित किया जा सकता है। इसलिए हिमालय के लिए सैटेलाइट इंटरनेट केवल मनोरंजन या तेज डाउनलोड की सुविधा नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन का वैकल्पिक संचार तंत्र भी बन सकता है।
कल्पना कीजिए कि किसी हिमालयी आपदा में सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क एक साथ बंद हो जाएं। ऐसे समय तहसील, अस्पताल, पुलिस चौकी, एसडीआरएफ दल या दूरस्थ गांव के पास स्वतंत्र उपग्रह टर्मिनल हो तो मौसम सूचना, चिकित्सा परामर्श, राहत समन्वय और लोगों की स्थिति तत्काल साझा की जा सकती है।
सीमाओं पर इंटरनेट का सामरिक अर्थ
भारत की करीब 15 हजार किलोमीटर लंबी स्थल सीमा और 7,500 किलोमीटर से अधिक समुद्री तटरेखा है। सीमा के अनेक हिस्से हिमालय, रेगिस्तान और दुर्गम जंगलों से गुजरते हैं। इसलिए संचार यहां नागरिक सुविधा के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है।
अरुणाचल से लद्दाख और उत्तराखंड से सिक्किम तक सीमांत आबादी को मजबूत डिजिटल संपर्क मिलने का अर्थ है बेहतर प्रशासन, टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा, बैंकिंग, ई-गवर्नेंस और स्थानीय अर्थव्यवस्था। सीमा पर बसे गांव खाली न हों, इसके लिए सड़क और रोजगार जितने जरूरी हैं, उतनी ही जरूरी आज डिजिटल कनेक्टिविटी भी हो गई है।
इसी कारण विदेशी उपग्रह नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भरता का प्रश्न भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संचार का यह ढांचा भविष्य में बैंकिंग, रक्षा, परिवहन, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक सूचनाओं से जुड़ सकता है। इसलिए भारत को विदेशी सेवाओं का लाभ लेते हुए अपनी स्वदेशी क्षमता भी विकसित करनी होगी।
अब मुकाबला केवल स्टारलिंक का नहीं
कुछ वर्ष पहले वैश्विक निम्न-पृथ्वी-कक्षा उपग्रह इंटरनेट लगभग स्टारलिंक का पर्याय दिखाई देता था। अब प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। भारत में स्टारलिंक के अलावा यूटेलसैट वनवेब और जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस जैसे खिलाड़ी मैदान में हैं, जबकि अमेजन लियो भी संभावित दावेदार है। फिलहाल व्यावसायिक शुरुआत के लिए स्पेक्ट्रम के अलावा सुरक्षा और दूसरी नियामकीय स्वीकृतियां महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।
पारंपरिक भूस्थिर उपग्रह पृथ्वी से लगभग 36 हजार किलोमीटर ऊपर रहते हैं। इसके विपरीत नई पीढ़ी के लो-अर्थ-ऑर्बिट यानी LEO उपग्रह कुछ सौ से करीब दो हजार किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षाओं में चलते हैं। दूरी कम होने से सिग्नल आने-जाने में लगने वाला समय घटता है। लेकिन इसके लिए एक-दो नहीं, बड़ी संख्या में उपग्रहों का तारामंडल चाहिए क्योंकि प्रत्येक उपग्रह लगातार पृथ्वी के ऊपर अपनी स्थिति बदलता रहता है।
यही तकनीकी बदलाव सैटेलाइट इंटरनेट को पुराने, अपेक्षाकृत धीमे VSAT युग से अलग करता है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या पहाड़ का आदमी इसे खरीद पाएगा?
तकनीक की चमक के बीच भारत की जमीनी वास्तविकता नहीं भूलनी चाहिए। जिस परिवार के लिए कुछ सौ रुपये का मासिक मोबाइल रिचार्ज भी खर्च का महत्वपूर्ण हिस्सा है, वह महंगा उपग्रह टर्मिनल और ऊंचा मासिक शुल्क कैसे वहन करेगा?
यही इस क्रांति की सबसे बड़ी कसौटी होगी।
यदि सैटेलाइट इंटरनेट मुख्यतः महानगरों के संपन्न उपभोक्ताओं, कॉरपोरेट संस्थानों, विमानों और पर्यटन प्रतिष्ठानों की प्रीमियम सेवा बन गया तो इसका सामाजिक उद्देश्य सीमित रह जाएगा। सरकार ने दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने पर स्पेक्ट्रम शुल्क में एक प्रतिशत अंक की राहत का रास्ता चुना है, लेकिन ग्रामीण टर्मिनलों पर प्रत्यक्ष सब्सिडी संबंधी ट्राई का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया।
इसलिए नीति को केवल कंपनियों के प्रवेश तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हिमालयी और सीमांत क्षेत्रों में स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, पंचायत घर, पुलिस चौकी और आपदा नियंत्रण केंद्र जैसे सार्वजनिक संस्थानों के लिए साझा सामुदायिक सैटेलाइट टर्मिनल विकसित किए जा सकते हैं। इससे एक कनेक्शन पूरे गांव के लिए डिजिटल द्वार बन सकता है।
फाइबर बनाम सैटेलाइट नहीं, दोनों का मेल
यह मानना भी गलत होगा कि उपग्रह इंटरनेट आते ही मोबाइल टावर और ऑप्टिकल फाइबर अप्रासंगिक हो जाएंगे। घनी आबादी वाले शहरों और मैदानी क्षेत्रों में फाइबर प्रति इकाई डेटा कहीं अधिक किफायती और विशाल क्षमता वाला माध्यम बना रहेगा। 5जी और आगे चलकर 6जी नेटवर्क भी स्थलीय ढांचे पर निर्भर रहेंगे।
भारत के लिए सही मॉडल इसलिए फाइबर + मोबाइल + सैटेलाइट का होगा। मैदान और शहर फाइबर पर, सामान्य ग्रामीण क्षेत्र फाइबर तथा मोबाइल के मिश्रण पर और अत्यंत दुर्गम, द्वीपीय, आपदाग्रस्त तथा सीमांत इलाके आवश्यकता के अनुसार उपग्रह संपर्क पर निर्भर हो सकते हैं। कहीं सैटेलाइट सीधे उपभोक्ता को इंटरनेट देगा तो कहीं वह दूरस्थ मोबाइल टावर का बैकहॉल बनेगा।
आसमान खुला है, लेकिन रास्ता अभी बाकी है
स्पेक्ट्रम शुल्क पर बनी सहमति एक महत्वपूर्ण दरवाजा जरूर खोलती है, मगर यह अंतिम मंजिल नहीं है। प्रस्ताव को अभी आगे की सरकारी स्वीकृतियों से गुजरना है और कंपनियों को सुरक्षा शर्तें पूरी करनी हैं।
भारत की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु में कोई उपभोक्ता अंतरिक्ष से कितनी तेज गति से फिल्म डाउनलोड कर सकता है। असली परीक्षा तब होगी जब चमोली के किसी सड़कविहीन गांव, लद्दाख की किसी चौकी, अरुणाचल की सीमांत बस्ती या अंडमान के किसी दूरस्थ द्वीप का विद्यार्थी बिना नेटवर्क टूटे ऑनलाइन कक्षा में शामिल हो सके; मरीज विशेषज्ञ डॉक्टर से बात कर सके और आपदा में गांव देश-दुनिया से कटा न रहे।
**भारत ने अंतरिक्ष तक पहुंचने की लड़ाई बहुत पहले जीत ली थी। अब चुनौती उसी अंतरिक्ष को अपने अंतिम नागरिक तक पहुंचाने की है।**
