हरित हाइड्रोजन: भविष्य का महात्वाकांक्षी ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में भारत की नई उड़ान
-ज्योति रावत –
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान के इस दौर में दुनिया तेजी से ऐसे ऊर्जा विकल्पों की तलाश कर रही है, जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाएं। इसी खोज में ‘हाइड्रोजन’ एक जादुई समाधान के रूप में उभरा है। ब्रह्मांड में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला यह तत्व जब ईंधन के रूप में जलता है, तो धुएं या जहरीली गैसों के बजाय केवल पानी (H₂O) और शुद्ध ऑक्सीजन पैदा करता है। यही कारण है कि इसे भविष्य का सबसे आदर्श और स्वच्छ ऊर्जा वाहक माना जा रहा है। हालांकि, हाइड्रोजन अपने आप में शुद्ध रूप में नहीं मिलता; इसे अन्य तत्वों (जैसे पानी या प्राकृतिक गैस) से अलग करना पड़ता है। इसे अलग करने की प्रक्रिया के आधार पर ही इसके प्रदूषणकारी या स्वच्छ होने का निर्धारण होता है, जिसे विज्ञान की भाषा में हाइड्रोजन के ‘रंगों’ से पहचाना जाता है।
हाइड्रोजन के रंग: ग्रे, ब्लू और हरित
वर्तमान में दुनिया भर में सबसे अधिक ‘ग्रे हाइड्रोजन’ (Grey Hydrogen) का उत्पादन और उपयोग होता है। इसे प्राकृतिक गैस या कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों को जलाकर बनाया जाता है। यह प्रक्रिया सस्ती तो है, लेकिन इसमें भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जित होती है, जो सीधे वायुमंडल में घुलकर प्रदूषण बढ़ाती है। इस प्रदूषण को कम करने के लिए ‘ब्लू हाइड्रोजन’ (Blue Hydrogen) का कंसेप्ट लाया गया। यह भी प्राकृतिक गैस से ही बनता है, लेकिन इसमें से निकलने वाले कार्बन को हवा में छोड़ने के बजाय आधुनिक तकनीकों से सोखकर (Carbon Capture) ज़मीन के बहुत नीचे गहराई में सुरक्षित स्टोर कर दिया जाता है। यह ग्रे हाइड्रोजन से बेहतर है, लेकिन पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है।
इन सबसे अलग और पर्यावरण के लिए शत-प्रतिशत सुरक्षित है— ‘हरित हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen)। इसे बनाने के लिए जीवाश्म ईंधनों का नहीं, बल्कि पानी (H₂O) का इस्तेमाल किया जाता है। सौर या पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय (Renewable) और स्वच्छ बिजली का उपयोग करके पानी को इलेक्ट्रोलाइसिस प्रक्रिया के जरिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया की नज़रें हरित हाइड्रोजन के उत्पादन को सस्ता और सुलभ बनाने पर टिकी हैं।
वैज्ञानिक नवाचार: धातु-मुक्त और सस्ती तकनीक की ओर कदम
हरित हाइड्रोजन के उत्पादन में सबसे बड़ी बाधा इलेक्ट्रोलाइसिस प्रक्रिया का महंगा होना है। पारंपरिक रूप से सूर्य की रोशनी का उपयोग कर पानी को तोड़ने (फोटोकैटेलिसिस) के लिए प्लेटिनम जैसी महंगी धातुओं और जटिल अकार्बनिक रसायनों की आवश्यकता होती है। लेकिन हाल ही में बेंगलुरु स्थित ‘सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज’ (CeNS) के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक बड़ी सफलता हासिल की है।
भारतीय वैज्ञानिकों की इस टीम ने महंगी धातुओं का विकल्प खोजते हुए पूरी तरह से धातु-मुक्त और जैविक तरीका ईजाद किया है। उन्होंने प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एक अमीनो एसिड (एस्पार्टिक एसिड) को रोशनी सोखने वाले एक कार्बनिक अणु के साथ जोड़ दिया। पानी में जाते ही ये अणु खुद-ब-खुद जुड़कर एक व्यवस्थित नैनोशीट में बदल जाते हैं, जो सूर्य की रोशनी को कहीं अधिक प्रभावी ढंग से सोखती है। यह तकनीक न केवल हरित हाइड्रोजन के उत्पादन को 18 प्रतिशत अधिक प्रभावी बनाती है, बल्कि यह भविष्य में इस स्वच्छ ईंधन को व्यावसायिक रूप से सस्ता बनाने का एक नया मार्ग भी खोलती है।
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: भारत का विजन
हरित हाइड्रोजन के इसी महत्व को समझते हुए भारत सरकार ने एक बेहद महात्वाकांक्षी कदम उठाते हुए ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ (National Green Hydrogen Mission) की शुरुआत की है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात के लिए एक ‘ग्लोबल हब’ (वैश्विक केंद्र) बनाना है।
इस मिशन के तहत सरकार ने वर्ष 2030 तक देश में प्रतिवर्ष कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। इसके लागू होने से देश को कई मोर्चों पर फायदा होगा। एक ओर जहां कच्चे तेल (Crude Oil) और जीवाश्म ईंधनों के आयात पर भारत की निर्भरता काफी हद तक कम होगी, जिससे लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचेगी; वहीं दूसरी ओर, इसके उपयोग से 2030 तक लगभग 50 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। इसके अलावा, इस मिशन से ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र में लाखों नए रोज़गार पैदा होने की भी उम्मीद है।
हरित हाइड्रोजन अब केवल एक वैज्ञानिक परिकल्पना नहीं, बल्कि एक ज़मीनी हकीकत बनने जा रहा है। नवाचारों के ज़रिए उत्पादन लागत को कम करने के प्रयास और सरकार की दृढ़ नीतियां यह सुनिश्चित कर रही हैं कि आने वाले दशकों में हमारे उद्योग, परिवहन और ऊर्जा जरूरतें जीवाश्म ईंधनों से मुक्त हो सकें। भारत का यह कदम न केवल उसकी अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भी एक निर्णायक मील का पत्थर साबित होगा।
