लोकतंत्र के घुमंतू मतदाता…

–अरुण श्रीवास्तव
आज़ यदि ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ के रचयिता महापंडित राहुल सांकृत्यायन जिंदा होते तो एसआईआर की वर्तमान स्थिति को देखते हुए घुमक्कड़ मतदाताओं पर लेख जरूर लिखते। क्योंकि न केवल आज़ पार्टियों के ‘स्टार प्रचारक ही घूम-घूमकर जनसभाएं व रैलियां कर रहे हैं बल्कि श्रद्धालु/कृपालु मतदाता भी घूम घूमकर अपने मतों का दान कर रहे हैं गोया यह नेत्रदान की तरह महादान हो गया हो और चुनाव लड़ रहे दल भी ‘बहती गंगा में हाथ धोकर’ पुण्य कमाने का अवसर गंवाना नहीं चाहते और लाभार्थी मतदाताओं को भी प्रवासी पक्षियों की तरह अपने घर जाने का निर्बाध मौका मिलता है। न किराया-भाड़ा लगना और न खाने-पीने का खर्च। प्रवासी पक्षी हर साल सीज़न में जाते हैं इन्हें लोकसभा व विधानसभा चुनाव में जाने का सुनहरा अवसर मिल जाता है।
यानी ‘हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा’।
प्रवासी पक्षी मौसम बदलने के दौरान अपने रैन-बसेरे तलाशते नजर आते हैं बाकी घुमंतू मतदाता वन नेशन वन इलेक्शन लागू न होने तक लोस और विस चुनाव तक किसी भी राज्य मुफ्त में जाकर वोट डाल सकते हैं और उसके बाद सुरक्षित आ भी सकते हैं।
गौरतलब है कि एसआईआर में बेदखल किए गए नामों में से अपील करने वालों का बड़ा हिस्सा फिर शामिल करा दिया गया। माना अपील न करते तो …
अब ये सवाल लाजिमी होने के बाद भी मत करिएगा कि, जब बाद में नाम शामिल कराना ही था तो सूची ‘शुद्ध’ करने की खातिर शामिल ही क्यों किया। स्टेशनरी, बिजली-पानी का खर्च तो पानी में गया और जितने बीएलओ की ज़ानें गईं वो किस खाते में जाएगी?
हाल की रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अपील करने वाले लगभग 1.2 लाख लोगों में करीब 93% को न केवल राहत मिली बल्कि उनके नाम भी बहाल कर दिए गए।
आखिर “आज़ादी के अमृत काल” के मतदाता भी तो हैं। फ़िर वैसे भी पांच साल वे या तो विकास के नक्शे से गायब कर दिए जाते हैं या फिर फाइलों के धूल भरे पन्नों के बीच कहीं गुमशुदा कर दिए जाते हैं। यह विडंबना ही तो है कि जिस देश में आम दिनों में आदमी की कीमत पानी के मोल भी नहीं आंकी जाती, वहां चुनाव की एक सुबह वह अचानक वीआईपी प्रजाति में तब्दील हो जाता है।
ज़रा दिमाग (यदि हो तो) पर जोर डालिए, यदि किसी राज्य में लाखों नाम महज़ इसलिए हटा दिए गए कि वे मतदाता ही नहीं थे, आखिर आज़ादी के अमृत महोत्सव में वोटर लिस्ट को भी तो पवित्र करना है। अब ये बात अलग है कि,
उनमें से बहुत बड़ी संख्या को अपील करने पर फिर मतदाता मान लिया जाए और मान भी तो लिया गया।
अब विपक्ष में सवाल उठेंगे कि गलत कौन था मतदाता, सूची बनाने वाला या
सर्वे करने-कराने वाला?
अब इसे व्यवस्था का कमाल कहें या मजबूरी! जो 23 साल तक पहले किसी को मतदाता मानती थी, फिर नहीं मानती और फिर अपील करने पर दोबारा मान लेती है? यानी अपील करो…ये कागज लेकर आओ, वो कागज़ लेकर आओ, सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाओ, सरकारी बाबुओं की ज़ेबें गरम करो तब मानेंगे की तुम मतदाता हो वो भी क्योंकि ये नया इंडिया है और तुम इस नए इंडिया के मतदाता हो वो भी ‘पवित्र’। बंगाल वालों की तरह। यहां के 93% मतदाता पवित्रता सूची में शामिल कर लिए गए।
चूंकि दिल्ली दिल वालों की है और फिर राजधानी भी। सो एसआईआर के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम संदिग्ध या पुराने रिकॉर्ड से असंबद्ध पाए गए। यहां तक तो सब सामान्य रहा, जब इनमें से कुछ वीआईपी निकले तब भी खुदबुदाहट नहीं हुई। खुदबुदाहट तब हुई जब कुछ सत्ता पक्ष खेमे के निकले यानी ‘वीवीआईपी’। अब तो हंगामा होना ही था सो हुआ भी। क्योंकि ऐरा-गैरा नहीं वीवीआईपी थे और उनमें से कुछ सत्ता पक्ष के।
बहरहाल… जब इतने वर्षों से लोकतंत्र की मशीनरी ऐसे लोगों के वोटों पर चल रही थी जो वास्तव में मतदाता थे ही नहीं? तो फिर अगला सवाल अपने आप पैदा होता है,
अगर मतदाता ही फर्जी थे तो इन कथित मतदाताओं द्वारा चुनीं गईं सरकारें कैसी थीं?
और गर उन्हीं मतदाताओं ने सरकार चुनी थी तो क्या सरकार भी फर्जी थी?
अब यह मत करिएगा कि, मैं किसी राज्य सरकार या सरकारों को फर्जी कह रहा हूं।
यह व्यंग्य का है, फैसला नहीं।
फिर नोटिस मिलना ये तो सिद्ध नहीं करता कि मतदाता ही फर्जी है। चूंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार बचा है।
इसलिए सवाल पूछते रहिए। और यह भी कि, विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में यदि मतदाता सूची बढ़ने के बजाए घटती या ठहरती दिखाई दे रही है, तो नागरिक वयस्क होना बंद हो या हमारी मतदाता सूचियां नागरिकों तक पहुंचना बंद हो जाए तो?
और कहीं ऐसा न हो कि अंत में मतदाता सूची की जगह एसआईआर ही रद्द हो जाए तो …?
अरुण श्रीवास्तव देहरादून।
