किच्छा और सिरोलीकलां ने बढ़ा दी भाजपा की चिंता

–दिनेश शास्त्री-
उधमसिंह नगर जिले की किच्छा नगर पालिका और उसके पास ही सिरोलीकलां नगर पंचायत के नतीजों ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। यह नतीजे ऐसे मौके पर आए हैं जब राज्य विधानसभा चुनाव से चंद कदम दूर है। क्या यह हांडी के चावल का हाल है या महज एक चेतावनी? दोनों स्थितियां सत्तारूढ़ भाजपा की चिंता बढ़ाने वाली हैं। किच्छा में भाजपा के राजेश शुक्ला की प्रतिष्ठा दांव पर थी। साथ ही डबल इंजन की साख भी, सिरोली कलां नवगठित नगर पंचायत है, वहां तो उम्मीद की जा रही थी कि निकाय बनाने का भाजपा को लाभ होगा और लोग उसे सिर पर उठाएंगे लेकिन दोनों जगहों पर भाजपा चारों खाने चित्त हुई है और यह दूरगामी संदेश है।
किच्छा नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की है। वहां कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह के सिर जीत का सेहरा बंधा है। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के संदीप अरोड़ा को 6,200 वोटों के अंतर से पराजित किया है। राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर कांग्रेस की विजय को किच्छा के विधायक तिलकराज बेहड़ की व्यक्तिगत जीत भी माना जा रहा है। निसंदेह उन्होंने खूब पसीना बहाया और भाजपा की नाक में दम किए रखा लेकिन कोशिश भाजपा ने भी भरपूर की थी। यह अलग बात है कि रूठे हुए मतदाता को वह बूथ तक पहुंचाने में चूक गई। यदि यहां भी सिरोलीकलां के समान मतदान होता तो नतीजे में अंतर ज्यादा स्पष्ट होता।
दूसरी ओर सिरौली कलां नगर पंचायत के चुनाव में कांग्रेस की राशिदा बेगम ने परचम लहराया है। हालांकि यहां भाजपा ने प्रत्याशी नहीं दिया था लेकिन प्रचार के दौरान माना जा रहा था कि निर्दलीय फरहीन जहां को भाजपा का समर्थन है। राशिदा बेगम ने भी 1773 मतों के अंतर से जीत दर्ज की है। कांग्रेस इन नतीजों से बेहद गदगद है। कांग्रेस की प्रारंभिक टिप्पणी थी थी कि इस विजय ने जनता का झुकाव स्पष्ट कर दिया है और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए साफ संकेत है।
अगर सचमुच यह बदलाव की बयार है तो भाजपा के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। खासकर शहरी इलाकों में उसे अपना जनाधार बनाए रखने के लिए अब अतिरिक्त पसीना बहाना पड़ेगा जबकि कांग्रेस को भी इतराने की जरूरत नहीं दिखती। जाहिर है इन दोनों जगहों पर समुदाय विशेष ने अपना रुख स्पष्ट किया है कि वे किस दिशा में बढ़ रहे हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि देश में चल रही तमाम लोक कल्याण की योजनाओं के लाभ से कोई वर्ग वंचित रह गया हो। उदाहरण के लिए सिर्फ प्रधानमंत्री आवास योजना का ही संदर्भ लें तो प्रदेश में करीब चालीस हजार लोगों को पक्की छत मिली है लेकिन अभी तक ऐसी कोई शिकायत नहीं है कि किसी वर्ग विशेष को वंचित किया गया हो। अलबत्ता अभी भी अनेक लोगों को एक अदद पक्की छत की जरूरत है किंतु अब तक जितने भी लोगों को आवंटन हुआ उनमें कोई वर्ग भेद नहीं मिला है। इसी तरह की अन्य योजनाओं को गिना जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि योजनाओं के लाभार्थी का चुनाव में समर्थन कोई अनिवार्यता है।
किच्छा में करीब 26 हजार मतदाता थे तो सिरोलीकलां में यह संख्या दस हजार के करीब थी। किच्छा में करीब 40 फीसदी मतदान हुआ तो सिरोलीकलां में यह आंकड़ा 75 फीसदी के पार गया। तराई की राजनीति के जानकार मानते हैं कि दोनों निकायों में एकतरफा मतदान हुआ। कांग्रेस के लोग फिलवक्त गदगद हैं कि उन्होंने दोनों निकाय हथिया लिए, किंतु एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि दोनों जगह जीत के लिए सोशल मीडिया पर जो अभिव्यक्ति हो रही है वह कांग्रेस को भारी भी पड़ सकती है। तराई में वर्ग विशेष का वोट कांग्रेस अगर पक्का मान कर उत्साहित है तो यह भी याद रखने की बात है कि इससे ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ सकता है और बाकी सीटों पर उसे कीमत चुकानी पड़ सकती है। 2022 के चुनाव को कौन भुला सकता है जब एक अदद यूनिवर्सिटी के नाम पर ध्रुवीकरण हुआ और सारा सत्ताविरोधी रुझान छू मंतर हो गया। 2022 का चुनाव एक नजीर है कि आप कैसे सर्व समाज को एक कर सकते हैं और उसके विपरीत परिस्थितियों के नतीजे क्या हो सकते हैं। कम लिखे को ज्यादा समझेंगे तो हांडी का वास्तविक हाल समझ में आ सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक और इस न्यूज़ पोर्टल के सलाहकार मंडल के सदस्य हैं -एडमिन )

