विद्यालयों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक विकास पर जोर
पीएम श्री विद्यालयों के प्रधानाचार्यों और शिक्षकों को प्रशिक्षण, बच्चों के व्यवहार में बदलाव पहचानने तथा सहयोगात्मक वातावरण बनाने पर मंथन

देहरादून, 10 अक्टूबर। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर शनिवार को देहरादून में आयोजित कार्यशाला में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक सुरक्षा और सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण को विद्यालयी शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया। रेसकोर्स स्थित ट्रांजिट हॉस्टल में आयोजित कार्यशाला में नैनीताल के पीएम श्री विद्यालयों के प्रधानाचार्यों और शिक्षकों ने भाग लिया।
कार्यशाला में निदेशक, अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण बंदना गर्ब्याल मुख्य अतिथि तथा समग्र शिक्षा उत्तराखंड के स्टाफ ऑफिसर डॉ. बी.पी. मैंदोली विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों को बच्चों की मानसिक और भावनात्मक आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाना तथा विद्यालयों में सुरक्षित, सहयोगात्मक और समावेशी वातावरण विकसित करने के उपायों से परिचित कराना था।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने कहा कि विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य उनके शैक्षिक प्रदर्शन, आत्मविश्वास, व्यवहार और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करता है। इसलिए शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा परिणामों तक सीमित रखने के बजाय बच्चों के संतुलित व्यक्तित्व विकास पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
शिक्षकों को विद्यार्थियों के व्यवहार में अचानक बदलाव, असामान्य चुप्पी, सामाजिक अलगाव, आत्मविश्वास में कमी और सीखने में कठिनाइयों जैसे संकेतों के प्रति सजग रहने की सलाह दी गई। ऐसे मामलों में बच्चों के व्यवहार को तत्काल अनुशासनहीनता मानने के बजाय उनसे संवाद स्थापित करने तथा आवश्यकता पड़ने पर अभिभावकों और विशेषज्ञों का सहयोग लेने पर जोर दिया गया।
कार्यशाला में मनोदर्पण प्रकोष्ठ की ओर से विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक कल्याण से संबंधित उपायों की जानकारी दी गई। बच्चों में सकारात्मक सोच, भावनात्मक संतुलन, सहानुभूति, सहयोग और तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता विकसित करने पर विशेष चर्चा हुई।
समग्र शिक्षा के स्टाफ ऑफिसर डॉ. बी.पी. मैंदोली ने कहा कि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास तभी संभव है, जब शैक्षिक उपलब्धियों के साथ उनकी सामाजिक और भावनात्मक क्षमताओं पर भी समान ध्यान दिया जाए। मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य जितनी ही गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है। बच्चों में आत्मविश्वास, संवेदनशीलता, सहयोग और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना भी उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
कार्यशाला में सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक शिक्षण की अवधारणा पर भी विचार-विमर्श किया गया। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों में आत्म-जागरूकता, भावनात्मक नियंत्रण, जिम्मेदार निर्णय लेने, संवाद कौशल और दूसरों की भावनाओं को समझने की क्षमता विकसित करने के व्यावहारिक उपाय बताए गए।
सहयोगी संस्थाओं ड्रीम ए ड्रीम और लाभ्य फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने अनुभव आधारित गतिविधियों, सामूहिक शिक्षण, जीवन कौशल और सकारात्मक संवाद के माध्यम से बच्चों के भावनात्मक विकास को प्रोत्साहित करने के उपायों की जानकारी दी।

