गौचर हवाई पट्टी पर सेना का पैराशूट प्रशिक्षण शुरू, आसमान से उतरते जवानों को देखने उमड़े लोग

–दिग्पाल गुसाईं की रिपोर्ट-
गौचर, 16 अक्टूबर। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण गौचर हवाई पट्टी पर सेना ने एक बार फिर पैराशूट के माध्यम से आसमान से जमीन पर उतरने का प्रशिक्षण शुरू कर दिया है। शुक्रवार को हवाई पट्टी पर जवानों के पैराशूट से उतरने का अभ्यास स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण और कौतूहल का विषय बना रहा।
चमोली जिले के गौचर में वर्ष 2000 में बनकर तैयार हुई इस हवाई पट्टी का निर्माण शुरू से ही विवादों में रहा है। क्षेत्र की अत्यंत उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण का स्थानीय काश्तकारों ने कड़ा विरोध किया था। उस समय शासन-प्रशासन ने किसानों को भरोसा दिलाया था कि हवाई पट्टी बनने से क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इसके बावजूद किसान अपनी पुश्तैनी जमीन और आजीविका के साधन छोड़ने को तैयार नहीं थे।
भूमि अधिग्रहण का मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक पहुंचा। बताया जाता है कि न्यायालय में तत्कालीन सरकार ने सीमांत क्षेत्र की सामरिक आवश्यकताओं का हवाला देते हुए हवाई पट्टी के निर्माण को जरूरी बताया था। इसके बाद भूमि अधिग्रहण का रास्ता साफ हुआ और किसानों की उपजाऊ जमीन पर हवाई पट्टी का निर्माण किया गया। उस समय अधिग्रहीत भूमि के लिए किसानों को 55 हजार रुपये प्रति नाली की दर से मुआवजा दिया गया था।
हवाई पट्टी के निर्माण को 26 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन यहां से अब तक नियमित यात्री विमान सेवा शुरू नहीं हो सकी है। इससे पर्यटन विकास और स्थानीय रोजगार को लेकर उस समय किए गए वादे भी पूरी तरह साकार नहीं हो पाए हैं।
हालांकि, सेना की ओर से समय-समय पर यहां आयोजित प्रशिक्षण गतिविधियां इस हवाई पट्टी के सामरिक महत्व को रेखांकित करती रही हैं। सीमांत क्षेत्र के निकट स्थित होने के कारण सैन्य गतिविधियों के लिए इसकी उपयोगिता मानी जाती है।
शुक्रवार को एक बार फिर सेना के जवानों ने पैराशूट से उतरने का अभ्यास किया। आसमान में खुलते रंग-बिरंगे पैराशूट और उनसे सुरक्षित जमीन पर उतरते जवानों को देखकर स्थानीय लोगों में खासा उत्साह दिखाई दिया। यह प्रशिक्षण जहां सेना की परिचालन तैयारियों का हिस्सा है, वहीं इसने गौचर हवाई पट्टी के निर्माण के मूल उद्देश्य और इसके नागरिक उपयोग को लेकर पुरानी बहस भी ताजा कर दी है।

