शिक्षा/साहित्य

हर साल मुझे ही क्यों जलाते हो?

-अरुण श्रीवास्तव देहरादून –
—————————

मुझे सदियों से जलाते आ रहे हो,आखिर कब तक जलाओगे?
हर साल मेरी ही लाश जलाकर किस पाप से मुक्ति पाओगे?

हाँ, अपराधी था मैं,
सीता का किया था अपहरण,
मगर इतना तो मानोगे उन्हें अपमानित नहीं किया,
उनकी इच्छा के विरुद्ध
उन्हें हाथ तक नहीं लगाया।

मेरे अपराध की सजा
हर साल दे रहे हो तुम,
पर अपने भीतर के रावण को किस दिन जलाओगे तुम?

अगर है नैतिक साहस तो इंद्र का पुतला जलाओ,
अहिल्या की देह पर हुए छल का
हिसाब चुकाओ।

जिसने पति का भेष धरकर
उसकी अस्मिता को लिया छल,
उसके अपराध पर कब
जताया क्रोध?

जलाओ आसाराम का पुतला,
राम रहीम से भी करो सवाल,
धर्म की चादर ओढ़े चेहरों से
उनके कर्मों का मांगों हिसाब।

पर ठहरो!
यह सब करना आसान नहीं,
इनके दरबार बड़े हैं,
लंबी हैं कतारें भक्तों की।

मुझे जलाना बहुत आसान है,
मैं पलटकर वार नहीं करता,
मेरे पुतले की राख से
तुम्हारा सिंहासन नहीं हिलता।

मैं तो हर साल जल जाऊँगा,
तुम्हारे उत्सव भी होते रहेंगे,
लेकिन जब तक स्त्री की चीखें
न्याय के लिए भटकती रहेंगी,
तब तक तुम्हारे ये उत्सव
तुमसे सवाल करते रहेंगे।

इसलिए, हे मेरे हत्यारो!
मेरे पुतले को आग लगाने से पहले
अपने भीतर झांककर देखना।
कहीं तुम्हारे भीतर कोई रावण तो नहीं?

अरुण श्रीवास्तव देहरादून।
8218070103.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!