चुनाव आयोग में अधिकारों को लेकर टकराव, दो चुनाव आयुक्तों की शिकायत पर कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई से किया था इनकार
सूचना के अधिकार से सामने आए दस्तावेजों में खुलासा; चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ अधिकारी की कार्यप्रणाली पर उठाए थे सवाल, आयोग की स्वायत्तता का हवाला देकर सरकार ने हस्तक्षेप से किया परहेज
नई दिल्ली, 25 अक्टूबर। देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने वाले भारत निर्वाचन आयोग के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों के अधिकारों और कार्यविभाजन को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। आयोग के दो चुनाव आयुक्तों, डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने एक वरिष्ठ अधिकारी की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताते हुए कैबिनेट सचिव से हस्तक्षेप की मांग की थी, लेकिन कैबिनेट सचिवालय ने आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता का हवाला देते हुए कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। यह जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त सरकारी दस्तावेजों से सामने आई है।
समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) की 22 अक्टूबर की रिपोर्ट और एनडीटीवी की 23 अक्टूबर की स्वतंत्र रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। उनका आरोप था कि गर्ग ने निर्वाचन आयोग की पूर्व स्वीकृति लिए बिना वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कार्यों और जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण कर दिया था।
विवाद की शुरुआत 28 जुलाई को हुई, जब उप निर्वाचन आयुक्त (प्रशासन) भानु प्रकाश येतुरु के अवकाश पर रहने के कारण मनीष गर्ग को प्रशासनिक विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। दोनों चुनाव आयुक्तों के अनुसार, अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही घंटों के भीतर गर्ग ने वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्तों, उप निर्वाचन आयुक्तों, महानिदेशकों तथा समकक्ष अधिकारियों के बीच कार्यविभाजन में परिवर्तन का आदेश जारी कर दिया। आरोप है कि इस निर्णय से पहले न तो आयोग की सामूहिक स्वीकृति ली गई और न ही संबंधित अधिकारियों से परामर्श किया गया।
चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने अपने पत्रों में कहा कि आयोग के अधिकारियों को पहले भी मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे कि आयोग की अनुमति के बिना इस प्रकार के प्रशासनिक परिवर्तन नहीं किए जाएं। इसके बावजूद आदेश जारी किया गया। विवेक जोशी ने यह शिकायत भी की कि संबंधित फाइल मांगने पर प्रशासनिक विभाग ने उन्हें उपलब्ध नहीं कराई।
मतदाता सूची के नियंत्रण को लेकर भी उठे सवाल
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू निर्वाचन आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और मतदाता सूचियों के प्रबंधन से जुड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व रिपोर्ट के अनुसार, कार्यविभाजन में प्रस्तावित बदलाव से मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन से संबंधित तकनीकी प्रक्रियाओं पर आयोग मुख्यालय का नियंत्रण बढ़ने की आशंका जताई गई थी।
आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संचालित व्यवस्थाओं और क्षेत्रीय अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे थे। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कार्यविभाजन संबंधी आदेश को लेकर आपत्ति और मतदाता सूची में वास्तविक अनियमितता साबित होना दो अलग विषय हैं। उपलब्ध दस्तावेजों से मतदाता सूचियों में किसी अवैध परिवर्तन की पुष्टि नहीं होती।
निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को जारी अपने स्पष्टीकरण में कहा था कि संबंधित अधिकारी द्वारा जारी विवादित कार्यविभाजन आदेश दोनों चुनाव आयुक्तों के निर्देश के बाद लागू ही नहीं किए गए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत एक अधिकारी के आचरण से संबंधित थे।
कैबिनेट सचिवालय ने क्यों नहीं की कार्रवाई?
सेवानिवृत्त कमोडोर एवं सूचना अधिकार कार्यकर्ता लोकेश के. बत्रा ने 24 सितंबर को सूचना के अधिकार के तहत दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों, उन पर की गई कार्रवाई और संबंधित सरकारी टिप्पणियों की प्रतियां मांगी थीं। कैबिनेट सचिवालय ने उन्हें 14 पृष्ठों के दस्तावेज उपलब्ध कराए।
इन दस्तावेजों के अनुसार, 3 अगस्त को तैयार एक सरकारी टिप्पणी में मुख्य चुनाव आयुक्त की राय लेने का प्रस्ताव रखा गया था। अगले दिन की टिप्पणी में कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र गंभीरता से लिए जाने योग्य हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत हैसियत से लिखे गए हैं। इसलिए उन्हें संपूर्ण निर्वाचन आयोग का औपचारिक निर्णय नहीं माना जा सकता।
कैबिनेट सचिवालय ने यह भी तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कार्यपालिका के हस्तक्षेप से उसे सुरक्षित रखा गया है। ऐसी स्थिति में आयोग की ओर से औपचारिक अनुरोध प्राप्त हुए बिना कार्रवाई करना उसकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप माना जा सकता है।
इसके बाद कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन ने 5 अगस्त को दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों की प्राप्ति स्वीकार करते हुए जवाब भेजा। इन पत्रों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के संबंधित अधिकारियों को भी भेजी गईं। मामले को भविष्य में संबंधित अधिकारी के बारे में प्रशासनिक निर्णय लेते समय विचार के लिए अभिलेखों में रखने की बात कही गई।
कानून में बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था
दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपने पत्रों में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का उल्लेख किया था। इस प्रावधान के अनुसार निर्वाचन आयोग का कार्य यथासंभव सर्वसम्मति से संचालित होना चाहिए। यदि किसी विषय पर मतभेद हो तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है।
इस व्यवस्था का महत्व इसलिए है क्योंकि आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका प्राप्त होने के बावजूद आयोग के सामूहिक निर्णयों के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
हालांकि, किसी अधिकारी के प्रशासनिक कार्यविभाजन संबंधी आदेश पर इस प्रावधान का किस सीमा तक प्रयोग होता है, यह संबंधित आदेश, आयोग के आंतरिक नियमों और अधिकृत निर्णय प्रक्रिया की जांच का विषय है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया था, लेकिन उपलब्ध दस्तावेज किसी न्यायिक अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा ऐसे उल्लंघन के अंतिम निर्धारण का प्रमाण नहीं हैं।
संवैधानिक स्वतंत्रता के साथ आंतरिक जवाबदेही का प्रश्न
इस प्रकरण ने एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रश्न सामने रखा है। निर्वाचन आयोग को सरकार के अनुचित हस्तक्षेप से सुरक्षित रखना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, लेकिन आयोग के भीतर वरिष्ठ पदाधिकारियों के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न होने पर उनके समाधान की पारदर्शी और प्रभावी व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
यहां विशेष तथ्य यह है कि तीन सदस्यीय आयोग के दो सदस्यों ने एक वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध लगभग समान शिकायतें कीं। इसके बावजूद कैबिनेट सचिवालय ने उन्हें आयोग का औपचारिक सामूहिक पत्र नहीं माना। इससे यह प्रश्न उठता है कि बहुमत में होने वाले चुनाव आयुक्तों की शिकायत को संस्थागत निर्णय का रूप देने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
फिलहाल सूचना के अधिकार से प्राप्त दस्तावेज यह स्थापित करते हैं कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने लिखित शिकायत की, कैबिनेट सचिवालय ने उसे गंभीरता से लिया और संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाया, लेकिन स्वयं दंडात्मक अथवा अन्य प्रत्यक्ष कार्रवाई नहीं की। उपलब्ध अभिलेखों से यह स्पष्ट नहीं होता कि बाद में आयोग के भीतर कोई औपचारिक जांच हुई या संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्रवाई की गई।
निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता केवल उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता पर नहीं, बल्कि उसके निर्णयों की पारदर्शिता, निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन और आंतरिक जवाबदेही पर भी निर्भर करती है। ऐसे में इस विवाद का संस्थागत समाधान सार्वजनिक विश्वास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
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