75 हजार साल पहले भी होती थी हत्या? प्राचीन मानव के जीवन के चौंकाने वाले रहस्य

नई पुरातात्विक खोजों से पता चला कि आधुनिक मानव के प्राचीन रिश्तेदार लकड़ी के हथियार और घर बनाते थे। वे घायल साथियों की देखभाल भी करते थे, लेकिन उनके जीवन में हिंसा के संकेत भी मिले हैं।
By Franz Lidz
प्रागैतिहासिक मानव की कल्पना करते समय हमारे सामने प्रायः एक ऐसे आदिम प्राणी की तस्वीर उभरती है, जो गुफाओं में रहता था, पत्थरों से बने औजारों का इस्तेमाल करता था और जंगली जानवरों का शिकार करके जीवन बिताता था। लेकिन हाल के वैज्ञानिक अनुसंधानों ने इस धारणा को चुनौती दी है। यूरोप और पश्चिम एशिया में हुई दो महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों से संकेत मिलता है कि आधुनिक मानव के प्राचीन रिश्तेदार निएंडरथल न केवल कुशल शिकारी थे, बल्कि लकड़ी के औजार बनाना, रहने के स्थानों को व्यवस्थित करना और अपने घायल साथियों की देखभाल करना भी जानते थे। दूसरी ओर, लगभग 75 हजार वर्ष पुराने एक कंकाल पर मिले घाव ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वे आपसी संघर्ष और हत्या जैसी हिंसक गतिविधियों में भी शामिल थे?
इन खोजों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि मानव सभ्यता के विकास को समझने के लिए अब तक पत्थर के औजारों और जीवाश्मों पर अत्यधिक निर्भरता रही है। लकड़ी, चमड़ा और पौधों से बनी वस्तुएं हजारों वर्षों में नष्ट हो जाती हैं। इसलिए प्रागैतिहासिक जीवन का बड़ा हिस्सा वैज्ञानिकों की नजरों से ओझल रहा है।
कौन थे निएंडरथल?
निएंडरथल मानव विकास की एक विलुप्त शाखा थे, जिन्हें वैज्ञानिक होमो निएंडरथलेंसिस कहते हैं। वे लगभग चार लाख वर्ष पहले अस्तित्व में आए और करीब 40 हजार वर्ष पहले विलुप्त हो गए। उनका विस्तार मुख्यतः यूरोप और पश्चिम एशिया में था। आधुनिक मानव अर्थात होमो सेपियंस और निएंडरथल के पूर्वजों में गहरा विकासवादी संबंध था।
भारत के संदर्भ में यह जानना दिलचस्प है कि निएंडरथल के प्रमाण मुख्यतः यूरोप और पश्चिम एशिया से मिले हैं, जबकि भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन मानव की दूसरी आबादियों तथा उनके पत्थर के औजारों के प्रमाण उपलब्ध हैं। आधुनिक मानव की अनेक आबादियों के आनुवंशिक इतिहास में निएंडरथल के साथ प्राचीन अंतःप्रजनन के संकेत भी मिलते हैं। भारतीय आबादियों में भी यह आनुवंशिक विरासत पाई जाती है।
75 हजार साल पुरानी मौत का रहस्य
इराकी कुर्दिस्तान की प्रसिद्ध शानिदार गुफा से प्राप्त एक निएंडरथल कंकाल ने वैज्ञानिकों के सामने नया रहस्य खड़ा कर दिया है। लगभग 75 हजार वर्ष पुराने इन अवशेषों में कंधे की हड्डी पर करीब आधा इंच व्यास का गोलाकार छेद मिला है।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की पुरामानवविज्ञानी एम्मा पोमेरोय और उनके सहयोगियों के अध्ययन के अनुसार, यह चोट किसी नुकीले लकड़ी के भाले से लगी हो सकती है। घाव की दिशा और बनावट से संकेत मिलता है कि हथियार कंधे के आसपास से शरीर में प्रवेश करके छाती की ओर बढ़ा होगा।
यदि यह व्याख्या सही सिद्ध होती है तो यह लकड़ी के हथियार से हुई प्रागैतिहासिक घातक हिंसा के सबसे पुराने पहचाने जा सकने वाले उदाहरणों में शामिल हो सकता है।
हालांकि वैज्ञानिकों में इस निष्कर्ष को लेकर पूर्ण सहमति नहीं है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी चोट शिकार के दौरान किसी जानवर के सींग से भी लग सकती थी। हड्डियों पर दबाव, मिट्टी के खिसकने या बाद में हुए नुकसान की संभावना भी जांच का विषय है। इसलिए इसे प्रमाणित हत्या के बजाय संभावित हिंसक मृत्यु का मामला कहना अधिक उचित होगा।
घायल व्यक्ति की देखभाल भी करते थे
इस कंकाल से जुड़ी दूसरी जानकारी कहीं अधिक मानवीय है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लगभग 45 वर्ष की आयु में मरने वाले इस व्यक्ति को मृत्यु से काफी पहले चेहरे और जबड़े पर गंभीर चोट लगी थी। उसका एक सामने का दांत टूट गया था और जबड़े की स्थिति बिगड़ गई थी।
इसके बावजूद वह लंबे समय तक जीवित रहा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसी अवस्था में भोजन जुटाना और उसे चबाना अत्यंत कठिन रहा होगा। संभव है कि उसके समूह के अन्य सदस्यों ने भोजन उपलब्ध कराने और उसकी सुरक्षा में सहायता की हो।
शानिदार गुफा पहले भी ऐसे निएंडरथल अवशेषों के लिए प्रसिद्ध रही है जिनमें गंभीर चोटों या शारीरिक अक्षमताओं के बावजूद लंबे समय तक जीवित रहने के प्रमाण मिले हैं।
इन खोजों से संकेत मिलता है कि निएंडरथल समाज में सहयोग और कमजोर सदस्यों की देखभाल की परंपरा रही होगी। हालांकि किसी घायल व्यक्ति का जीवित रहना अपने आप में सामूहिक देखभाल का अंतिम प्रमाण नहीं है।
स्पेन में मिली प्राचीन बढ़ईगीरी की कार्यशाला
निएंडरथल के जीवन का दूसरा आश्चर्यजनक पक्ष स्पेन के बार्सिलोना के निकट एब्रिक रोमानी नामक चट्टानी आश्रय में सामने आया है।
यहां लगभग 62 हजार से 40 हजार वर्ष पुराने पुरातात्विक स्तरों में लकड़ी की वस्तुओं के सैकड़ों निशान मिले हैं। सामान्य परिस्थितियों में लकड़ी इतनी लंबी अवधि तक सुरक्षित नहीं रहती। लेकिन इस स्थान पर खनिजयुक्त पानी ने लकड़ी के चारों ओर कैल्शियम कार्बोनेट जमा कर दिया। बाद में लकड़ी नष्ट हो गई, पर उसकी आकृति और सतह के निशान चूना पत्थर में सुरक्षित रह गए।
वैज्ञानिकों को इन प्राकृतिक सांचों के माध्यम से प्राचीन लकड़ी के औजारों और संरचनाओं की जानकारी मिली है।
स्पेन के शोधकर्ताओं ने 16 पुरातात्विक स्तरों में लकड़ी से संबंधित 597 निशानों का अध्ययन किया। इससे संकेत मिलता है कि निएंडरथल अलग-अलग कामों के लिए विभिन्न प्रकार की लकड़ियों का चयन करते थे।
लचीली लकड़ी और छाल का उपयोग पात्रों तथा घरेलू वस्तुओं के निर्माण में किया जाता रहा होगा, जबकि मजबूत लकड़ी से भाले और दूसरे औजार बनाए जाते थे।
एक विशेष खोज गदा जैसी लकड़ी की वस्तु की है, जिसमें पकड़ने के लिए हत्थे और अपेक्षाकृत भारी सिरे के संकेत मिले हैं। इससे अनुमान लगाया गया है कि निएंडरथल केवल लकड़ी को तोड़कर इस्तेमाल नहीं करते थे, बल्कि आवश्यकतानुसार उसे आकार भी देते थे।
हवा रोकने के लिए बनाते थे लकड़ी की दीवारें
स्पेन की खोज का एक महत्वपूर्ण पहलू आवास निर्माण से संबंधित है।
पुरातात्विक साक्ष्यों की व्याख्या के अनुसार, निएंडरथल अपने रहने के स्थानों को ठंडी हवाओं से बचाने के लिए लकड़ी की अवरोधक संरचनाएं बनाते थे। कुछ संरचनाओं की लंबाई लगभग 16 फुट तक होने का अनुमान है।
आश्रय के भीतर आग जलाने के अलग-अलग स्थान भी मिले हैं। इससे संभावना व्यक्त की गई है कि वे अपने निवास स्थान को भोजन पकाने, गर्मी प्राप्त करने और विश्राम जैसी गतिविधियों के लिए व्यवस्थित करते थे।
यदि ये निष्कर्ष पुष्ट होते हैं तो स्पष्ट होगा कि आवास निर्माण और घरेलू जीवन की अनेक बुनियादी तकनीकों की जड़ें आधुनिक मानव के उदय से भी पुरानी हैं।
हिंसा का इतिहास कितना पुराना?
निएंडरथल की संभावित हिंसक मृत्यु का मामला मानव इतिहास में हत्या के प्रश्न को भी नए सिरे से उठाता है।
स्पेन के सिमा दे लॉस हुएसोस स्थल पर लगभग 4 लाख 30 हजार वर्ष पुरानी एक खोपड़ी मिली थी, जिसमें आंख के ऊपर दो गंभीर चोटों के निशान थे। शोधकर्ताओं ने इसे जानबूझकर किए गए प्रहारों का संभावित प्रमाण माना था।
इससे संकेत मिलता है कि आपसी हिंसा का इतिहास आधुनिक मानव से भी पुराना हो सकता है। लेकिन किसी कंकाल पर चोट का निशान मिलने मात्र से हत्या, दुर्घटना और शिकार के दौरान लगी चोट के बीच निश्चित अंतर करना हमेशा संभव नहीं होता।
निएंडरथल के बारे में उभरती तस्वीर इसी कारण अधिक जटिल और दिलचस्प है। एक ओर वे अपने साथियों की देखभाल करते थे, दूसरी ओर उनके जीवन में संघर्ष और हिंसा की भी संभावना थी।
भारतीय पुरातत्व के लिए क्या मायने?
भारत में मध्य प्रदेश की भीमबेटका शैलाश्रय शृंखला, नर्मदा घाटी और दक्षिण भारत के अनेक पुरापाषाण स्थल प्राचीन मानव जीवन के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं। इन स्थलों से मिले पत्थर के औजार और अन्य अवशेष मानव तकनीक के विकास की जानकारी देते हैं।
स्पेन की खोज भारतीय पुरातत्वविदों को भी यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है कि क्या हमारे प्राचीन मानव पूर्वज लकड़ी, बांस और अन्य जैविक पदार्थों का व्यापक उपयोग करते थे, जिनके प्रमाण समय के साथ नष्ट हो गए?
विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप जैसे क्षेत्रों में, जहां बांस और लकड़ी प्राकृतिक रूप से उपलब्ध रहे हैं, यह अनुसंधान की महत्वपूर्ण दिशा हो सकती है। हालांकि इसके लिए प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण आवश्यक होंगे।
आदिम मानव की बदलती तस्वीर
इन अध्ययनों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि मानव विकास की कहानी केवल पत्थर के औजारों और शिकार की कहानी नहीं है। उसमें तकनीकी कौशल, आवास निर्माण, पारिवारिक सहयोग, सामाजिक संबंध और संघर्ष जैसे अनेक पहलू शामिल रहे होंगे।
निएंडरथल को लंबे समय तक आधुनिक मानव की तुलना में कम बुद्धिमान और असभ्य समझा जाता रहा। लेकिन नई खोजें बताती हैं कि वे अपने पर्यावरण को समझने, संसाधनों का चयन करने और परिस्थितियों के अनुसार तकनीक विकसित करने में सक्षम थे।
मानव सभ्यता का विकास किसी एक क्षण में नहीं हुआ। उसकी अनेक विशेषताएं लाखों वर्षों की विकासवादी प्रक्रिया में धीरे-धीरे आकार लेती रहीं।
आज जब हम आधुनिक तकनीक और अपनी बौद्धिक उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तब ये खोजें याद दिलाती हैं कि औजार बनाने, आश्रय तैयार करने और साथियों की सहायता करने की परंपराओं की जड़ें हमारी कल्पना से कहीं अधिक प्राचीन हैं। संभव है कि जिन गुणों को हम विशुद्ध रूप से आधुनिक मानव की पहचान मानते हैं, उनमें से अनेक हमारे विलुप्त विकासवादी रिश्तेदारों में भी मौजूद रहे हों।

