“अस्वीकृति में उठा हाथ “

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
“अस्वीकृति में उठा हाथ” आचार्य रजनीश की किताब का नाम है, जब तक वह ओशो नहीं हुए थे।७० के दशक में , *धर्मयुग* साप्मेंताहिक में उनके लेख छपते रहते थे और एक बार तो मैंने आकाशवाणी की राष्ट्रीय व्याख्यानमाला में उनका दो दिवसीय भाषण सुना था, जो दो किश्तों में प्रसारित हुआ था I मैंने उनकी यह किताब दिल्ली में पढ़ी थी , एक मित्र मुझसे पढ़ने के लिए मांग कर ले गए लेकिन लौटाया नहीं I खैर,
गाँधी जी पर लिखी उनकी यह किताब अन्य पुस्तकों से हटकर है — दो और किताबें हैं गांधी जी पर, जिन्हें मैंने पढ़ा- एक तो आचार्य कृपलानी जी की पुस्तक Gandhi his life and thought और दूसरी किताब है The Spirits Pilgrimage by मीरा बहिन , इन दोनों लेखकों ने प्रेम से गाँधी जी को याद किया और आलोचना भी की लेकिन इस आलोचना में घृणा, अनादर और उपेक्षा का भाव लेशमात्र भी नहीं था I
“अस्वीकृति में उठा हाथ” भी उपरोक्त दोनों लेखकों से मिलती जुलती शैली में है जिसमें गाँधी जी की श्रद्धापूर्वक आलोचना की गयी है – कुछ विचार जो शेयर कर रहा हूँ उसी पुस्तक से हैं — यदि किसी मित्र ने न पढ़ी हो तो जरूर पढ़िए —
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“गांधी कोई कागजी महापुरुष नहीं हैं कि आलोचना की वर्षा आएगी और उनका रंग-रोगन बह जाएगा। कुछ कागजी महापुरुष होते हैं उन्हें आलोचना से बचाया जाना चाहिए, क्योंकि वे आलोचना में खड़े नहीं रह सकते हैं। गांधी को मैं दुनिया के उन थोड़े से महापुरुषों में से एक मानता हूं, जो पत्थर की प्रतिमाओं की तरह हैं, जिन पर वर्षा होती है तो धूल बह जाती है, प्रतिमा और निखर कर प्रकट होती है।
“गांधी कोई कच्चे महापुरुष नहीं हैं। लेकिन गांधी के पीछे जो अनुयायियों का वर्ग है, वह शायद स्वयं कच्चा है, इसलिए गांधी को भी कच्चा मान लेता है। खुद के भय ही हम अपने महापुरुषों पर भी आरोपित कर देते हैं। हमारी अपनी ही हालतें हम अपने महापुरुषों पर भी थोप देते हैं। गांधी की आलोचना निश्चित की जानी चाहिए। क्योंकि गांधी की आलोचना से गांधी का तो कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है, हमारा जरूर कुछ हित हो सकता है।यह बात अत्यंत अप्रौढ़ और इम्मैच्योर मालूम होती है कि हम अपने महापुरुषों की सिर्फ पूजा करें और कभी कोई सृजनात्मक आलोचना, क्रिएटिव क्रिटिसिज्म न करें। यह भी कुछ भय मालूम होता है पीछे कि कहीं हमारे महापुरुष की कोई भूल न खयाल में आ जाए।
ध्यान रखना चाहिए कि पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य कभी नहीं हुआ है जिससे भूलें न होती हों। एक बात का फर्क होता है–छोटे लोग छोटी भूलें करते हैं, महापुरुष बड़ी भूलें करते हैं। महापुरुष छोटी भूलें नहीं करते हैं।
लेकिन पृथ्वी पर कोई मनुष्य कभी नहीं होता जिससे भूल न होती हो। जिससे भूल नहीं होती है वह मोक्ष चला जाता है। उसे पृथ्वी पर आने की कोई जरूरत ही नहीं होती है।
लेकिन हमारे मन में यह घबड़ाहट रहती है कि हमारे महापुरुष की कोई भूल, कोई गलती खयाल में न आ जाए। इसलिए पूजा करो, प्रार्थना करो, उपासना करो, लेकिन विचार कभी मत करना।
गांधी एक अदभुत व्यक्ति हैं। शायद पृथ्वी पर दो-चार लोग ही उस कोटि के पैदा हुए हैं। लेकिन पीछे चलने वाले लोग हमेशा महापुरुष की हत्या करने की कोशिश करते हैं। वह हत्या उनको भगवान बना कर की जाती है।
जिस आदमी को भी भगवान बना दिया, उसकी आदमी की तरह हत्या हो गई। भगवान की तरह स्थापना हो गई, आदमी की तरह हत्या हो गई।
और हम आदमियों से ही प्रभावित हो सकते हैं और आदमियों के साथ ही हम जी सकते हैं और आगे चल सकते हैं। गांधी के साथ फिर वही शरारत शुरू हो गई जो हमने राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर के साथ की थी। लेकिन हम अतीत की भूलों से कुछ सीखते भी मालूम नहीं पड़ते हैं।
मैं चाहता हूं कि गांधी को हम मनुष्य ही बनाए रखें, ताकि वे हमारी मनुष्यता के काम आ सकें। हम उन पर निरंतर विचार कर सकें, सोच सकें और आगे बढ़ सकें। इस खयाल से मैंने उनकी कुछ आलोचना की थी।
हिंदुस्तान की दरिद्रता नहीं मिटेगी, जब तक हम संपत्ति के प्रति भी एक स्वस्थ रुख लेने को राजी न हों। हमारा संपत्ति के प्रति अत्यंत अस्वस्थ, रुग्ण, अनहेल्दी रुख है। तो एक तरफ तो यह है कि हम संपत्ति का विरोध करते हैं और दूसरी तरफ भीतर संपत्ति की लालसा भी करते हैं, क्योंकि दरिद्रता के भीतर यह असंभव है कि आप सच में संतुष्ट हो जाएं। कैसे संतुष्ट हो सकते हैं? जबरदस्ती थोप कर अपने ऊपर संतोष के कपड़े पहन लेंगे, लेकिन संतुष्ट हो कैसे सकते हैं? भीतर असंतोष की आग जलती ही रहेगी। इसलिए ऊपर से कहेंगे, कुछ मतलब नहीं है हमें, हम तो संतुष्ट हैं और भीतर लालसा, ईर्ष्या और लोभ वे सब काम करते रहेंगे।”
