ब्लॉगविज्ञान प्रोद्योगिकीस्वास्थ्य

कैंसर से आगे की लड़ाई: जब डॉक्टरों ने बचा लिया पितृत्व का भविष्य

 

Uttarakhand Himalaya bureau-
कैंसर का इलाज केवल एक बीमारी से लड़ाई नहीं है, बल्कि यह रोगी के पूरे भविष्य को बचाने का प्रयास भी है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अब इस सोच से आगे बढ़ चुका है कि उपचार का लक्ष्य केवल जान बचाना है। आज डॉक्टर इस बात पर भी समान रूप से ध्यान दे रहे हैं कि इलाज के बाद मरीज सामान्य जीवन जी सके, परिवार बना सके और उसकी जीवन-योजना अधूरी न रह जाए। विशेष रूप से किशोरों और युवाओं में होने वाले कैंसर के मामलों में प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) को सुरक्षित रखना चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।
हाल ही में द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट “A race to save 23 sperms, and a teenage cancer survivor’s chance at fatherhood” ने इस दिशा में भारतीय चिकित्सा जगत की एक उल्लेखनीय उपलब्धि को सामने रखा। रिपोर्ट के अनुसार मुंबई के सर एच. एन. रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में 19 वर्षीय वृषण कैंसर (टेस्टिकुलर कैंसर) से पीड़ित युवक की सर्जरी के दौरान विशेषज्ञों की टीम ने कैंसरग्रस्त ऊतकों में घंटों तक सूक्ष्म खोज कर 23 जीवित शुक्राणु खोज निकाले और उन्हें क्रायो-प्रिजर्वेशन तकनीक से सुरक्षित कर लिया। इससे उस युवक के भविष्य में जैविक पिता बनने की संभावना भी सुरक्षित हो गई। यह उपलब्धि केवल एक चिकित्सा सफलता नहीं, बल्कि रोगी के भविष्य को बचाने का मानवीय प्रयास भी है।
यह घटना बताती है कि चिकित्सा विज्ञान अब “जीवन बचाने” से आगे बढ़कर “जीवन की गुणवत्ता बचाने” के सिद्धांत पर काम कर रहा है। यही कारण है कि दुनिया भर में ऑन्को-फर्टिलिटी (Oncofertility) जैसी नई चिकित्सा शाखा तेजी से विकसित हो रही है, जो कैंसर उपचार और प्रजनन विज्ञान का समन्वय है।
क्या है ऑन्को-फर्टिलिटी?
ऑन्को-फर्टिलिटी का उद्देश्य ऐसे मरीजों की प्रजनन क्षमता को सुरक्षित रखना है, जिन्हें कैंसर के उपचार के कारण भविष्य में संतानोत्पत्ति में कठिनाई हो सकती है। पुरुषों में स्पर्म बैंकिंग, टेस्टिकुलर स्पर्म एक्सट्रैक्शन (TESE) और महिलाओं में अंडाणु, भ्रूण या डिम्बग्रंथि ऊतक को सुरक्षित रखने जैसी तकनीकें इसी क्षेत्र का हिस्सा हैं। यदि कैंसर का उपचार शुरू होने से पहले या उपचार के दौरान यह प्रक्रिया अपनाई जाए, तो बाद में आईवीएफ जैसी तकनीकों की सहायता से जैविक संतान प्राप्त करना संभव हो सकता है।
भारत में क्यों बढ़ रही है इसकी आवश्यकता?
भारत में हर वर्ष लाखों नए कैंसर रोगी सामने आते हैं, जिनमें बड़ी संख्या 40 वर्ष से कम आयु के लोगों की होती है। पहले कैंसर के उपचार में जीवन बचाना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता होती थी, लेकिन अब विशेषज्ञ मानते हैं कि विशेषकर युवा मरीजों को उपचार शुरू होने से पहले फर्टिलिटी संरक्षण के विकल्पों की जानकारी अवश्य दी जानी चाहिए। देश के प्रमुख कैंसर और आईवीएफ संस्थान अब इस दिशा में समर्पित सेवाएं विकसित कर रहे हैं।
समय सबसे महत्वपूर्ण
फर्टिलिटी संरक्षण का सबसे बड़ा सिद्धांत है—समय पर निर्णय। अधिकांश मामलों में कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी शुरू होने से पहले स्पर्म या अंडाणु सुरक्षित कर लिए जाएं तो सफलता की संभावना अधिक रहती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में, जैसा कि मुंबई के मामले में हुआ, ऑपरेशन के बाद भी प्रभावित ऊतक से जीवित शुक्राणु खोजे जा सकते हैं, लेकिन यह अत्यंत जटिल प्रक्रिया होती है और हर मामले में संभव नहीं होती।
समाज में जागरूकता की जरूरत
भारत में आज भी कैंसर का नाम सुनते ही पूरा ध्यान केवल इलाज पर केंद्रित हो जाता है। परिवार और कई बार मरीज भी भविष्य की प्रजनन क्षमता पर चर्चा करने में संकोच करते हैं। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टर, मरीज और परिवार के बीच इस विषय पर खुलकर बातचीत होनी चाहिए। यह किसी विलासिता का विषय नहीं, बल्कि रोगी के जीवन की गुणवत्ता और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू है।
भविष्य की उम्मीद
मुंबई के युवक के लिए सुरक्षित किए गए 23 शुक्राणु संख्या में भले ही बहुत कम प्रतीत हों, लेकिन वे उसके भविष्य की संभावनाओं का आधार हैं। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान केवल मृत्यु से संघर्ष नहीं कर रहा, बल्कि जीवन के सपनों को भी बचाने का प्रयास कर रहा है। आने वाले वर्षों में ऑन्को-फर्टिलिटी, स्टेम सेल तकनीक और प्रजनन विज्ञान में हो रहे अनुसंधान लाखों कैंसर सर्वाइवरों के लिए नई उम्मीदें लेकर आएंगे।
दरअसल, चिकित्सा की सबसे बड़ी सफलता केवल किसी व्यक्ति को जीवित रखना नहीं, बल्कि उसे भविष्य के सपने देखने और उन्हें पूरा करने का अवसर देना भी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!