पलायन के साथ ही राजनीतिक शक्ति भी खिसक रही है पहाड़ की

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  • पर्वतीय सीटों के चुनावी आंकड़ों को पलायन के चश्मे से देखने की ज़रूरत
  • बीते चुनाव में पहाड़ की सीटों पर घटा था मतदान प्रतिशत
  • 2017 में अल्मोड़ा के सल्ट और पौड़ी के लैंसडौन व चौबट्टाखाल विधान सभा मे सबसे कम मत प्रतिशत
  • एसडीसी फाउंडेशन ने जारी की “पलायन और  उत्तराखंड 2017 चुनाव रिपोर्ट

–दिनेश सेमवाल शास्त्री

क्या उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लोकतंत्र की आवाज कमजोर पड़ रही है! एसडीसी फाउंडेशन ने 2017 में विधानसभा के चुनाव में हुए मतदान पर “”पलायन और उत्तराखंड चुनाव 2017″” रिपोर्ट जारी कर यह संदेह व्यक्त किया है। फाउंडेशन का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों की विधानसभा सीटों पर मतदाताओं की संख्या मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कम तो है ही, साथ ही इन क्षेत्रों में मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कम लोग वोट करने जाते हैं। इस तरह से करीब 40 से 50 प्रतिशत पहाड़ का मतदाता लोकतंत्रिक प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाता। रिपोर्ट के अनुसार कम मतदान के पीछे कहीं न कहीं प्रदेश का भारी पलायन एक बड़ा कारण है।

Anoop Nautiyal is the founder of Dehradun based Social Development for Communities (SDC) Foundation; a not for profit organisation engaged in development communication and community mobilisation on issues of social change in the Himalayan state of Uttarakhand.

एसडीसी फाउंडेशन के अध्यक्ष अनूप नौटियाल ने कहा कि 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में औसत मतदान 65.60 प्रतिशत था। उनके अनुसार उत्तरकाशी जिले को छोड़ दें तो सभी पर्वतीय जिलों में मतदान प्रदेश के औसत मतदान से कहीं कम हुआ। सबसे कम मतदान प्रतिशत पहाड़ी जिलों टिहरी, पौड़ी और अल्मोड़ा में रहा।

मैदानी जिले हरिद्वार में लक्सर, हरिद्वार ग्रामीण और पिरान कलियर विधान सभा में प्रदेश मे सबसे अधिक मतदान हुआ था। तीनों निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान 81 से 82 प्रतिशत के बीच हुआ था।

पौड़ी जिले के लैंसडौन व चौबट्टाखाल और अल्मोड़ा जिले के सल्ट में सबसे कम 46 से 48 प्रतिशत के बीच मतदान हुआ था।  टिहरी जिले के घनसाली में भी मतदान प्रतिशत 50 प्रतिशत से कम था। यहां 49.19 प्रतिशत वोट पड़े थे। नौ पहाड़ी जिलों के 34 निर्वाचन क्षेत्रों में से 28 का वोट प्रतिशत राज्य के औसत 65.60 प्रतिशत से कम था।

अनूप नौटियाल ने कहा कि पर्वतीय जिलों में 69.38% के साथ सिर्फ उत्तरकाशी जिले ने मतदान प्रतिशत बेहतर दर्ज किया गया था। ऐसे में सरकारों, निति नियंताओं और समस्त जन प्रतिनिधियों को देखने और समझने की ज़रूरत है की उत्तरकाशी मे ऐसे क्या कारण हैं की वहां अन्य पहाड़ी जिलों की तुलना मे मतदान प्रतिशत इतना अधिक है। उन्होंने उत्तराखंड प्रदेश मे उत्तरकाशी मॉडल को अपनाने की बात कही।

अनूप के अनुसार चुनाव आयोग को अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में उत्तरकाशी जिले की तरह मतदान प्रतिशत बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। कोविड प्रतिबंधों को देखते हुए टेक्नोलॉजी की मदद से ऐसे प्रयास किये जा सकते हैं। इस के अलावा रिपोर्ट मे खास बात यह है कि राजधानी देहरादून शहर के सभी पांच निर्वाचन क्षेत्रों; रायपुर, मसूरी, राजपुर रोड, धर्मपुर और देहरादून कैंट में भी मतदान प्रदेश के औसत की तुलना मे 60 प्रतिशत से कम मत के साथ काफी कम रहा। रिपोर्ट को तैयार करने मे एसडीसी फाउंडेशन के प्रवीण उप्रेती, प्यारे लाल और विदुष पांडेय का सहयोग रहा।

One thought on “पलायन के साथ ही राजनीतिक शक्ति भी खिसक रही है पहाड़ की

  • January 22, 2022 at 9:28 am
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    पहाड पलायन के बाद मतदान प्रतिशत कम होना तो चिंतनीय है पर बड़ा प्रश्न है कि क्या अब ऐसा नहीं लगता है कि उत्तराखंड का लाभ पर्वतीय क्षेत्र वासियों को नहीं मैदानी क्षेत्र वासियों को ज्यादा मिलेगा। कारण स्पष्ट है कि पहाड वासी उत्तराखंड से बाहर और हरिद्वार, उधमसिह नगर के वहां हैं। सरकारी सुविधाओं का लाभ उन्हीं को मिलना है। क्योंकि मतदाता भी वही लोग अधिक हैं। फिर देहरादून, ऋषिकेश, नैनीताल जैसे बड़े शहरों में भी बाहरी लोगों का प्रतिशत भी बढ़ता ही जा रहा है।
    नेता हमारे होंगे पर जनता हमारी नहीं होगी।

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