दल बदल का दलदल : चुनाव जीतने के बाद 111 सांसद-विधायकों ने बदला दल, 29 भाजपा में गए : एडीआर
लोकसभा के 26, राज्यसभा के सात सांसद और 78 विधायक शामिल; 17 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों में सामने आए मामले
नई दिल्ली, 24 सितम्बर। चुनाव में किसी राजनीतिक दल के टिकट पर जनता का विश्वास हासिल करने के बाद उसी कार्यकाल में दल बदलने की प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में अब भी बड़े पैमाने पर जारी है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वॉच के ताजा विश्लेषण के अनुसार 2022 से 2026 के बीच मौजूदा लोकसभा, राज्यसभा और विभिन्न विधानसभाओं के 111 सांसदों और विधायकों ने निर्वाचित होने के बाद अपना राजनीतिक दल बदला। इनमें लोकसभा के 26 सांसद, राज्यसभा के सात सांसद और 78 विधायक शामिल हैं।
गुरुवार को जारी रिपोर्ट में 12 जुलाई 2026 तक की स्थिति का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के दायरे में लोकसभा के 543, राज्यसभा के 233 और राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं के 4,100 सदस्यों सहित कुल 4,876 जनप्रतिनिधियों को रखा गया। इनमें दल बदलने वालों का कुल अनुपात करीब दो प्रतिशत रहा। लोकसभा में यह अनुपात पांच प्रतिशत, राज्यसभा में तीन प्रतिशत और विधानसभाओं में दो प्रतिशत है। विधानसभा के 78 मामलों में 70 सदस्यों ने निर्वाचित होने के बाद दल बदला, जबकि आठ ने कार्यकाल के दौरान दल बदलने के बाद उपचुनाव जीतकर सदन में वापसी की।
एडीआर ने दल परिवर्तन के मामलों को चार श्रेणियों में बांटा है। पहली श्रेणी में वे सदस्य हैं जिन्होंने सदन की सदस्यता छोड़े बिना एक दल छोड़कर दूसरा दल अपनाया। दूसरी श्रेणी राजनीतिक दल या उसके विधायी दल के बड़े हिस्से के दूसरे दल में विलय की है। तीसरी श्रेणी में पहले सदस्यता से इस्तीफा, फिर दूसरा दल अपनाकर उपचुनाव जीतने वाले सदस्य हैं। चौथी श्रेणी में दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने के बाद दूसरा दल अपनाकर उपचुनाव के जरिए फिर निर्वाचित हुए सदस्य रखे गए हैं।
नगालैंड और पश्चिम बंगाल सबसे आगे
रिपोर्ट के अनुसार दल परिवर्तन के ये मामले देश के 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सामने आए। सबसे अधिक 32 मामले नगालैंड में दर्ज किए गए, जो कुल मामलों का 29 प्रतिशत हैं। इनमें बड़ी संख्या एनडीपीपी के एनपीएफ में विलय से जुड़ी है। पश्चिम बंगाल 20 मामलों यानी 18 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा। इसके बाद तेलंगाना में नौ, गोवा और पंजाब में आठ-आठ, महाराष्ट्र तथा मेघालय में छह-छह, मणिपुर में पांच और अरुणाचल प्रदेश तथा गुजरात में चार-चार मामले दर्ज किए गए। हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में दो-दो तथा कर्नाटक, मध्य प्रदेश, दिल्ली, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में एक-एक मामला दर्ज है।
दलवार आंकड़ों में मूल रूप से एनडीपीपी से निर्वाचित 25 जनप्रतिनिधियों के दल परिवर्तन के मामले हैं। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 और कांग्रेस के 19 सदस्य हैं। बीआरएस के नौ, आम आदमी पार्टी और एनसीपी के सात-सात, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह, जदयू के पांच और एनपीपी के चार सदस्य इस सूची में शामिल हैं। एनडीपीपी, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस से निर्वाचित सदस्य मिलाकर कुल 64 हैं, जो सभी 111 मामलों का 58 प्रतिशत है।
दल बदलने वालों में 29 भाजपा में शामिल
यह तस्वीर तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब देखा जाए कि इन जनप्रतिनिधियों ने दल बदलकर किस राजनीतिक दल का रुख किया। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार 111 में सर्वाधिक 32 सदस्य एनपीएफ में गए, जिनमें नगालैंड के विलय से जुड़े मामले प्रमुख हैं। इसके बाद 29 जनप्रतिनिधी भाजपा में शामिल हुए, जो कुल संख्या का 26 प्रतिशत है। रिपोर्ट में 20 सदस्यों के नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में जाने का उल्लेख है। नौ कांग्रेस, आठ शिवसेना, छह एनपीपी और चार पीपीए में शामिल हुए।
उत्तर प्रदेश से इस सूची में ऊंचाहार के विधायक मनोज कुमार पांडेय का नाम है। एडीआर रिपोर्ट के अनुसार वे समाजवादी पार्टी से भाजपा में गए। गुजरात के चार कांग्रेस विधायकों के मामलों में पहले इस्तीफा देने, भाजपा में शामिल होने और फिर उपचुनाव लड़ने का उल्लेख है। हिमाचल प्रदेश में सुधीर शर्मा और इंदर दत्त लखनपाल को फरवरी 2024 में अयोग्य घोषित किए जाने और बाद में भाजपा में शामिल होकर उपचुनाव से निर्वाचित होने के मामलों को रिपोर्ट में दर्ज किया गया है।
दल-बदल कानून में बदलाव की सिफारिश
एडीआर ने इस स्थिति के मद्देनजर संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून में बदलाव की आवश्यकता बताई है। संस्था ने विभिन्न पूर्व समितियों और विधि आयोग की सिफारिशों का उल्लेख करते हुए प्रस्ताव किया है कि सांसद की अयोग्यता का निर्णय राष्ट्रपति और विधायक की अयोग्यता का निर्णय राज्यपाल द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर किया जाए। एडीआर ने दल बदलने वाले सदस्य को शेष कार्यकाल अथवा अगले आम चुनाव तक सार्वजनिक या लाभ के पद से दूर रखने और अयोग्यता याचिका पर छह महीने के भीतर फैसला करने जैसी व्यवस्थाओं की भी वकालत की है। ये एडीआर की सिफारिशें हैं, मौजूदा कानून नहीं।
रिपोर्ट में राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने, उनके कामकाज को नियंत्रित करने के लिए व्यापक कानून बनाने, आंतरिक लोकतंत्र और वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाने तथा दल बदलने वाले जनप्रतिनिधियों और उनके आश्रितों की संपत्तियों की जांच की व्यवस्था मजबूत करने की भी सिफारिश की गई है।
हालांकि एडीआर ने स्वयं इस अध्ययन की एक महत्वपूर्ण सीमा भी स्पष्ट की है। संस्था का कहना है कि दल परिवर्तन के मामलों का व्यवस्थित और आसानी से उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ा नहीं होने के कारण यह दावा नहीं किया जा सकता कि 111 की सूची पूरी तरह समग्र है। संभव है कि इस अवधि के कुछ अन्य मामले इसमें शामिल न हो पाए हों। रिपोर्ट मुख्य रूप से चुनावी हलफनामों और लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभाओं सहित उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।
