सीमा से परे: भारतीय शोधकर्ताओं ने क्वांटम मापन में रचा नया इतिहास

Researchers at the Raman Research Institute (RRI), Bengaluru, have experimentally confirmed Quantum Measurement Theory (QMT) by measuring a quantum measure of approximately 1.17—exceeding the classical probability limit of 1. Led by PhD scholar Sanchari Chakraborty under Prof. Urbasi Sinha, the team built a novel “Event-Filter” using laser photons, polarization, and path interference. This breakthrough demonstrates that quantum histories can produce measures beyond classical bounds. The work advances quantum computing, ultra-secure communication, and India’s National Quantum Mission, while paying tribute to theorist Rafael Sorkin, who contributed to QMT and passed away shortly after the paper’s acceptance.

-ज्योति रावत –
विज्ञान की दुनिया में अक्सर ऐसी खोजें होती हैं जो हमारी सामान्य समझ को चुनौती देती हैं। हाल ही में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत आने वाले स्वायत्त संस्थान, रमन अनुसंधान संस्थान (आरआरआई – RRI) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा ही ऐतिहासिक प्रयोग किया है। उन्होंने ‘क्वांटम मापन सिद्धांत’ (QMT) को कागजी गणनाओं से निकालकर प्रयोगशाला में सफलतापूर्वक सिद्ध कर दिया है।
इस प्रयोग की सबसे खास बात यह है कि शोधकर्ताओं ने क्वांटम माप का एक ऐसा परिणाम प्राप्त किया है, जो सामान्य प्रायिकता (Probability) की अधिकतम सीमा ‘एक’ (1) से भी अधिक है। यह उपलब्धि भविष्य में क्वांटम कंप्यूटिंग और तकनीक की दुनिया में एक नए युग की शुरुआत कर सकती है।
क्या है क्वांटम मापन और नया प्रयोग? आमतौर पर, क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) में किसी प्रणाली को एक निश्चित समय पर उसकी स्थिति के अनुसार समझा जाता है। लेकिन इसका एक दूसरा तरीका भी है— प्रणाली को उसके ‘संभावित इतिहास’ (Possible Histories) के माध्यम से समझना। आसान शब्दों में कहें तो, जब लेजर मशीन से कोई फोटॉन (प्रकाश का कण) निकलता है और डिटेक्टर तक पहुँचता है, तो वह किस रास्ते से गया, इस पूरी प्रक्रिया को समझना।
क्वांटम मापन सिद्धांत (QMT) इन्हीं रास्तों या इतिहासों के समूह को एक माप प्रदान करता है। सामान्य गणित में किसी भी घटना के होने की प्रायिकता (संभावना) 0 और 1 के बीच होती है। लेकिन क्वांटम दुनिया के नियम अलग हैं, यहाँ यह माप 1 से अधिक भी हो सकता है। समस्या यह थी कि इसे प्रयोगशाला में प्रयोगात्मक रूप से सिद्ध करना बेहद कठिन था।
कैसे किया गया यह प्रयोग? इस जटिल सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए आरआरआई की पीएचडी छात्रा संचारी चक्रबर्ती ने संस्थान की वरिष्ठ प्रोफेसर और शोधपत्र की सह-लेखिका डॉ. उर्बसी सिन्हा के मार्गदर्शन में एक विशेष “इवेंट-फ़िल्टर” (Event-Filter) का निर्माण किया।
इस उपकरण को बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने लेज़र बीम से निकले फोटॉनों को अलग-अलग रास्तों से गुजरने दिया। उन्होंने प्रकाश तरंगों की दिशा बताने वाले ‘ध्रुवीकरण’ (Polarization) का उपयोग किया, ताकि इन रास्तों को अलग किया जा सके और मनचाहे रास्तों को चुना जा सके। इसके बाद, उन्होंने रास्तों की इस पहचान को मिटा दिया ताकि वे आपस में व्यतिकरण (Interfere) कर सकें। अंततः इनपुट और आउटपुट लेज़र शक्तियों को मापकर उन्होंने ‘क्वांटम माप’ को निर्धारित किया।
क्वांटम माप ‘एक’ (1) से अधिक कैसे हो गया? इस प्रयोग में शोधकर्ताओं को लगभग 1.17 का क्वांटम माप प्राप्त हुआ। (उपकरणों की मामूली खामियों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने 1.18 का अनुमान लगाया था, जो लगभग सटीक बैठा)। 1.17 के इस परिणाम ने साबित कर दिया कि यह सामान्य प्रायिकता के नियमों से अलग है।
लेकिन यह 1 से अधिक कैसे हुआ? दरअसल, क्वांटम जगत में जब फोटॉन अलग-अलग रास्तों से गुजरते हैं, तो वे तरंगों की तरह एक-दूसरे से टकराते या जुड़ते हैं। जब दो तरंगों के शिखर आपस में मिलते हैं, तो वे एक बड़ी तरंग बना लेते हैं (इसे व्यतिकरण कहा जाता है)। इसी वजह से यह माप 1 से ऊपर चला गया। यहाँ यह समझना जरूरी है कि डिटेक्टर पर फोटॉन के मिलने की प्रायिकता अभी भी 1 से कम ही है, जो चीज 1 से अधिक हुई है, वह ‘क्वांटम माप’ (Quantum Measure) है।
(नोट: प्रयोग के दौरान एक प्रकाशीय क्षेत्र ने कई संभावित इतिहासों का पता लगाया। इवेंट फ़िल्टर ने जरूरी व्यतिकरण को सुरक्षित रखते हुए इतिहासों का एक समूह चुना, जिससे μ(E) ≅ 1.17 का परिणाम मिला, जो शास्त्रीय प्रायिकता सीमा से अधिक है।)
समाज और राष्ट्र के लिए इस आविष्कार की उपयोगिता यह खोज केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि देश और दुनिया के लिए इसके दूरगामी व्यावहारिक लाभ हैं:
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क्वांटम कंप्यूटिंग में नई क्रांति: भविष्य में, यह नया “इवेंट-फ़िल्टर” चुने हुए फोटॉन रास्तों को अलग कर सकता है, जबकि बाकी फोटॉन आगे की प्रक्रियाओं के लिए उपलब्ध रहेंगे। यह क्वांटम कंप्यूटर बनाने के लिए एक बेहद शक्तिशाली उपकरण साबित होगा। क्वांटम कंप्यूटर आज के सुपरकंप्यूटर से करोड़ों गुना तेज होंगे, जो भारत को तकनीकी क्षेत्र में अग्रणी बनाएंगे।
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अभेद्य और सुरक्षित संचार (Secure Communication): क्वांटम तकनीक का सबसे बड़ा लाभ डेटा सुरक्षा में है। इस सिद्धांत का उपयोग करके ऐसे संचार नेटवर्क (Quantum Cryptography) विकसित किए जा सकेंगे जिन्हें हैक करना या बीच में से चुराना असंभव होगा। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सेना के संचार और बैंकिंग प्रणाली के लिए एक अभेद्य कवच का काम करेगा।
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तकनीकी आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत): भारत सरकार ‘राष्ट्रीय क्वांटम मिशन’ पर भारी निवेश कर रही है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा स्वदेशी प्रयोगशाला (RRI) में विश्व स्तरीय परिणाम प्राप्त करना यह दर्शाता है कि भारत अब उन्नत तकनीकों के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह स्वयं नई तकनीकें ईजाद कर रहा है।
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जटिल वैज्ञानिक और चिकित्सा समस्याओं का समाधान: क्वांटम सिस्टम को बेहतर ढंग से समझने से हम भविष्य में नई जीवन रक्षक दवाओं की खोज, जलवायु परिवर्तन के सटीक मॉडल तैयार करने और लॉजिस्टिक्स जैसी जटिल समस्याओं को बहुत तेजी से हल कर पाएंगे।
क्वांटम गुरुत्वाकर्षण की ओर कदम और एक भावभीनी श्रद्धांजलि इस प्रयोग ने पहली बार साबित किया है कि एक से अधिक क्वांटम माप केवल कागजों पर की जाने वाली गणना नहीं है, बल्कि इसे प्रयोगशाला में मापा जा सकता है। डॉ. उर्बसी सिन्हा का कहना है कि, “क्वांटम यांत्रिकी के मूलभूत सवालों से निकले एक विचार को वास्तविक ऑप्टिकल प्रयोग के रूप में देखना बेहद संतोषजनक है।” हालांकि यह क्वांटम माप की हर समस्या का समाधान नहीं है, लेकिन इसने प्रयोगात्मक संभावनाओं के नए दरवाजे खोल दिए हैं।
यह सिद्धांत (QMT) क्वांटम गुरुत्वाकर्षण की खोज के दौरान विकसित किया गया था। इस सिद्धांत को विकसित करने में पेरिमीटर इंस्टीट्यूट फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स (कनाडा) के पूर्व शोधकर्ता और आरआरआई में विशिष्ट अतिथि संकाय सदस्य राफेल सोर्किन (Rafael Sorkin) का अहम योगदान था। दुखद रूप से, इस शोध पत्र के स्वीकार होने के कुछ ही समय बाद, 12 सितंबर 2026 को उनका निधन हो गया।
उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए डॉ. सिन्हा ने कहा, “यह शोध पत्र मेरे लिए व्यक्तिगत और वैज्ञानिक, दोनों ही दृष्टियों से बहुत गहरा मायने रखता है।”
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प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.22331/q-2026-09-24-2215
