नंदा देवी दशकीय जैव-निगरानी अभियान 2026 आज से शुरू, 40 वर्षों की संरक्षण नीति का होगा वैज्ञानिक मूल्यांकन

–प्रकाश कपरुवाण-
ज्योतिर्मठ, 7 जून। उत्तराखंड वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान, जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, आईटीबीपी, एच.एन.बी. गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा एसडीआरएफ के संयुक्त तत्वावधान में विश्व धरोहर स्थल नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में 7 जून से 28 जून, 2026 तक ‘नंदा देवी दशकीय जैव-निगरानी अभियान-2026’ का आयोजन किया जा रहा है।
नंदा देवी ‘इनर सेंचुरी’ का मार्ग पहली बार वर्ष 1934 में खोजा गया था। इसके बाद अनियंत्रित पर्वतारोहण और मानवीय गतिविधियों के कारण इस अद्वितीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर क्षति पहुंची। पर्यावरणीय संतुलन को संरक्षित करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 1982 में राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में सभी मानवीय गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद प्रकृति के पुनरुत्थान और संरक्षण प्रयासों के प्रभाव का आकलन करने के लिए प्रत्येक दशक में वैज्ञानिक अभियान संचालित किए जाते रहे हैं।
पहला अभियान वर्ष 1993 में सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स और वैज्ञानिकों द्वारा संचालित किया गया था। दूसरा अभियान वर्ष 2003 में आईटीबीपी के सहयोग से आयोजित हुआ, जिसमें वनस्पतियों, वन्यजीवों और भूवैज्ञानिक संरचनाओं का अध्ययन किया गया। तीसरा अभियान वर्ष 2013 में प्रस्तावित था, लेकिन उस वर्ष आई भीषण आपदा के कारण इसे वर्ष 2015 में आयोजित किया गया।
वर्ष 2026 का यह अभियान विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसके माध्यम से 40 वर्षों से अधिक समय से लागू ‘जीरो इंटरफेरेंस पॉलिसी’ की सफलता का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा। अभियान के दौरान ग्लेशियरों की स्थिति का अध्ययन, हिम तेंदुआ, भरल, मोनाल जैसे दुर्लभ वन्यजीवों की निगरानी तथा लुप्तप्राय हिमालयी औषधीय वनस्पतियों का आकलन किया जाएगा। इसके लिए ड्रोन, जीआईएस और अन्य आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा।
नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) अभिमन्यु के नेतृत्व में अभियान की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। दुर्गम और चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए वन विभाग के 12 कर्मचारियों को आईटीबीपी औली स्थित पर्वतारोहण एवं स्कीइंग संस्थान तथा नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम), उत्तरकाशी में विशेष पर्वतारोहण प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।
डीएफओ अभिमन्यु के अनुसार अभियान से पूर्व जिला प्रशासन और एसडीआरएफ के साथ समन्वय बैठकों का आयोजन किया जा चुका है। चिकित्सा आपात स्थितियों से निपटने के लिए आईटीबीपी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी सहित मेडिकल टीम अभियान के साथ रहेगी। साथ ही हेली-रेस्क्यू व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है। संचार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए औली टावर के माध्यम से रेडियो और सैटेलाइट फोन आधारित कमांड नेटवर्क स्थापित किया गया है।
अभियान के लिए 30 सदस्यीय कोर टीम गठित की गई है, जिसमें वैज्ञानिक, वन अधिकारी, आईटीबीपी और एसडीआरएफ के कार्मिक शामिल हैं। लॉजिस्टिक सहायता के लिए पोर्टरों सहित कुल 85 सदस्य इस अभियान का हिस्सा होंगे।
पारिस्थितिकीय पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से अभियान को ‘न्यूनतम पदचिह्न सिद्धांत’ (Minimum Footprint Principle) के तहत संचालित किया जाएगा। कोर जोन में खच्चरों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा तथा अभियान के दौरान उत्पन्न होने वाला समस्त कचरा ‘वेट-इन, वेट-आउट’ नियम के तहत वापस जोशीमठ लाया जाएगा।
