अर्धकुंभ की तैयारियों के बीच गंगा में समा रही हैं जिंदगियां : जल पुलिस है कहाँ ?
*आस्था, रोमांच और लापरवाही का खतरनाक संगम*
–जयसिंह रावत-
अर्धकुंभ की तैयारियों के बीच हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा तटों पर एक चिंताजनक स्थिति उभरकर सामने आ रही है। पिछले लगभग डेढ़ महीने में हरिद्वार-ऋषिकेश क्षेत्र में गंगा में डूबने की कम से कम 26 घटनाएं दर्ज की गई हैं। हाल ही में नोएडा के 20 वर्षीय छात्र के तेज धारा में बह जाने की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब करोड़ों श्रद्धालुओं के अर्धकुंभ में पहुंचने की उम्मीद है, तब गंगा तटों की सुरक्षा व्यवस्था कितनी कारगर है।
गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। हरिद्वार और ऋषिकेश में स्नान के लिए आने वाले अधिकांश लोग यह मानकर नदी में उतरते हैं कि घाटों पर मौजूद रेलिंग और सुरक्षा प्रबंध उन्हें सुरक्षित रखेंगे। लेकिन गंगा की धारा का स्वभाव हिमालयी नदियों जैसा है—ऊपरी सतह पर शांत दिखाई देने वाली धारा अचानक गहराई और वेग बदल सकती है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं।
खतरनाक संकेत: 45 दिनों में 26 हादसे
हालिया घटनाओं का विश्लेषण बताता है कि अधिकांश दुर्घटनाएं प्रतिबंधित या असुरक्षित घाटों पर हुई हैं। मई माह में ही हरिद्वार और ऋषिकेश क्षेत्र में 15 डूबन की घटनाएं दर्ज की गईं। अधिकारियों के अनुसार इनमें से अधिकांश मामलों में लोग चेतावनी बोर्डों और सुरक्षा निर्देशों की अनदेखी कर गहरे पानी में चले गए या सेल्फी लेने तथा रोमांच के लिए नदी के किनारे खतरनाक स्थानों तक पहुंच गए।
ताजा मामले में नोएडा का छात्र अपने मित्रों के साथ ऋषिकेश आया था। साई घाट क्षेत्र में स्नान करते समय वह गहरे पानी में चला गया और तेज धारा में बह गया। इससे पहले दिल्ली के नवविवाहित दंपती के गंगा में बह जाने तथा अन्य कई पर्यटकों और युवाओं के डूबने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं हादसे?
विशेषज्ञों और बचाव एजेंसियों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं—
प्रतिबंधित घाटों पर प्रवेश।
चेतावनी बोर्डों की अनदेखी।
सेल्फी और वीडियो बनाने की प्रवृत्ति।
शराब या नशे की अवस्था में नदी में उतरना।
तैराकी का अनुभव न होने के बावजूद गहरे पानी में जाना।
गर्मी के मौसम में स्नानार्थियों और पर्यटकों की बढ़ती संख्या।
ऋषिकेश, तपोवन और लक्ष्मणझूला क्षेत्र में ऐसे लगभग 16 स्थान चिह्नित किए गए हैं जिन्हें अत्यधिक जोखिम वाला माना जाता है। इन स्थानों पर चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं, फिर भी लोग सुरक्षा निर्देशों की अवहेलना कर रहे हैं।
जल पुलिस: गंगा की पहली सुरक्षा पंक्ति
गंगा में सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी केवल एसडीआरएफ पर नहीं है। जल पुलिस इस पूरी व्यवस्था की अग्रिम पंक्ति है। हरिद्वार में जल पुलिस के जवान दिन-रात घाटों, नहरों और संवेदनशील स्थलों पर निगरानी रखते हैं। उनका कार्य केवल डूबते लोगों को बचाना ही नहीं, बल्कि लोगों को खतरे वाले क्षेत्रों में जाने से रोकना भी है।
हर की पैड़ी, अपर गंगा नहर, भीमगोड़ा, बैराज क्षेत्रों और अन्य संवेदनशील घाटों पर जल पुलिस लगातार गश्त करती है। कई मामलों में जल पुलिस ने समय रहते श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बचाया है। अधिकारियों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग सुरक्षा रेलिंग पार कर नदी पार करने या गहरे पानी में जाने का प्रयास करते हैं, जिससे दुर्घटनाएं होती हैं।
जब कोई व्यक्ति बह जाता है, तब जल पुलिस सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचती है। स्थानीय गोताखोरों, एसडीआरएफ और आवश्यकता पड़ने पर एनडीआरएफ के साथ मिलकर खोज एवं बचाव अभियान चलाया जाता है। कई मामलों में शव कई किलोमीटर दूर जाकर मिलते हैं, जिससे बचाव अभियान और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
अर्धकुंभ की चुनौती
अर्धकुंभ के दौरान हरिद्वार में करोड़ों श्रद्धालुओं के आने की संभावना रहती है। ऐसे में वर्तमान डूबन की घटनाएं प्रशासन के लिए चेतावनी हैं। यदि अभी सीमित संख्या में आने वाले पर्यटकों के बीच इतनी घटनाएं हो रही हैं, तो अर्धकुंभ के दौरान भीड़ कई गुना बढ़ने पर जोखिम भी बढ़ जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बैरिकेड और चेतावनी बोर्ड पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है—
संवेदनशील घाटों पर अतिरिक्त जल पुलिस तैनाती।
ड्रोन निगरानी।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कैमरा प्रणाली।
बहुभाषी चेतावनी घोषणाएं।
स्वयंसेवकों और गंगा प्रहरी दल की तैनाती।
प्रत्येक प्रमुख घाट पर प्रशिक्षित लाइफगार्ड।
आस्था के साथ अनुशासन भी जरूरी
गंगा में डूबन की अधिकांश घटनाएं प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि मानवीय लापरवाही का परिणाम हैं। लोग चेतावनियों को चुनौती समझकर प्रतिबंधित क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। कई युवा सोशल मीडिया के लिए वीडियो और सेल्फी बनाने के चक्कर में अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं।
गंगा की धारा किसी के साहस या आत्मविश्वास की परीक्षा नहीं लेती। वह केवल अपने स्वाभाविक वेग से बहती है। इसलिए आस्था के साथ अनुशासन और सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है।
चेतावनी को गंभीरता से लेने का समय
अर्धकुंभ से पहले गंगा में बढ़ती डूबन की घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी हैं। प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी, जल पुलिस और एसडीआरएफ को अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने होंगे तथा व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाना होगा। वहीं श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी यह समझना होगा कि गंगा में स्नान पुण्य का कार्य हो सकता है, लेकिन सुरक्षा नियमों की अनदेखी कभी भी जानलेवा साबित हो सकती है।
यदि अभी से प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो अर्धकुंभ की विशाल भीड़ के बीच ऐसे हादसों की संख्या और बढ़ सकती है। गंगा तटों पर सुरक्षा को धार्मिक आयोजन का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए, जितना स्वयं स्नान और पूजा-अर्चना को। (ये लेखक के निजी विचार और तर्क हैं -एडमिन)
