एक रसिक मिजाज भक्त थे विल्व मंगल

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
ठाकुर विल्वमंगल का नाम मैने वृंदावन में ही सुना था उनके द्वारा रचित एक कृष्ण स्तुति “गोविन्द दामोदर माधवेती “बहुत लोकप्रिय भजन है जिसे हम बचपन से अपने बुजुर्गों के मुख से सुनते आये हैं लेकिन वे सिर्फ यही पंक्ति गाते थे” श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव.”..जबकि इस रचना में पूरे ७१ श्लोक हैं जिसे मैंने गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक* स्तोत्र रत्नावली* में ही पढ़ा । दिलचस्प बात यह है कि विल्वमंगल की यह रचना भी आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री देव्यापराध क्षमापन स्तोत्रं ॥-न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो” की तरह सब घरों में गाई जाती है।
विल्वमंगल भी केरल प्रांत के मूल निवासी थे जो संभवतः ८वीं शताब्दी में पैदा हुए थे और शंकराचार्य जी की तरह एक दाक्षिणात्य ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए*थे लेकिन विल्वमंगल मुख्यतः *कृषणभक्त* थे । भक्तकवियों ने उनका नाम *लीलाशुक* रख दिया था।
कल मैनै* गोविन्ददामोदर स्तोत्र* में यह श्लोक पढ़ा तो मजा आया । इसमें कृष्ण के प्रति आसक्त एक मुग्धा गोपी की मनोदशा का बहुत ही सुंदर चित्रण किया गया है , पढ़िए आप भी यदि पढ़ना चाहें –
विक्रेतु-कामा किल गोप-कन्या मुरारि-पादार्पित-चित्त-वृत्तिः।
दध्यादिकं मोहवशात् अवोचत् गोविन्द दामोदर माधवेति ।।
एक बार एक ग्वालन (गोपी) अपने सिर पर दूध, दही और माखन की टोकरी रखकर बेचने (विक्रेतु-कामा) के लिए निकली। लेकिन उसका मन और चित्त तो पूरी तरह से बालकृष्ण (मुरारि) के चरण कमलों में रम चुका था।
कृष्ण प्रेम में इतनी विभोर और सुध-बुध खो चुकी गोपी, जब दही बेचने के लिए आवाज लगाने लगी, तो अपनी आदत के विपरीत “दही ले लो” कहने के बजाय उसके मुख से अनजाने में ही बार-बार “गोविन्द, दामोदर, माधव” निकलने लगा
