आस्था के नाम पर भीड़ का अर्थशास्त्र

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-जयसिंह रावत
हमारे देश में आस्था के नाम पर ज्यादा से ज्यादा मानव समूह को आकर्षित करने की होड़ सी लग जाती है। दरअसल इस भीड़ शास़्त्र के साथ एक अर्थशास्त्र भी जुड़ होता है। यही नहीं भीड़ के पैमाने के साथ अपने आराध्य या धर्मस्थल की प्रतिष्ठा को भी प्रतिस्पर्धा में ला कर खड़ा कर दिया जाता है। सामान्यतः आयोजकों का उद्ेश्य केवल भीड़ जुटाने तक ही सीमित होता है और वे भीड़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं भीड़ पर या सरकार पर छोड़ देते हैं। इसका तरोताजा उदाहरण हमारे सामने वर्ष 2021 की जुदाई और नव वर्ष 2022 के आगमन की बेला पर वैष्णो देवी की भगदड़ है।
धार्मिक भीड़ में आस्था तो होती है, लेकिन भीड़ चाहे कोई भी हो, उसका कोई चरित्र नहीं होता। इसलिये भीड़ को उसकी मर्जी पर छोड़ने के बजाय उसे नियंत्रित करना होता है। अगर भीड़ के प्रबंधन की व्यवस्था न हो तो वह प्रतिबंधित क्षेत्र में भी घुस सकती है। भीड़ में धक्का-मुक्की और मामूली कहासुनी भी बहुत खतरनाक होती है, जैसा कि वैष्णो देवी में हुआ। कई बार आपदा के चलते डर की स्थिति बन जाती है और अफवाह की वजह से लोग डर के मारे भागने लगते हैं। लेकिन इन सभी खतरों से बेखबर आयोजक भीड़ का आनन्द लेते रहते हैं।
जिस आयोजन में जितनी अधिक भीड़ जुटती है, उसका महत्व उतना ही अधिक बढ़ जाता है। इसलिये भीड़ का आकार धर्मस्थल के प्रचार के काम भी आता है। गत वर्ष उत्तराखण्ड सरकार ने हरिद्वार महाकुंभ के पहले स्नान पर्व पर 32 लाख स्नानार्थियों के आने का दावा किया। कोरोना महामारी के साये के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में भीड़ जुटाने को सरकार ने अपनी उपलब्धि बताया। वर्ष 2010 के हरिद्वार कुंभ के दौरान 3 महीनों में 9 करोड़ लोगों के जुटने का दावा किया गया था। अगर उत्तराखण्ड सरकार इतना बड़ा दावा करती है तो फिर प्रयागराज इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक में महाकुंभों के आयोजकों के सामने भी इतनी ही भीड़ जुटाने की चुनौती खड़ी हो जाती है। कभी-कभी इसे प्रतिष्ठा का विषय मान कर भीड़ के आंकड़े बढ़ा-चढ़ा कर भी पेश किये जाते हैं। कुछ सरकारें तो भीड़ आकर्षित करने को नाक का सवाल मान लेती हैं।
महाकुंभ तो महाकुंभ ही है, जो कि देश ही नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक महा जमावड़ा होता है। लेकिन भीड़ जुटाने में क्षेत्रीय देवी देवताओं के धर्मस्थलों में भी प्रतिपस्पर्धा शुरू हो जाती है। जिस देवी या देवता के मंदिर में जितनी अधिक भीड़ जुटेंगी उसकी उतनी ही अधिक मान्यता मानी जायेगी। जाहिर है कि जितनी अधिक भीड़ जुटेगी उतना ही चढ़ावा भी आयेगा। लेकिन इन मठ मंदिरों या धार्मिक मेलों के आयोजक उस भीड़ की सुरक्षा व्यवस्था को भी भगवान या देवी देवताओं के भरोसे छोड़ देते हैं, जिसका अंजाम भगदड़ जैसे हादसे होते हैं।
महाकुम्भों में तो भगदड़ का लम्बा इतिहास है। हरिद्वार में सन् 1819 के कुम्भ में हुयी भगदड़ में 430 लोग मारे गये थे। सन् 1954 के इलाहाबाद महाकुभ के दौरान हुयी भगदड़ में लगभग 1000 लोगों के मारे जाने का वृतान्त है। नासिक के कुम्भ में ही 2003 में हुयी भगदड़ में लगभग 40 लोग मारे गये थे। हरिद्वार में सन् 1986 के कुम्भ में हुयी भगदड़ में 50 से अधिक लोग मारे गये। कुम्भ ही नहीं देश में अन्य धार्मिक आयोजनों के समय भगदड़ की घटनायें अक्सर होती रही हैं। नवरात्रि के अवसर पर 30 सितम्बर 2008 में जोधपुर राजस्थान के चैमुण्डा देवी मन्दिर भगदड़ में 147 के मारे गये थेे और 425 घायल हो गये थे। पुरी रथ यात्रा के दौरान भी भगदड़ में 6 लोग मारे गये थे। इस सदी की सबसे भयावह भगदड़ त्रासदी 2005 में सतारा महाराष्ट्र की मन्धार देवी मेले में हुयी थी जिसमें लगभग 300 लोग दब कर और कुचल कर मारे गये थे। 3 अगस्त 2008 को हिमाचल प्रदेश के नैनादेवी भगदड़ में 162 लोग कुचलकर मारे गये थे और 300 से अधिक घायल हो गये थे। इसी स्थान पर 1978 में हुयी भगदड़ में 65 श्रद्धालु मारे गये थे।
पिछली भगदड़ों पर गौर करें तो ज्यादातर त्रासदियों के लिये अफवाहें जिम्मेदार रही हैं। हिमाचल के नैनादेवी में वर्षा से बचने का आश्रय ढहा था और अफवाह भूस्खलन की फैल गयी। मीडिया जिस तरह खबरों को सनसनीखेज तरीके से पेश करता है, उससे अफवाहों का बाजार जल्दी ही गरमाना लाजिमी ही है। खास कर जब मानव मुण्डों का महासमुद्र एकत्र हो तो कहीं भी और किसी भी कोने से अफवाह आसानी से उड़ाई जा सकती है। तब आतंकवादियों को भी हथियार लेकर आने की जरूरत नहीं है। छोटी सी वारदात कर तालाब में कंकड़ फेंकने की तरह हलचल पैदा की जा सकती है।
अब तक प्रायः भीड़ का दबाव बढ़ने के कारण ही ऐसे आयोजनों में भगदड़ें होती रही हैं। ऐसी स्थिति में भीड़ प्रबंधन की सख्त जरूरत होती है। महाकुंभ जैसे आयोजनों में भीड़ का एक स्थान पर दबाव बढ़ने नहीं दिया जाता है। उसके लिये भीड़ को डायवर्ट भी किया जाता है। लेकिन भीड़ नियंत्रित करने वाले तंत्र में संयम की ज्यादा जरूरत होती है। अगर भीड़ को नियंत्रित करने के लिये पुलिस ने बल का प्रयोग कर दिया तो भगदड़ की स्थिति पैदा हो जाती है। हरिद्वार में 1986 में सोमवती अमावस्या पर मनसा देवी भगदड़ में भी भीड़ का दबाव रोकने के लिये पुलिस द्वारा किया गया लाठी चार्ज ही भगदड़ का करण रहा है। उस भगदड़ में 21 लोग मारे गये थे।
समय के साथ ही परिस्थितियों के बदलने से इतनी अधिक भीड़ों को नियंत्रित करना और जन सुरक्षा सुनिश्चित करना भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। इसलिये भीड़ के आर्थिक पक्ष के बजाय प्रबंधन और सुरक्षा के पक्ष पर ज्यादा ध्यान दिये जाने की जरूरत श्रद्धालुओं से आर्थिक लाभ उठाने वालों को सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिये और अगर प्रबंधन समितियां जिम्मेदारी का निर्वहन करने में सक्षम न हों तो फिर सरकार को मूक दर्शक बने नहीं रहना चाहिये। जैसी कि वैष्णो देवी हादसे के बाद राज्य सरकार मौन बैठ गयी।
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