राष्ट्रीय

रेलवे द्वारा राख की ढुलाई के लिए हरित पहल

 

नयी दिल्ली, 18 जून।  रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में रेल नेटवर्क के माध्यम से राख की ढुलाई का बड़े पैमाने पर परिवहन को सक्षम बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल पर चर्चा की गई। उद्देश्य सरल लेकिन परिवर्तनकारी है: राख की ढुलाई को बिजली संयंत्रों से उद्योगों तक कुशलतापूर्वक पहुँचाना, जहाँ इसका उपयोग सड़कों के निर्माण, ईंटों के उत्पादन, सीमेंट उत्पादन और देश भर में अवसंरचना विकास में किया जा सकता है। बैठक में रेल राज्य मंत्री श्री वी. सोमन्ना और श्री रवनीत सिंह बिट्टू भी उपस्थित थे।

थर्मल पावर प्लांटों से प्रतिवर्ष लगभग 340 करोड़ टन उड़ने वाली राख उत्पन्न होती है। दशकों से यह भारी राख चिमनियों के आसपास जमा रहती थी। अब भारतीय रेलवे एक हरित पहल के माध्यम से इसे बदल रहा है, जिसके अंतर्गत विशेष कंटेनरों और रेल गलियारों का एक समर्पित लॉजिस्टिक्स नेटवर्क बनाया जा रहा है। यह नेटवर्क अपशिष्ट पदार्थ को उसके उत्पादन स्थल से उसके आवश्यक स्थल तक पहुंचाएगा।

इस पहल की खूबसूरती इसकी सादगी में निहित है: बिजली संयंत्र जो कचरा फेंकता है, सीमेंट संयंत्र उसे सहेज कर रखता है। राख को सही ढंग से स्थानांतरित और उपयोग करने से सीमेंट, कंक्रीट, ब्लॉक और बोर्ड बनाने का कच्चा माल प्राप्त होता है। सस्ती राख का मतलब है सस्ती ईंटें, सीमेंट की कम कीमतें और अंततः शहरी और ग्रामीण भारत में आवास की सुलभता में वृद्धि।

 

रेलगाड़ियों और विशेष रूप से निर्मित लॉजिस्टिक्स प्रणालियों के भीतर समाहित, उड़ने वाली राख की ढुलाई उचित तरीके से एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी जाती है, और एक प्रदूषक के रूप में नहीं बल्कि भारत के बुनियादी ढांचे के विकास में एक उत्पादक भागीदार के रूप में पहुंचती है।

मूल रूप से, यही एक चक्रीय अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धांत है, जहां अपशिष्ट धन बन जाता है और बोझ ही निर्माण खंड बन जाता है।

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