बार-बार चेतावनी दे रहा हिमालय, आखिर कब लेंगे सबक?
आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति के बीच अनियंत्रित विकास, वहन क्षमता और पूर्व चेतावनी तंत्र पर गंभीरता से विचार करने का समय

— प्रकाश कपरुवाण
नेपाल की हालिया भीषण त्रासदी ने एक बार फिर केदारनाथ, रैणी-तपोवन, धराली और थराली की आपदाओं के साथ ही जोशीमठ भू-धंसाव की भयावह स्मृतियों को ताजा कर दिया है। हिमालयी क्षेत्र में लगातार सामने आ रही जलप्रलय, भूस्खलन, भू-धंसाव और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाओं ने उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लोगों को भविष्य को लेकर चिंतित कर दिया है।
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाएं कोई नई बात नहीं हैं। हिमालय स्वयं एक युवा और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है। यहां भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना और नदियों में अचानक उफान जैसी घटनाएं सदियों से होती रही हैं। फर्क इतना है कि पहले बड़ी आपदाओं के बीच अपेक्षाकृत लंबा अंतराल दिखाई देता था, जबकि अब ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आ रही हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण अतिवृष्टि और चरम मौसमी घटनाओं का बढ़ता जोखिम तथा दूसरी ओर मानवीय हस्तक्षेप ने चिंता को और गंभीर बना दिया है।
केदारनाथ की 2013 की त्रासदी हो, फरवरी 2021 की रैणी-तपोवन आपदा, जोशीमठ का भू-धंसाव हो या हाल के वर्षों में धराली और थराली जैसी घटनाएं—हर आपदा अपने पीछे एक सवाल छोड़ जाती है कि हिमालय आखिर हमें कितनी बार चेतावनी देगा?
आपदा प्राकृतिक, लेकिन नुकसान कितना प्राकृतिक?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती मार के पीछे केवल प्रकृति ही जिम्मेदार है या हमारी विकास नीति भी जोखिम को बढ़ा रही है? क्या हिमालय और देवभूमि को केवल पर्यटन, तीर्थाटन और राजस्व की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति हमें भविष्य के किसी बड़े संकट की ओर तो नहीं धकेल रही?
वैज्ञानिक और पर्यावरणविद हिमालय की संवेदनशीलता को लेकर दशकों से चेतावनी देते रहे हैं। इसके बावजूद पहाड़ों को काटकर चौड़ी सड़कें बनाने, सुरंगों के निर्माण, नदियों के किनारे भारी निर्माण, ढलानों पर अनियोजित बसावट और क्षमता से अधिक पर्यटन दबाव की प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है। विकास आवश्यक है, लेकिन सवाल विकास का विरोध या समर्थन नहीं, बल्कि उसके स्वरूप का है। हिमालय के भूगोल और पर्यावरण को समझे बिना किया गया विकास अंततः विकास को ही संकट में डाल सकता है।
प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक नियोजन और आधुनिक तकनीक से जनहानि को काफी हद तक कम अवश्य किया जा सकता है। वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद विभिन्न स्तरों पर हुए अध्ययनों में पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, मौसम निगरानी और सुरक्षित निकासी व्यवस्था पर जोर दिया गया था। इसके बावजूद फरवरी 2021 में रैणी-तपोवन की विनाशकारी आपदा ने एक बार फिर प्रभावी पूर्व चेतावनी व्यवस्था की जरूरत को सामने ला दिया।
हिमालय में आपदा प्रबंधन का अर्थ घटना घटने के बाद राहत और बचाव अभियान चलाना भर नहीं होना चाहिए। असली आपदा प्रबंधन उस संभावित खतरे को पहले पहचानने और समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में है।
देवभूमि के मूल स्वरूप को भी समझना होगा
उत्तराखंड को देवभूमि केवल इसलिए नहीं कहा जाता कि यहां चारधाम और असंख्य मंदिर हैं। इस भूभाग के प्रति सदियों से एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक श्रद्धा रही है। इसी संदर्भ में सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी से जुड़ा प्रसंग उल्लेखनीय है।
उन्होंने बताया था कि वर्ष 1963-64 के आसपास सेना में कमीशन मिलने के बाद उनकी पहली तैनाती जोशीमठ क्षेत्र में हुई। घर से विदा होते समय उनके माता-पिता ने कहा था—तुम्हारी तैनाती साक्षात देवभूमि में हुई है, वहां तो कण-कण में भगवान हैं।
करीब दो वर्ष की सेवा के बाद जब वे जोशीमठ से लौट रहे थे तो अचानक उनके मन में विचार आया कि माता-पिता ने कहा था कि वहां कण-कण में भगवान हैं, लेकिन दो वर्षों में उन्हें ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ। बताया जाता है कि इसी दौरान जोशीमठ से कुछ दूरी पर सड़क के नीचे की ओर से उन्हें एक महात्मा और एक साध्वी आते दिखाई दिए। उनके दिव्य स्वरूप से प्रभावित होकर अधिकारी ने चालक से वाहन रुकवाया। वह वाहन से उतरे, लेकिन पीछे मुड़कर देखा तो दोनों कहीं दिखाई नहीं दिए। उन्होंने वाहन वापस मोड़कर आसपास तलाश भी की, पर वे नहीं मिले।
वर्षों बाद नब्बे के दशक में जब वही अधिकारी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के रूप में दोबारा जोशीमठ आए तो उन्होंने इस अनुभव का उल्लेख किया और स्थानीय विद्वानों की सलाह पर उस स्थान पर एक छोटा मंदिर भी बनवाया। यह प्रसंग आस्था से जुड़ा है, लेकिन इसके भीतर देवभूमि के प्रति उस पुरानी संवेदना का संदेश भी छिपा है जिसमें हिमालय को केवल जमीन, पत्थर और संसाधन नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक-प्राकृतिक धरोहर माना जाता रहा है।
बदरीनाथ में विकास की सीमा कौन तय करेगा?
आज स्थिति यह है कि केवल सामान्य पर्वतीय कस्बे ही नहीं, बल्कि भू-वैकुंठ कहे जाने वाले बदरीनाथ धाम तक भारी निर्माण गतिविधियों के दबाव में हैं। धार्मिक मान्यता है कि बदरीनाथ में भगवान श्रीहरि नारायण तपस्यारत हैं और उनकी तपस्या में व्यवधान न पड़े, इसलिए यहां शंख तक नहीं बजाया जाता। उसी शांत हिमालयी वातावरण में आज भारी मशीनों की आवाज सुनाई देती है।
बदरीनाथ में विकास और पुनर्निर्माण के नाम पर बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए हैं। अलकनंदा के तटवर्ती क्षेत्रों में निर्माण और बदलाव को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंताएं भी सामने आती रही हैं। मंदिर के समीप गांधी घाट और तप्तकुंड जैसे महत्वपूर्ण स्थलों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यहां प्रत्येक निर्माण कार्य का मूल्यांकन केवल सौंदर्यीकरण या तीर्थयात्रियों की सुविधा की दृष्टि से नहीं, बल्कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह, भूगर्भीय स्थिरता और दीर्घकालीन आपदा जोखिम को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
समय की जरूरत के अनुसार धामों का विकास और तीर्थयात्रियों के लिए बेहतर सुविधाएं आवश्यक हैं, लेकिन हिमालयी तीर्थस्थलों के विकास का पैमाना मैदानी शहरों या देश के अन्य धार्मिक स्थलों जैसा नहीं हो सकता। हिमालय की अपनी भौगोलिक, भूगर्भीय और पारिस्थितिक सीमाएं हैं। उन्हें नजरअंदाज करके तैयार किया गया कोई भी विकास मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता।
वहन क्षमता तय किए बिना विकास खतरनाक
अब समय आ गया है कि बदरीनाथ, केदारनाथ जैसे उच्च हिमालयी धामों के साथ जोशीमठ सहित सभी संवेदनशील पर्वतीय नगरों और पर्यटन स्थलों की वैज्ञानिक वहन क्षमता तय की जाए। किसी स्थान पर एक दिन में कितने यात्री पहुंच सकते हैं, कितने वाहन सुरक्षित रूप से संचालित हो सकते हैं, कितने होटल और भवन वहां का भूभाग सह सकता है, पानी और कचरा निस्तारण की कितनी क्षमता है और आपदा आने की स्थिति में कितने लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है—इन सवालों के जवाब विकास योजनाओं से पहले तलाशे जाने चाहिए।
जोशीमठ भू-धंसाव ने दिखाया कि हिमालय में जमीन की सहनशीलता की भी एक सीमा है। केदारनाथ, रैणी-तपोवन, धराली, थराली और नेपाल की हालिया त्रासदी भी यही संदेश देती है कि हिमालय की चेतावनियों को अब सामान्य घटना समझकर टालना भारी भूल होगी।
हिमालय को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो उसकी प्रकृति के अनुकूल हो। सड़कें, पर्यटन, तीर्थाटन, ऊर्जा परियोजनाएं और आधुनिक सुविधाएं जरूरी हैं, मगर इनके साथ भूगर्भीय अध्ययन, पर्यावरणीय संतुलन, नदी क्षेत्रों की सुरक्षा, निर्माण की सीमा, प्रभावी पूर्व चेतावनी तंत्र और मजबूत आपदा प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।
प्रकृति को पूरी तरह नियंत्रित करना मनुष्य के हाथ में नहीं है, लेकिन आपदा को महाविनाश बनने से रोकना काफी हद तक हमारे हाथ में है। सवाल केवल यह है कि केदारनाथ से नेपाल तक बार-बार मिल रही हिमालय की इन चेतावनियों को हम कब गंभीरता से लेंगे?
