मानव वन्यजीव संघर्ष : बढ़ते जंगल, घटता फासला
A 2000–2019 study of 2,046 attacks in Uttarakhand (1,914 leopard, 132 tiger) shows leopards pose the wider threat across all 13 districts, while rarer tiger attacks prove deadlier. Conflicts arise not merely from rising wildlife numbers but from shared landscapes, monsoon crops for leopards, summer forest forays for tigers, and human activity near settlements. Conservation success demands species-specific strategies—village safeguards for leopards, reduced forest dependence for tigers—to balance protection with human safety..Jay Singh Rawat

उत्तराखंड की पहचान उसके जंगलों, पहाड़ों और वन्यजीवों से है। लेकिन यही प्राकृतिक संपदा अब कई इलाकों में इंसानी सुरक्षा के लिए चुनौती भी बन रही है। सवाल केवल यह नहीं है कि गुलदार या बाघ कितने हमले कर रहे हैं, बल्कि यह समझना ज्यादा जरूरी है कि इंसान और इन बड़े शिकारी जीवों के बीच टकराव की परिस्थितियां आखिर क्यों बढ़ रही हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज प्रकाशित अपनी रिपोर्ट (शिवानी आज़ाद) में ब्रिटिश इकोलॉजिकल सोसाइटी के जर्नल People and Nature में प्रकाशित एक अध्ययन के हवाले से इस तस्वीर को सामने रखा है। अध्ययन में वर्ष 2000 से 2019 के बीच उत्तराखंड में दर्ज बाघ और गुलदार के कुल 2,046 मानव हमलों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। इनमें 1,914 घटनाएं गुलदार और 132 बाघों से जुड़ी थीं। शोधकर्ता अमनदीप राठी ने राजीव भरतरी और डॉ. वाई.वी. झाला के मार्गदर्शन में इन घटनाओं के स्थान, मौसम, मानव गतिविधियों और पर्यावरणीय परिस्थितियों को समझने की कोशिश की है।
गुलदार का खतरा ज्यादा व्यापक, बाघ का हमला ज्यादा घातक
आंकड़ों का पहला बड़ा संदेश यही है कि उत्तराखंड में मानव-गुलदार संघर्ष का फैलाव मानव-बाघ संघर्ष की तुलना में कहीं अधिक है। अध्ययन अवधि में हर साल औसतन करीब 98 गुलदार हमले दर्ज हुए। इनमें 22.3 प्रतिशत घटनाएं जानलेवा रहीं। दूसरी ओर बाघों से औसतन लगभग सात हमले सालाना हुए, लेकिन उनमें 34.8 प्रतिशत घातक थे। यानी बाघ के हमले संख्या में कम होने के बावजूद उनके जानलेवा होने की संभावना अधिक रही।
यह अंतर दोनों प्रजातियों की जीवनशैली को भी समझाता है। गुलदार बेहद अनुकूलनशील जीव है और जंगल के साथ-साथ खेतों, गांवों तथा मानव बस्तियों के आसपास भी अपनी मौजूदगी बनाए रख सकता है। बाघ अपेक्षाकृत बड़े और अधिक क्षेत्रीय शिकारी हैं तथा उनके हमलों का संबंध जंगल और संरक्षित क्षेत्रों से जुड़े इलाकों से ज्यादा दिखाई देता है।
पहाड़ों में गुलदार का दायरा लगभग पूरे राज्य तक
गुलदार से जुड़े संघर्ष का भूगोल इस समस्या की गंभीरता को और स्पष्ट करता है। अध्ययन में राज्य के सभी 13 जिलों में गुलदार के हमले सामने आए। पौड़ी गढ़वाल में कुल हमलों का सबसे बड़ा हिस्सा दर्ज हुआ। इसके बाद अल्मोड़ा और टिहरी गढ़वाल जैसे जिले रहे। हालांकि प्रति 100 वर्ग किलोमीटर हमलों का घनत्व रुद्रप्रयाग में सबसे अधिक पाया गया।
इसका मतलब यह है कि समस्या को केवल कुछ ‘हॉटस्पॉट’ तक सीमित मानना पर्याप्त नहीं होगा। पहाड़ के उन इलाकों में भी जोखिम मौजूद है जहां जंगल और गांव एक-दूसरे में घुले-मिले हैं और जहां ग्रामीण जीवन आज भी बड़े पैमाने पर जंगल पर निर्भर है।
बाघों की तस्वीर इससे अलग है। उनके हमले मुख्य रूप से राज्य के निचले इलाकों के कुछ जिलों में केंद्रित रहे। नैनीताल अकेले कुल बाघ हमलों के करीब 65 प्रतिशत से जुड़ा पाया गया। अध्ययन के मुताबिक अधिकांश घटनाएं 2,000 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों तथा संरक्षित क्षेत्रों की सीमा के लगभग 40 किलोमीटर के दायरे में हुईं। टेराई आर्क लैंडस्केप इस लिहाज से विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा।
असली कहानी जंगल से ज्यादा ‘इंटरफेस’ की है
इन आंकड़ों को केवल इस रूप में देखना कि ‘जानवर बढ़ गए हैं, इसलिए हमले बढ़ गए’, अधूरा निष्कर्ष होगा। अध्ययन का महत्व इसी बात में है कि उसने हमलों को पर्यावरणीय और मानवीय परिस्थितियों के साथ जोड़कर देखा।
इसके लिए शोधकर्ताओं ने MaxEnt यानी Maximum Entropy आधारित स्थानिक मॉडलिंग का इस्तेमाल किया। इसमें ऊंचाई, सड़क घनत्व, रात में कृत्रिम रोशनी, संरक्षित क्षेत्रों से दूरी और अन्य भौगोलिक-पर्यावरणीय कारकों को देखा गया। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किन परिस्थितियों में इंसान और शिकारी जीवों का संपर्क अधिक होने की संभावना रहती है।
गुलदार के मामले में सड़क घनत्व और ग्रामीण इलाकों में रात की रोशनी महत्वपूर्ण संकेतक बने। खेतों, गांवों और जंगलों के बीच लगातार आवाजाही तथा मानव गतिविधियों ने भी जोखिम बढ़ाया। दूसरे शब्दों में, संघर्ष जंगल की सीमा पर समाप्त नहीं होता; वह उस पूरे क्षेत्र में फैल जाता है जहां मनुष्य और वन्यजीव एक ही भू-दृश्य का इस्तेमाल करते हैं।
मानसून में गुलदार, गर्मियों में बाघ
मौसम भी इस संघर्ष को प्रभावित करता है। गुलदार के हमलों में मानसून के दौरान वृद्धि देखी गई। जुलाई और अक्टूबर के आसपास खेतों में खड़ी फसल और घनी वनस्पति गुलदारों को छिपने के लिए बेहतर आवरण देती है। ऐसे समय में ग्रामीणों की खेतों में आवाजाही भी बनी रहती है, जिससे अचानक सामना होने की आशंका बढ़ जाती है।
बाघों के हमले दूसरी तरह का मौसमी पैटर्न दिखाते हैं। मार्च से मई के गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क महीनों में घटनाएं अधिक रहीं। यह वह समय भी है जब ग्रामीण ईंधन, चारा और गैर-काष्ठ वन उपज यानी NTFP जुटाने जैसे कामों के लिए जंगलों में अधिक जाते हैं। अध्ययन के अनुसार करीब 90 प्रतिशत बाघ हमले जंगल के भीतर संसाधन जुटाने के दौरान हुए, जबकि गुलदार की लगभग 44 प्रतिशत घटनाएं बस्तियों के आसपास और करीब 16 प्रतिशत खेतों में रोजमर्रा के घरेलू या कृषि कार्यों के दौरान हुईं।
यह अंतर भविष्य की रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। बाघ के लिए जंगल में मानव प्रवेश और संसाधन निर्भरता कम करना ज्यादा अहम हो सकता है, जबकि गुलदार के मामले में गांव, खेत और घर के आसपास का पूरा मानव-वन्यजीव इंटरफेस महत्वपूर्ण हो जाता है।
पुरुष ज्यादा सामने आते हैं, लेकिन महिलाओं और बच्चों का जोखिम अलग
अध्ययन में एक और सामाजिक पहलू सामने आया। दोनों प्रजातियों के हमलों में वयस्क पुरुषों की संख्या अधिक रही। इसके पीछे ग्रामीण क्षेत्रों में काम के पारंपरिक बंटवारे को समझना होगा, क्योंकि जंगल, खेत और दूरदराज के इलाकों में होने वाले कई श्रमसाध्य कार्यों में पुरुषों की भागीदारी अधिक होती है।
लेकिन गुलदार के हमलों में महिलाओं और बच्चों की मृत्यु का अनुपात चिंता पैदा करता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि गुलदार का मानव बस्तियों के करीब आना महिलाओं और बच्चों को ऐसे स्थानों पर जोखिम में डालता है जहां वे घरेलू काम, खेत या आसपास की दैनिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं।
इसलिए केवल ‘लोगों को जंगल में न जाने’ की सलाह गुलदार संघर्ष का पूरा समाधान नहीं हो सकती। खतरा कई बार घर की चौखट, खेत की मेड़ या गांव के रास्ते तक पहुंच चुका होता है।
संरक्षण की सफलता ने नई चुनौती भी पैदा की
उत्तराखंड में बाघ संरक्षण की कहानी मूलतः सफलता की कहानी है। वर्षों के संरक्षण प्रयासों से बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। लेकिन स्वस्थ वन्यजीव आबादी का अर्थ यह भी है कि अब उनके लिए पर्याप्त और जुड़े हुए आवास उपलब्ध रखना जरूरी है।
अध्ययन में बाघों की संख्या और मानव हमलों के बीच सकारात्मक संबंध पाया गया। अनुमान के मुताबिक हर 100 बाघों की आबादी बढ़ने पर लगभग 12 अतिरिक्त मानव हमलों की संभावना देखी गई। इसका अर्थ यह नहीं कि हर बढ़ती बाघ आबादी सीधे संघर्ष पैदा करती है; बल्कि यह बताता है कि संरक्षण के साथ-साथ आवास की क्षमता और मानव गतिविधियों के साथ उसके ओवरलैप को भी प्रबंधित करना होगा।
गुलदार के मामले में स्थिति और जटिल है। पहाड़ों से लगातार पलायन के कारण अनेक खेत और घर खाली हुए हैं। कभी खेती वाली जमीन पर अब झाड़ियां और घनी वनस्पति उग आई है। ऐसी जगहें गुलदार को छिपने और शिकार तलाशने के लिए उपयुक्त आवरण दे सकती हैं। दूसरी ओर कूड़ा, मवेशियों के शव और आसान शिकार भी उन्हें मानव बस्तियों के करीब खींच सकते हैं।
इसलिए मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल ‘आक्रामक जानवर’ की समस्या मानना वैज्ञानिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। असल चुनौती उस बदलते भू-दृश्य की है जहां एक तरफ वन्यजीव संरक्षण सफल हो रहा है और दूसरी तरफ सड़क, निर्माण, खेती, पलायन और जंगल पर ग्रामीण निर्भरता प्राकृतिक आवासों को नए ढंग से प्रभावित कर रहे हैं।
समाधान भी प्रजाति के हिसाब से अलग होना चाहिए
इस अध्ययन से निकलने वाला सबसे व्यावहारिक संदेश यही है कि बाघ और गुलदार के लिए एक जैसी नीति कारगर नहीं होगी। गुलदार के लिए गांव-केंद्रित रणनीति की जरूरत है—खतरनाक स्थानों की पहचान, रात के समय निगरानी, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा, सुरक्षित पशुबाड़े, कचरा प्रबंधन और घरों के आसपास घनी झाड़ियों की वैज्ञानिक तरीके से सफाई जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
बाघों के मामले में जंगल के भीतर मानव गतिविधियों को सुरक्षित बनाना, संसाधन संग्रह के दौरान सावधानियां, संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त और वन्यजीव गलियारों की रक्षा ज्यादा अहम होगी। लक्षित फेंसिंग भी वहां की जा सकती है जहां इसकी जरूरत हो, लेकिन ऐसी व्यवस्था वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन के रास्ते को बाधित न करे।
दीर्घकालिक समाधान केवल पिंजरे लगाने या किसी एक समस्या-ग्रस्त जानवर को पकड़ने में नहीं है। ग्रामीणों की जंगल पर निर्भरता घटाने के लिए भरोसेमंद बिजली, स्वच्छ ईंधन, पानी और चारे के विकल्प उपलब्ध कराने होंगे। साथ ही जंगलों में प्राकृतिक शिकार आधार को मजबूत करना और वन्यजीव गलियारों को विकास के दबाव से बचाना होगा।
संरक्षण और सुरक्षा को आमने-सामने खड़ा करना समाधान नहीं
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष का यह नया अध्ययन एक असहज लेकिन जरूरी बात सामने रखता है—वन्यजीव संरक्षण की सफलता और मानव सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं हैं। समस्या तब पैदा होती है जब बढ़ती वन्यजीव आबादी, सिकुड़ते या खंडित आवास और बढ़ती मानवीय गतिविधियां एक ही जगह पर टकराने लगती हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की रिपोर्ट ने जिस अध्ययन को सामने रखा है, वह इसी बदलते समीकरण को आंकड़ों के जरिए समझने का प्रयास है। 19 वर्षों के 2,046 हमलों का विश्लेषण बताता है कि हर घटना के पीछे केवल एक ‘आक्रामक जानवर’ नहीं, बल्कि स्थान, मौसम, मानव गतिविधि, भू-दृश्य और सामाजिक परिस्थितियों का पूरा तंत्र काम करता है।
उत्तराखंड के लिए आगे की राह इसलिए दोहरी होनी चाहिए—जंगलों और उनके शिकारियों को बचाना भी और उन गांवों के लोगों को सुरक्षित रखना भी जो पीढ़ियों से इन्हीं जंगलों के साथ रहते आए हैं। यदि वैज्ञानिक जोखिम-मानचित्रण, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और प्रजाति-विशिष्ट प्रबंधन को एक साथ लागू किया जाए, तो संरक्षण और सह-अस्तित्व के बीच वह संतुलन बनाया जा सकता है जिसकी पहाड़ को आज सबसे ज्यादा जरूरत है।
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About Author : Jay Singh Rawat is a veteran Dehradun-based journalist and author with nearly five decades of experience. He has reported for leading newspapers and agencies, served as resident editor, and written extensively on Uttarakhand’s politics, environment, tribes, and society. Author of eight books—two published by the National Book Trust—he is a recipient of the Bhairav Dutt Dhulia Journalism Award.
