प्रोस्टेट कैंसर: हर पुरुष को जांच नहीं, सही समय पर सही जांच की जरूरत
Prostate cancer is among the most common cancers affecting men. The risk increases with age, yet the disease can remain silent for years without causing noticeable symptoms. That raises an obvious question: if a simple blood test called PSA can provide an early warning, why aren’t all men routinely screened?
-EDITED BY JYOTI RAWAT-
कैंसर की जांच को लेकर आम धारणा सीधी है—बीमारी जितनी जल्दी पकड़ में आए, इलाज और बचने की संभावना उतनी ही बेहतर होगी। लेकिन प्रोस्टेट कैंसर इस सामान्य धारणा के सामने एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। यदि एक साधारण रक्त जांच से इस कैंसर का संकेत मिल सकता है, तो फिर हर पुरुष की नियमित जांच क्यों नहीं की जाती?
इसका उत्तर चिकित्सा विज्ञान के उस विरोधाभास में छिपा है, जिसमें बीमारी को खोज लेना कभी-कभी मरीज को लाभ पहुंचाने के बजाय अनावश्यक चिंता, जांच और उपचार के रास्ते पर भी ले जा सकता है। प्रोस्टेट कैंसर के अनेक मामले इतने धीमे बढ़ते हैं कि व्यक्ति पूरी जिंदगी उनके साथ सामान्य रूप से जी सकता है और उसे कभी पता भी नहीं चलता कि उसके शरीर में कैंसर था।
यही कारण है कि आज विशेषज्ञों का जोर केवल कैंसर खोजने पर नहीं, बल्कि यह पहचानने पर है कि कौन-सा कैंसर वास्तव में खतरनाक है और किसे केवल निगरानी में रखा जा सकता है।
प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण
प्रोस्टेट कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती अवस्था में अक्सर इसके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। बीमारी बढ़ने पर पेशाब करने में कठिनाई, पेशाब की धार कमजोर या रुक-रुक कर आना, बार-बार पेशाब लगना—विशेषकर रात में—और मूत्राशय पूरी तरह खाली न होने का अहसास हो सकता है। पेशाब या वीर्य में खून आना, वीर्य स्खलन के समय दर्द तथा स्तंभन संबंधी समस्या भी कुछ मामलों में दिखाई दे सकती है।
यदि कैंसर प्रोस्टेट से बाहर फैलने लगे तो कमर, पीठ, कूल्हों या हड्डियों में लगातार दर्द, पैरों में कमजोरी या सुन्नपन, बिना कारण वजन घटना और अत्यधिक थकान जैसे लक्षण हो सकते हैं। हालांकि पेशाब संबंधी ये लक्षण केवल कैंसर के कारण नहीं होते; बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि या संक्रमण में भी ऐसे लक्षण हो सकते हैं। इसलिए इनके बने रहने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
PSA जांच क्या बताती है?
प्रोस्टेट पुरुषों में मूत्राशय के नीचे स्थित अखरोट के आकार की ग्रंथि है। यह प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन यानी PSA नामक प्रोटीन बनाती है। रक्त में PSA का बढ़ा स्तर प्रोस्टेट कैंसर का संकेत हो सकता है, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी सीमा भी है—बढ़ा हुआ PSA हमेशा कैंसर नहीं होता।
परंपरागत रूप से 4.0 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर से अधिक PSA को संदिग्ध माना जाता रहा है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ PSA स्वाभाविक रूप से भी बढ़ सकता है। प्रोस्टेट का सामान्य रूप से बढ़ना, जिसे बीपीएच कहा जाता है, संक्रमण, सूजन या चोट भी PSA बढ़ा सकती है।
इसलिए PSA जांच कैंसर की अंतिम पुष्टि नहीं करती, बल्कि यह बताती है कि आगे और जांच की जरूरत हो सकती है।
PSA जांच की संवेदनशीलता 90 प्रतिशत से अधिक बताई गई है, यानी यह अधिकांश वास्तविक कैंसर मामलों को पकड़ सकती है। लेकिन इसकी विशिष्टता काफी कम है। इसका अर्थ यह है कि जिन पुरुषों का PSA बढ़ा मिलता है, उनमें बड़ी संख्या में वास्तव में कैंसर नहीं होता।
37 हजार से अधिक पुरुषों पर किए गए एक अध्ययन में लगभग पांच हजार लोगों का PSA बढ़ा मिलने के बाद बायोप्सी की गई। इनमें दो-तिहाई से अधिक पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर नहीं था। यानी उन्हें ऐसा संकेत मिला जिसने कैंसर की आशंका पैदा की, लेकिन बाद में वह गलत साबित हुआ।
जांच से मौतें घटीं, लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी
इसका अर्थ यह नहीं कि PSA जांच बेकार है। इसके लाभ के भी मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण हैं। अमेरिका में PSA स्क्रीनिंग के दौर में 1988 से 2016 के बीच तीन लाख से अधिक संभावित मौतें टलने का अनुमान लगाया गया है।
यूरोप में 1.60 लाख से अधिक पुरुषों पर किए गए सबसे बड़े दीर्घकालिक अध्ययनों में से एक में लगभग 23 वर्ष तक निगरानी की गई। PSA जांच वाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर से मृत्यु का जोखिम जांच न कराने वाले समूह की तुलना में 13 प्रतिशत कम पाया गया। प्रत्येक 456 पुरुषों को जांच के लिए आमंत्रित करने पर प्रोस्टेट कैंसर से एक मृत्यु टली।
लेकिन इसी उपलब्धि के साथ दूसरा सवाल सामने आया—इसके लिए कितने पुरुषों को ऐसी जांच, बायोप्सी या उपचार से गुजरना पड़ा जिसकी शायद उन्हें आवश्यकता ही नहीं थी?
अलग-अलग अध्ययनों के विश्लेषण में अनुमान लगाया गया है कि PSA स्क्रीनिंग से मिले प्रोस्टेट कैंसर के लगभग 20 से 50 प्रतिशत मामले ऐसे हो सकते हैं जिनमें कैंसर मरीज के जीवनकाल में गंभीर समस्या पैदा नहीं करता। इसे चिकित्सा विज्ञान में ‘ओवरडायग्नोसिस’ यानी जरूरत से अधिक निदान कहा जाता है।
शरीर में कैंसर था, लेकिन कभी बीमारी नहीं बना
प्रोस्टेट कैंसर की प्रकृति समझने के लिए शव परीक्षणों के परिणाम और भी चौंकाने वाले हैं। छह हजार से अधिक ऐसे पुरुषों के अध्ययनों में, जिनकी मृत्यु दूसरे कारणों से हुई थी, 50 से 59 वर्ष आयु के 20 प्रतिशत से अधिक पुरुषों के प्रोस्टेट में कैंसर मिला। 70 से 79 वर्ष के पुरुषों में यह अनुपात एक-तिहाई से अधिक था।
इन लोगों को जीवन भर न कैंसर का पता था और न उसके लक्षण थे।
यानी शरीर में कैंसर मौजूद होना और उस कैंसर का जीवन के लिए खतरा बन जाना दो अलग-अलग स्थितियां हो सकती हैं।
ब्रिटेन में 1,600 से अधिक प्रोस्टेट कैंसर रोगियों पर किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने इस तथ्य को और स्पष्ट किया। मरीजों को प्रोस्टेट निकालने की सर्जरी, रेडियोथेरेपी और केवल सक्रिय निगरानी के तीन समूहों में बांटा गया। 15 वर्ष बाद प्रोस्टेट कैंसर से मृत्यु की दर केवल 2.7 प्रतिशत थी और तीनों समूहों में मृत्यु दर लगभग समान रही।
इलाज के भी हो सकते हैं गंभीर दुष्प्रभाव
कैंसर का नाम सुनते ही उसे तत्काल निकाल देने या नष्ट करने की इच्छा स्वाभाविक है। लेकिन कम जोखिम वाले प्रोस्टेट कैंसर में यही फैसला कभी-कभी जीवन की गुणवत्ता को अनावश्यक रूप से प्रभावित कर सकता है।
प्रोस्टेट की सर्जरी और रेडियोथेरेपी के बाद कुछ मरीजों में पेशाब पर नियंत्रण की समस्या और स्तंभन दोष जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं। यदि ऐसा उपचार उस कैंसर के लिए किया गया हो जो शायद कभी जानलेवा बनने वाला ही नहीं था, तो उपचार से होने वाला नुकसान विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी कारण कम जोखिम वाले अनेक मामलों में अब ‘एक्टिव सर्विलांस’ यानी सक्रिय निगरानी अपनाई जाती है। इसमें कैंसर का तुरंत उपचार करने के बजाय PSA, एमआरआई और जरूरत के अनुसार अन्य जांचों से उस पर लगातार नजर रखी जाती है।
बढ़ा PSA अब सीधे बायोप्सी का टिकट नहीं
प्रोस्टेट कैंसर की जांच में हाल के वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यही है। पहले PSA बढ़ा हुआ मिलने के बाद अक्सर सीधे बायोप्सी की जाती थी। अब ऐसा जरूरी नहीं है।
डॉक्टर पहले PSA जांच दोबारा करा सकते हैं। इसके बाद रक्त और मूत्र में विशेष जैविक संकेतकों की जांच, PSA में समय के साथ हो रहे बदलाव का अध्ययन और प्रोस्टेट का एमआरआई किया जा सकता है। इनसे यह तय करने में मदद मिलती है कि वास्तव में बायोप्सी की जरूरत किसे है।
और यदि बायोप्सी में कैंसर मिल भी जाए, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हर मरीज को तुरंत ऑपरेशन या रेडियोथेरेपी करानी होगी। कैंसर की आक्रामकता, फैलाव, मरीज की उम्र और समग्र स्वास्थ्य को देखकर उपचार या सक्रिय निगरानी का फैसला किया जाता है।
तो PSA जांच किसे करानी चाहिए?
यही वह प्रश्न है जिसका एक उत्तर सभी पुरुषों पर लागू नहीं किया जा सकता। अमेरिकी प्रिवेंटिव सर्विसेज टास्क फोर्स 55 से 69 वर्ष के पुरुषों में PSA स्क्रीनिंग को व्यक्तिगत निर्णय मानती है। व्यक्ति को डॉक्टर के साथ इसके संभावित लाभ और नुकसान पर चर्चा कर निर्णय लेना चाहिए। 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के पुरुषों में नियमित PSA स्क्रीनिंग की सिफारिश नहीं की गई है।
लेकिन उम्र ही अकेला आधार नहीं है। पारिवारिक इतिहास और व्यक्तिगत जोखिम भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए यह फैसला केवल कैलेंडर देखकर नहीं, व्यक्ति की परिस्थितियों को समझकर किया जाना चाहिए।
प्रोस्टेट कैंसर से मिलने वाला सबसे महत्वपूर्ण सबक शायद यही है कि आधुनिक चिकित्सा में ‘ज्यादा जांच’ हमेशा ‘बेहतर चिकित्सा’ नहीं होती। उद्देश्य हर कैंसर को खोज निकालना भर नहीं, बल्कि उस कैंसर को समय रहते पहचानना है जो वास्तव में जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है।
इसलिए हर पुरुष को PSA जांच कराने से अधिक जरूरी है कि वह PSA को समझे। डॉक्टर से सवाल करे—मेरी उम्र और जोखिम को देखते हुए क्या मुझे जांच की जरूरत है? यदि PSA बढ़ा मिला तो अगला कदम क्या होगा? और यदि कम जोखिम वाला कैंसर मिला तो क्या तत्काल उपचार के बजाय निगरानी संभव है?
सही जानकारी के आधार पर लिया गया यही व्यक्तिगत निर्णय अनावश्यक उपचार से बचाते हुए जरूरत पड़ने पर समय पर कैंसर पकड़ने का सबसे संतुलित रास्ता हो सकता है।
आधार: ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. मिकाएल ए. सेकेरेस के PSA स्क्रीनिंग संबंधी विश्लेषण और उसमें उद्धृत प्रमुख वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर स्वतंत्र रूप से तैयार लेख।
अस्वीकरण: यह लेख जन-जागरूकता और सामान्य जानकारी के लिए है। इसे व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह, जांच, निदान या उपचार का विकल्प न माना जाए। PSA जांच अथवा प्रोस्टेट संबंधी किसी समस्या के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

