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रूसी तेल और अमेरिकी शुल्क के बीच फिर फंसा भारत, ट्रंप के नए कानून ने बढ़ाई मुश्किल

India faces a renewed dilemma between securing affordable Russian oil and protecting its vital trade relationship with the United States. A New York Times report by Alex Travelli highlights how new U.S. legislation gives President Donald Trump authority to impose tariffs of up to 100 percent on countries purchasing Russian energy. India, which imports over 90 percent of its crude oil needs, has increased Russian purchases amid disruptions in Middle Eastern supplies. Cutting Russian oil could raise energy costs, while continuing imports risks punitive U.S. tariffs. The situation poses a complex test for India’s energy security, trade interests and diplomatic balancing.

By- Jay Singh Rawat

 भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ उसके आर्थिक-सामरिक संबंध एक बार फिर कठिन परीक्षा के दौर में पहुंच गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित नए रूस प्रतिबंध कानून ने उन देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का रास्ता खोल दिया है, जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदते हैं। भारत के लिए समस्या यह है कि पश्चिम एशिया में युद्ध और तेल आपूर्ति में व्यवधान के कारण उसकी रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता फिर तेजी से बढ़ी है। ऐसे में रूस से तेल घटाने पर देश की ऊर्जा लागत बढ़ सकती है, जबकि खरीद जारी रखने पर अमेरिका भारतीय निर्यात पर भारी शुल्क लगा सकता है।

यह स्थिति 19 सितंबर को प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के आर्थिक मामलों के संवाददाता एलेक्स ट्रैवेली ने विस्तार से रेखांकित की है। नई दिल्ली से भेजी अपनी रिपोर्ट में ट्रैवेली ने भारत की चुनौती को सस्ता और पर्याप्त तेल हासिल करने तथा वाशिंगटन के साथ महत्वपूर्ण संबंध बनाए रखने के बीच संतुलन की समस्या के रूप में प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट के तथ्यों की अन्य स्रोतों से पड़ताल करने पर भी भारत पर बढ़ते दबाव की पुष्टि होती है।

अमेरिका का नया लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का व्यापक अधिकार देता है। कानून का घोषित उद्देश्य रूस की तेल-गैस आय को कम करना है, जिसे वाशिंगटन यूक्रेन युद्ध के वित्तपोषण से जोड़ता है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून भारत पर तत्काल और स्वतः 100 प्रतिशत शुल्क नहीं लगाता। शुल्क कब, किस देश पर और किस स्तर तक लगाया जाए, इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति के पास पर्याप्त विवेकाधिकार है। इसलिए भारत के सामने फिलहाल वास्तविक शुल्क से अधिक उसकी अनिश्चितता और अमेरिकी वार्ताकारों को मिलने वाली नई सौदेबाजी शक्ति बड़ी चिंता है।

मार्च में भारत के मथुरा में एक फ़्यूल पंप पर तेल का टैंकर।

भारत की मजबूरी—90 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेश से

भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट के कारण फारस की खाड़ी से आपूर्ति प्रभावित होने के बाद रूसी तेल का महत्व फिर बढ़ गया। समुद्री व्यापार आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली संस्था केप्लर के अनुसार इस गर्मी में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी करीब आधी हो गई। जुलाई में दूसरे आकलनों ने भी इसे लगभग 50 प्रतिशत के आसपास बताया है।

यही तथ्य भारत के सामने मौजूद दुविधा को गंभीर बनाता है। यदि नई दिल्ली अमेरिकी दबाव में रूसी तेल की खरीद तेजी से घटाती है तो उसे इतनी बड़ी मात्रा के लिए तत्काल वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता खोजने होंगे। पश्चिम एशिया में अस्थिरता के कारण यह विकल्प पहले की तुलना में कठिन और महंगा हो सकता है। दूसरी ओर रूस से मौजूदा स्तर पर खरीद जारी रखने पर अमेरिका के नए कानून के तहत भारतीय निर्यात पर भारी शुल्क लगाए जाने का खतरा बना रहेगा।

दिलचस्प बात यह है कि कुछ ही महीने पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार फरवरी में ईरान युद्ध शुरू होने से कुछ दिन पहले वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच एक व्यापार समझ बनी थी, जिसके अंतर्गत अमेरिका को शुल्क घटाना था और भारत को रूसी तेल की खरीद कम करनी थी। इसके बाद परिस्थितियां तेजी से बदल गईं। पश्चिम एशिया के युद्ध ने फारस की खाड़ी से तेल प्राप्त करना कठिन बनाया और अमेरिकी वित्त विभाग ने भारत सहित कुछ देशों को इसकी भरपाई के लिए अधिक रूसी तेल खरीदने की गुंजाइश दी। अब अमेरिका उसी रूसी तेल की खरीद पर फिर दंडात्मक शुल्क का विकल्प लेकर सामने आया है।

भारत ने अमेरिका को दी रिश्तों पर असर पड़ने की चेतावनी

भारत ने अमेरिकी कदम पर असामान्य रूप से स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता बनाए रखेगा। नई दिल्ली ने यह भी आगाह किया है कि इस प्रकार के अमेरिकी उपायों का प्रभाव केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए यह समस्या बिल्कुल नई नहीं है। इससे पहले भी अमेरिका ने नई दिल्ली पर ईरान और वेनेजुएला से तेल खरीद कम करने या बंद करने का दबाव डाला था। बाद में स्वयं अमेरिकी नीतियां उन देशों के प्रति बदलती रहीं। इस अनुभव के कारण भारतीय नीति-निर्माताओं के सामने सवाल यह भी है कि किसी मौजूदा अमेरिकी मांग के आधार पर दीर्घकालीन ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था बदलना कितना व्यावहारिक होगा।

एक और विरोधाभास यह है कि अमेरिका स्वयं भारत के लिए तेजी से महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बन गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद भारत के रसोई गैस आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी दिसंबर के आठ प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है। यानी जिस समय वाशिंगटन नई दिल्ली पर दूसरे देश से ऊर्जा खरीदने को लेकर दबाव डाल रहा है, उसी समय दोनों देशों का अपना ऊर्जा व्यापार भी बढ़ रहा है।

मंगलुरु में मौजूद इन स्टोरेज टैंकों जैसे भारत के बड़े रिफ़ाइनिंग कॉम्प्लेक्स, घरेलू ऊर्जा ज़रूरतों और ग्लोबल मार्केट, दोनों की सप्लाई के लिए रोज़ाना लाखों बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करते हैं।

भारतीय निर्यात पर भी बड़ा दांव

मामला केवल पेट्रोल-डीजल या कच्चे तेल की कीमत का नहीं है। अमेरिका भारत के सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजारों में है। आधिकारिक भारतीय आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच अमेरिका को वस्तुओं का भारतीय निर्यात 42.79 अरब डॉलर रहा, जो एक वर्ष पहले इसी अवधि में 40.39 अरब डॉलर था। इसलिए यदि 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क वास्तव में लागू हुआ तो इसका असर उन भारतीय उद्योगों पर भी पड़ सकता है जिनका रूसी तेल की खरीद से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।

पूर्व भारतीय व्यापार अधिकारी और ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के प्रमुख अजय श्रीवास्तव ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि भारत को अमेरिकी शुल्क के खतरे पर जरूरत से ज्यादा केंद्रित नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि शुल्क अमेरिकी आयातकों से वसूला जाता है और उसकी लागत अंततः अमेरिकी बाजार और उपभोक्ताओं पर भी पड़ती है। हालांकि इससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

नई अमेरिकी व्यवस्था का दूसरा पहलू व्यापार वार्ता से जुड़ा है। ट्रंप प्रशासन को अब भारत से बातचीत में ऐसा नया कानूनी साधन मिल गया है, जिसके आधार पर वह रूसी तेल की खरीद कम करने या अन्य व्यापारिक रियायतों के बदले कम शुल्क की पेशकश कर सकता है। इस दृष्टि से 100 प्रतिशत शुल्क की संभावना केवल दंड का प्रावधान नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में दबाव के साधन के रूप में भी इस्तेमाल हो सकती है। यह विश्लेषण न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में श्रीवास्तव की टिप्पणियों से उभरता है।

चीन पर भी लागू होगा कानून, भारत की नजर अमेरिकी रवैये पर

इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू चीन है। चीन रूस से भारत से भी अधिक तेल खरीदता है और नए अमेरिकी कानून के दायरे में वह भी आ सकता है। इसलिए नई दिल्ली के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वाशिंगटन चीन और भारत के साथ समान व्यवहार करता है या दोनों के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाता है।

इसका सामरिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि पिछले कई वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच निकटता का एक प्रमुख आधार एशिया में चीन की बढ़ती शक्ति रही है। दूसरी तरफ सितंबर में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ दिखाई दिए। ऐसे समय में रूसी तेल को लेकर अमेरिकी दबाव भारत के सामने ऊर्जा और व्यापार के साथ-साथ विदेश नीति के संतुलन का प्रश्न भी खड़ा कर रहा है।

जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सी. राजा मोहन ने न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में इसी रणनीतिक कठिनाई की ओर संकेत किया है। भारत के लिए एक ओर अमेरिका के साथ संबंधों की अहमियत है, खासकर चीन की बढ़ती शक्ति के संदर्भ में; दूसरी ओर अमेरिकी ऊर्जा और व्यापार नीतियों में बार-बार होने वाले बदलाव दीर्घकालीन समझौतों की स्थिरता को लेकर सवाल पैदा करते हैं।

फिलहाल इसलिए भारत के सामने कोई सरल विकल्प नहीं है। रूसी तेल में तेज कटौती ऊर्जा सुरक्षा और लागत पर दबाव डाल सकती है, जबकि खरीद जारी रखने पर अमेरिकी बाजार में भारतीय वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होने का खतरा है। नए कानून में राष्ट्रपति ट्रंप को मिले विवेकाधिकार के कारण यह भी अभी निश्चित नहीं है कि भारत पर शुल्क लगाया ही जाएगा या कितना लगाया जाएगा। आने वाले दिनों में असली परीक्षा इस बात की होगी कि वाशिंगटन इस अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, निर्यात हितों तथा अमेरिका और रूस दोनों के साथ संबंधों के बीच किस तरह संतुलन कायम करता है।

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संदर्भ: यह स्वतंत्र समाचार मुख्यतः द न्यूयॉर्क टाइम्स में 19 सितंबर 2026 को प्रकाशित नई दिल्ली स्थित संवाददाता एलेक्स ट्रैवेली की रिपोर्ट पर आधारित है । 

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