22 सालों में उत्तराखंड के पहाड़ी काश्तकारों को जंगली जानवरों से निजात नहीं दिला पाई कोई सरकार

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दिग्पाल गुसांईं-
गौचर। लंबे समय से पहाड़ का कास्तकार जंगली जानवरों व बंदरों के आतंक से कराह रहा है लेकिन ताजुब तो इस बात का है कि अलग राज्य बने 22 साल बीतने को हैं राज्य में सरकार किसी की भी रही हो किसी ने भी आज तक कास्तकारों की आजीविका पर डाका डाल रहे इन जंगली जानवरों से निजात दिलाने की ठोस पहल नहीं की है।

नतीजतन पहाड़ी क्षेत्रों से न चाहते हुए भी अक्षम लोग भी पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।जो लोग यहां रहकर किसी तरह हाड़ तोड़ मेहनत कर पहाड़ों के जनजीवन को जिंदा रखे हुए हैं। जंगली जानवरों ने उनके जीवन को इतना कठिन बना दिया है कि उनको भी स्वयं पर ग्लानि होने लगी है।नौबत यहां तक आ गई कि सुबह से शाम तक भूखे प्यासे रहकर खेती को आवाद करने जुटे कास्तकार उस समय प्रफुल्लित हो उठता है जब उसके खेत में खड़ी फसल योवन में आकर लहलहाने लगती है। लेकिन उनकी यह खुशी ज्यादा दिन तक नहीं ठहर पाती है।जब फल मिलने से पहले ही जंगली जानवर व बंदर उनकी फसल को पूरी तरह तहस नहस कर देते हैं। अंततः उनको जीवन यापन के लिए पूरी तरह मैदानी भागों से आने वाली साग सब्जी व कृत्रिम दूध पर निर्भर रहना पड़ता है।इसे विडंबना ही समझिए विश्व गुरु बनने जा रहे भारत के मंत्री संतरी जैविक खेती का मजमून सीखने विदेशों में खाक छान कर जनता की गाड़ी कमाई को बरबाद करने पर तुले हैं।जो लोग अपने संसाधनों से जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। केंद्र सरकार के उस तथाकथित 15 लाख रुपए हर खाते धारक को दिऐ जाने की घोषणा के बाद बैंकों में जनधन के खाते खुलवाने की होड़ सी लग गई थी। लेकिन जब लोगों को लगा कि यह तो एक जुमला था कई उन गरीब तबके के लोगों ने इन खातों का संचालन न करने सकने की दशा में बंद भी कर दिए हैं, इसके पश्चात जब प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की घोषणा के तहत 2000 रुपए हर तीन में देने का फरमान आया तो लोगों को लगा कि कुछ नहीं तो कुछ ही सही।कास्तकारों ने अपनी खाता खतोनियों के साथ तमाम प्रकार के कागजात तहसील में जमा किए लेकिन तब उन्हें नहीं पता था कि जल्दी ही इस सम्मान निधि की वसूली के लिए उन्हें नोटिस जारी किए जाएंगे।अब उन प्रगतिशील कास्तकारों को निशाना बनाया जा रहा है जो ग्राम पंचायतों, नगर निकायों में छोटे छोटे ठेके लेकर अपनी आजीविका चलाते हैं उनको इनकम टैक्स के दायरे खड़ा किया जा रहा है।ये ओ ठेकेदार हैं जिनसे सरकारी नियमानुसार इनकम टैक्स वसूला जाता है। लेकिन ताजुब तो इस बात का है कि नोटिस जारी करने से पहले इस बात की भी जांच करने की जरूरत नहीं समझी गई कि क्या यह सम्मान निधि पाने वाला कास्तकार वास्तव में इनकम टैक्स के दायरे में आता है या नहीं। खैर सरकार के सालाना 6 हजार की धनराशि से पहाड़ों का जनजीवन यापन तो नहीं हो सकता है लेकिन अगर सरकार पहाड़ी क्षेत्रों को जंगली जानवरों व बंदरों से निजात दिला दे तो पहाड़ का कास्तकार किसी के रहमों करम के बिना ही अपना जीवन यापन कर सकता है।इन दिनों पहाड़ों में बंदरों को पकड़ने की खबरें आ रही हैं यह पहला मौका नहीं है कि बंदर पकड़ने का काम शुरू हो गया है। लेकिन इस बात की तह तक जाने की जरूरत है कि पकड़े गए बंदरों को कहां छोड़ा जाता है।हर बार कहा जाता है बंदरों को जंगलों में छोड़ा गया। लेकिन ताजुब इस बात का है कि पहाड़ में ऐसा कौन सा जंगल है जहां थोड़ा बहुत आबादी नहीं बची है।बंदर पकड़ो अभियान के बाद फिर पहले जैसी स्थिति हो जाती है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बंदर पकड़ो अभियान की टोपी एक दूसरे के सिर पहनाकर सरकारी धन का दुरपयोग किया जा रहा है।बंदर पकड़ने वाली संस्था से जब पूछा जाता है कि कौन से जंगल में बंदरों को छोड़ा गया है तो उनका टका सा जवाब होता है कि उनके पास इतना बजट नहीं है कि वे बंदरों को दूर छोड़ सकें।इस तरह से तो पहाड़ के लोगों को जंगली जानवरों व बंदरों से निजात मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

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