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वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर खेती को बनाएं अधिक लाभकारी: आईसीएआर वैज्ञानिक

मुरादाबाद, 15 जुलाई। इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट (आईसीएआर), नई दिल्ली के एग्रोनॉमी विभागाध्यक्ष डॉ. संजय सिंह राठौर ने कहा कि बदलते समय में खेती के वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। स्वस्थ खेती ही स्वस्थ समाज का आधार है और इसके लिए मृदा के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना होगा। उन्होंने किसानों से जैविक खादों के उपयोग को बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए कहा कि खेती में वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर अधिकांश समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
वे तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (टीएमयू) के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज तथा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली के सस्य विज्ञान संभाग द्वारा आयोजित “किण्वित जैविक खाद (एफओएम) से समृद्ध मृदा, आय वृद्धि एवं पर्यावरण संतुलन” विषयक किसान गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के बीच आधुनिक खेती, मृदा संरक्षण और जैविक कृषि पर विस्तृत चर्चा हुई।
डॉ. राठौर ने कहा कि किसानों के पास पारंपरिक ज्ञान और नवाचारों का बड़ा भंडार है। वैज्ञानिक इन नवाचारों को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। उन्होंने बताया कि कृषि मेलों में नवाचार करने वाले किसानों को सम्मानित भी किया जाता है। उन्होंने मुरादाबाद में दो कृषि विज्ञान केंद्रों की उपलब्धता को जिले के लिए बड़ी उपलब्धि बताते हुए किसानों से आगामी पूसा कृषि मेले में भाग लेने का आह्वान किया।
आईसीएआर के वैज्ञानिक डॉ. ऋषिराज सिंह ने बताया कि किण्वित जैविक खाद (एफओएम) में सामान्य जैविक खाद की तुलना में लगभग ढाई गुना अधिक पोषक तत्व होते हैं। यह मिट्टी के पीएच स्तर को संतुलित रखने के साथ उसकी उर्वरता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाने में सहायक है। इसके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता 20 से 30 प्रतिशत तक कम की जा सकती है, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में भी सुधार होता है।
आईसीएआर के वैज्ञानिक डॉ. प्रवीन कुमार उपाध्याय ने कहा कि कृषि की नई तकनीकों और नवाचारों को किसानों तक पहुंचाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। स्वस्थ मृदा से ही स्वस्थ फसल, स्वस्थ पशु और स्वस्थ मानव जीवन संभव है। उन्होंने जैविक खेती को मृदा स्वास्थ्य सुधारने का प्रभावी माध्यम बताया।
मुख्य अतिथि एवं मुरादाबाद के उप कृषि निदेशक डॉ. ऋषि कांत सिंह ने जलवायु परिवर्तन को कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए किसानों से वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कृषि विभाग की विभिन्न योजनाओं और सुविधाओं की भी जानकारी दी।
कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादाबाद के डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि कृषि और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं तथा दोनों को साथ अपनाने से किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है। वहीं डॉ. विश्वेन्द्र सिंह ने ‘किसान सारथी’ ऐप की जानकारी देते हुए किसानों को उन्नत बीजों के उपयोग और गन्ना एवं धान की फसलों में रोग नियंत्रण के जैविक उपायों से अवगत कराया।
टीएमयू के कृषि महाविद्यालय के डीन प्रो. पी.के. जैन ने कहा कि किसान देश की रीढ़ हैं और उनके हाथों में देश की वास्तविक शक्ति निहित है। कार्यक्रम में जॉर्डस के एमडी डॉ. दीपक मेंदीदत्ता, मुख्य समन्वयक डॉ. अनिल कुमार चौधरी सहित टीएमयू के अनेक वैज्ञानिक एवं शिक्षक उपस्थित रहे। गोष्ठी में 150 से अधिक किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. इशिता मिश्रा ने किया तथा समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

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