घसियारी योजना भी गयी घास छिलने, न पशु आहार पहुंचा और न महिलाओं का बोझ कम हुआ

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-जयसिंह रावत

पहाड़ की महिलाओं के सिर से घास का बोझ कम करने और ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने के साथ ही प्रदेश में दुग्ध उत्पादन में कई गुना वृद्धि करने के उद्ेश्य से केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लांच की गयी मुख्यमंत्री घसियारी योजना धरती पर उतरने के साथ ही हवा हवाई हो गयी है। राज्य के 2022 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं को लुभाने के लिये शुरू की गयी यह योजना अभी प्रदेश के 13 में से केवल 4 जिलों में ही पहुंच पायी और जहां शुरू हुयी है वहां भी महिलाओं के सिर से घास का बोझ नहीं उतर पाया। क्योंकि इसके अलावा भी महिलाओं को सूखी घास के लिये जंगल जाना ही पड़ रहा है। यही नहीं सरकार द्वारा भेजे गये साइलेज की असंतुलित मात्रा से पशु बीमार भी हो रहे हैं। योजना के लालच में जिन लोगों ने दुधारू पशु खरीदे थे उनमें से कई लोगों को अपने पशु औने पौने दामों पर बेचने पड़ रहे हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब मुख्यमंत्री घसियारी योजना को 30 अक्टूबर 2021 को देहरादून के बन्नू स्कूल ग्राउण्ड में एक भव्य समारोह में लांच किया था तो कहा था कि योजना के तहत पशुपालकों को पशुआहार (साइलेज) के 25 से 30 किलो के वैक्यूम पैक्ड बैग उपलब्ध कराए जाएंगे। इससे दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार के साथ ही दुग्ध उत्पादन में 15 से 20 फीसद तक वृद्धि होगी। इस योजना के लागू होने से पशुओं के लिए चारा जुटाने के लिए प्रदेश की महिलाओं के सिर से बोझ समाप्त होगा और उनके समय और श्रम की बचत होगी। लेकिन अमित शाह और उत्तराखण्ड सरकार के दावे अब तक धरातल पर नहीं उतर पाये। उत्तरकाशी के पटारा गांव की हिम-पटारा स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष सरतमा देवी कहती हैं कि यह सरकारी चारा पर्याप्त नहीं होता। महिलाओं को फिर भी घास और लकड़ी के लिए जंगल जाना ही पड़ेगा। गांव में ज्यादातर लोगों के पास भैंसें हैं। एक भैंस रोजाना लगभग 50-60 किलो तक चारा खाती है। दुधारू पशुओं को भी हम ज्यादातर हरी पत्तियों वाली घास ही खिलाते हैं। बीच-बीच में थोड़ा बहुत बाहर से खरीदा चारा दे देते हैं”।

साइलेज फेडरेशन ऑफ उत्तराखण्ड के प्रबंध निदेश आनन्द शुक्ला के अनुसार बर्तमान में इस तरह का पैक्ड पशु स्वास्थ्य वर्धक चारा 25 किलो के पैक में पशु पालक को 8 रुपये किलो, 80 से 10 किलो के पैक में 6.50 रुपये किलो और 400 किलो के पैक में 5.50 रुपये किलो की दर से उपलब्ध किया जा रहा है। जबकि पलायन रोकने की दिशा में काम कर रही संस्था पलायन एक चिंतन के संयोजक रतन सिंह असवाल कहते हैं  “एक औसत पशु को दिन भर में लगभग 30-40 किलो चारे की जरूरत होती है। तो एक पशु पर ही कम से कम 150 रुपये रोजाना का खर्च आयेगा। यदि किसी के पास दो-तीन या उससे अधिक पशु हैं तो उस लिहाज से चारे की लागत भी उतनी ही बढ़ जाएगी।’’ जाने माने समाजसेवी सुरेश भाई कहते हैं कि रोजाना 200-300 रुपये का चारा खरीदना ग्रामीणों के लिए संभव नहीं है।

 

गौचर चमोली के समाजसेवी दिग्पाल सिंह गुसाईं कहते हैं कि सरकार ने चुनावों को ध्यान में रखते हुये सारे प्रदेश में घसियारी योजना शुरू करने की घोषणा तो कर दी मगर यह योजना पौड़ी, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा और चम्पावत से आगे नहीं खिसक पाई है। पिछले तीन माह से सरकार द्वारा पशुपालकों को भूसा उपलब्ध न कराए जाने से उनके सामने पशुओं की जान बचाने का घोर संकट पैदा हो गया है। नौबत यहां तक पहुंच गई है कि कास्तकार औने पौने दामों में अपने पशु बेचने को मजबूर हो गए हैं। घसियारी योजना चमोली जिले तक नहीं पहुंच पायी इसलिये भूसा न मिलने पर चमोली जिले के कुछ पशुपालकों को रुद्रप्रयाग से इनका चारा खरीदना पड़ रहा है। गुसाईं कहते हैं कि घसियारी योजना के चारे को भी भूसे के साथ मिलाकर खिलाया जाता है। जानकारों के अनुसार इस हरे चारे को ज्यादा खिलाने से पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ने की संभावना बनी रहती है। प्रगतिशील कास्तकार रमेश डिमरी,नीमा मैठाणी, उमेश रतूड़ी, विजया गुसाईं, कंचन कनवासी आदि का कहना है कि घसियारी योजना का चारा मिलता नहीं और सहकारी विभाग से भूसे की सप्लाई बंद होने से पशुओं को पालने का घोर संकट पैदा हो गया है। हैरान परेशान महिलाओं ने एक बार पुनः जंगलों का रुख करना शुरू कर दिया है। पशुपालकों ने चेतावनी देते हुए कहा कि वे 14 फरवरी को पहले अपने जानवरों को स्थानीय पशु चिकित्सालयों में बांधेंगे उसके बाद मतदान के लिए जाएंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने नवम्बर 2020 में सतपुली के निकट बिलखेत में आयोजित कार्यक्रम में  महिलाओं को राहत देने के लिये पशुओं के चारे की समस्या से जुड़ी घस्यारी योजना बनाने की घोषणा की थी। इस योजना की शुरुआत केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 30 अक्टूबर 2021 की मगर यह अभी तक 13 में से चार जिलों से आगे नहीं पहुंच पायी। साइलेज फेडरेशन ऑफ उत्तराखण्ड के प्रबंध निदेशक आनन्द शुक्ला के अनुसार योजना को वर्ष 2024 तक तभी पूरे प्रदेश में लागू किया जा सकेगा जबकि 1 लाख टन हरा चारा और टोटल मिक्सड राशन (टीएमआर) का उत्पादन हो सकेगा। वर्तमान में प्रदेश में मार्च तक केवल 10 हजार टन सालेज उत्पादन और सप्लाई का लक्ष्य है। इसके लिये चार जिलों में बने 52 सेंटरों से पशुपालकों को पैकेज्ड साइलेज एवं टीएमआर प्रदान किया जा रहा है। इस प्रकार देखा जाय जो जिस विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुये यह योजना शुरू की गयी थी वह आ भी गया, मगर घसियारी योजना की घास घसियारी महिलाओं तक नहीं पहुंच पायी। जबकि योजना के लिये तय 10.25 करोड़ का बजट अब पूरा होने वाला है। इस विशेष चारे के लिये राज्य सरकार देहरादून जिले के सहसपुर, विकासनगर और हरबर्टपुर में तथा हरिद्वार जिले के चौली और बुग्गावाला में किसानों से मक्के की खेती करवा रही है। इन्हीं मक्की की हरी घास ये सहसपुर और छरबा में लगे प्लाटों में चारा तैयार किया जा रहा है। लेकिन कुल मिला कर देखा जाय तो इस बहुचर्चित योजना से न तो महिलाओं के सिर का बोझ कम हुआ, न लोगों को रोजगार मिल सका और ना ही पशुपालन और दुग्ध उत्पादन में अब तक वृद्धि हो सकी। इसके बाद सहकारिता विभाग का चारा भी अब बंद हो गया।  जबकि दावा किया गया था कि इस योजना के क्रियान्वयन से महिलाओं को चारे के कार्य से मुक्ति मिलने के साथ प्रदेश के पशुपालन संबंधी आधारित अर्थशास्त्र में सुधार होगा, क्योंकि राज्य की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी की आजीविका का प्रमुख स्रोत कृषि एवं पशुपालन है

 

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