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लोक सेवकों की परीक्षा की घड़ी….!

-गोविन्द प्रसाद बहुगुणा-

लोक सेवकों में “आयुक्त” एक ऐसा पदनाम है, जो अक्सर सार्वजनिक चर्चा और आलोचना का केंद्र बन जाता है। विशेषकर चुनावों के समय उनकी कार्यशैली, निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा की तुलना उनके पूर्ववर्ती पदाधिकारियों से की जाती है, और उनकी भूमिका पर व्यापक विमर्श होता है।

इस विषय पर प्राचीन ग्रंथों में भी रोचक टिप्पणियाँ मिलती हैं। योगवशिष्ठ में एक उल्लेख मिलता है कि आमजन को पाँच प्रकार के लोगों से सदा भय बना रहता है—आयुक्त, चोर, बाहरी शत्रु, राजा के प्रिय राजकीय कर्मचारी और स्वयं लोभी राजा—

“आयुक्तेभ्यश्चौरेभ्यः परेभ्यो राजवल्लभात्।
पृथिवीपतिलोभाच्च नराणां पञ्चधा भयम्॥”

यद्यपि उस समय चुनाव जैसी व्यवस्था नहीं थी, फिर भी जब-जब लोक सेवकों को विशेष दायित्व सौंपे जाते थे, उनका जनता से सीधा संपर्क बढ़ता था। ऐसे अवसरों पर जनता उनकी कार्यशैली का प्रत्यक्ष मूल्यांकन करती थी। लोग यह परखते थे कि संबंधित लोक सेवक ने अपने दायित्वों का निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से निर्वहन किया या नहीं। यदि अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते, तो उनकी आलोचना भी होती थी—जैसा कि उपर्युक्त श्लोक में संकेत मिलता है।

हालाँकि, दूसरी ओर ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ लोक सेवकों की कठिनाइयों को समझते हुए उनके पक्ष में भी विचार व्यक्त किए गए हैं। महाकवि भर्तृहरि ने नीतिशतकम् में लिखा है कि सेवा-धर्म का निर्वहन करना बड़े-बड़े योगियों के लिए भी अत्यंत कठिन है, साधारण लोक सेवक की तो बात ही अलग है। वे बताते हैं कि लोक सेवक चाहे जैसा भी आचरण करे, उसे आलोचना का सामना करना पड़ता है—

“मौनान्मूकः प्रवचनपटुश्चाटुलो जल्पको वा,
धृष्टः पार्श्वे वसति च तदा दूरतश्चाप्रगल्भः।
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः,
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः॥”

अर्थात् यदि वह मौन रहता है तो उसे गूंगा कहा जाता है, अधिक बोलता है तो वाचाल या चापलूस समझा जाता है; निकट रहता है तो धृष्ट और दूरी बनाए रखे तो अहंकारी माना जाता है। सहनशील हो तो डरपोक और विरोध करे तो अभद्र करार दिया जाता है। यही कारण है कि सेवा-धर्म अत्यंत गूढ़ और चुनौतीपूर्ण माना गया है।

इस प्रकार, लोक सेवकों—विशेषकर आयुक्तों—के लिए हर विशेष परिस्थिति वास्तव में एक परीक्षा की घड़ी होती है, जहाँ उन्हें न केवल अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होता है, बल्कि जन अपेक्षाओं और आलोचनाओं के बीच संतुलन भी बनाए रखना होता है।

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