जंगलों में आग बुझी; बारिश ने बचा दी वन विभाग की लाज
ग्रीष्मकाल में वनाग्नि से एक बार फिर सैकड़ों हेक्टेयर जंगल हुआ स्वाहा

–दिनेश शास्त्री-
उत्तराखं के पहाड़ी जिले पिछले एक पखवाड़े से रुक रुक कर हो रही बारिश से धड़कने थम गए हैं, उससे पहले की बात याद करें तो सिहरन सी होती है जब समूचे पहाड़ गैस चैंबर में तब्दील हो गए थे। उच्च हिमालयी क्षेत्रों को छोड़ दें तो सब जगह वनाग्नि का धुंआ ही धुंआ पसरा हुआ था। इस घाटी से उस घाटी जहां लोग एक – एक घर गिन लेते थे, उन दिनों धुएं के गुबार से ओझल से हो गए थे।
यूं तो पहाड़ में हर साल ग्रीष्मकाल में यह स्थिति उत्पन्न होती रही है किंतु इस बार हालत ज्यादा विकराल थे। सीमांत के कुछ क्षेत्रों में हुई छिटपुट वर्षा से बेशक वहां वनाग्नि का असर रोके रखा था लेकिन 28 मई से पहले तमाम निचले इलाकों में हालात भयावह बने रहे।वातावरण दमघोंटू सा हो गया था। वैसे भी हर साल उत्तराखंड के हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग में स्वाहा होते रहे हैं किंतु इस बार ज्यादा जटिल हालात थे। हालांकि वन विभाग हर साल पंद्रह फरवरी से पंद्रह जून तक फायर सीजन मान कर चलता है और जंगलों की आग बुझाने के लिए फायर वॉचर की नियुक्ति करता है। चार माह की नितांत अस्थाई नौकरी में यहां के बेरोजगार युवा जंगल बचाने के लिए जान की बाजी तक लगा देते हैं। अभी पिछले महीने चमोली जिले के बिरही रेंज में धधक रहे जंगल की आग बुझाने के दौरान राजेंद्र सिंह नामक फायर वॉचर जान से हाथ धो बैठा था। चमोली जिले में ही आदिबद्री के निकट सुरेशी देवी नामक महिला जंगल की आग की चपेट में आकर जल मरी। यही नहीं देवप्रयाग स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर तक आग की लपटें पहुंच गई थी। टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल, अल्मोड़ा, पौड़ी, बागेश्वर हो या पौड़ी, हर जगह बेशकीमती वन संपदा स्वाहा हुई। यानी कोई इलाका ऐसा नहीं रहा जहां लोगों को वनाग्नि का सामना न करना पड़ रहा हो। 28 मई के पहले तक आसमान से बरसती आग ने वनाग्नि के असर को कई गुना बढ़ा दिया था। इससे वन संपदा तो राख हुई ही, कई दुर्लभ वनस्पतियां भी खत्म हुई। इसके अलावा वन्यजीवों का जीवन भी संकट में रहा। आखिरकार इसका असर यहां के पर्यावरण पर स्वाभाविक रूप से पड़ा। इसी वनाग्नि का नतीजा है कि साल दर साल पारंपरिक जल स्रोत लगातार सूख रहे हैं और हिमालयी पर्यावरण संतुलन बेतहाशा बिगड़ रहा है।
दूसरी ओर सरकार यानी वन विभाग की भूमिका जंगलों में आग लगने की घटनाओं के बाद महज खानापूर्ति तक सीमित रही हैं। इस सच से कोई मुंह नहीं मोड़ सकता। हकीकत यह है कि धरातल पर जंगलों की आग बुझाने का सारा दारोमदार या तो निरीह फायर वॉचर पर है या स्थानीय लोगों पर। क्या इस तथ्य को कोई झुठला सकता है कि आज तक वन विभाग का एक भी अफसर जंगल की आग बुझाते झुलसा नहीं है, इसका अगर कहीं कोई एक अदद उदाहरण ढूंढे मिल जाए तो हमारे भी सामान्य ज्ञान में वृद्धि होगी। निसंदेह हमारी कोई मंसा नहीं है कि आग बुझाने में वन कर्मी शहीद हो जाएं, लेकिन गंभीर और ईमानदार कोशिश करते दिखने की अपेक्षा तो स्वाभाविक है।
वन विभाग के पास एक मोटे अनुमान के अनुसार करीब बारह हजार मानव संसाधन की नफरी है। ऊपर के एक डेढ़ दर्जन से थोड़ा अधिक पद छोड़ दें तो 84 डीएफओ, 840 एसीएफ, 1640 रेंजर, 3200 फॉरेस्टर और 5800 फॉरेस्ट गार्ड की स्वीकृत नफरी है। इतनी बड़ी फौज के बावजूद क्यों लाचारी की स्थिति है, यह सवाल पता नहीं क्यों सत्ता में बैठे लोगों को परेशान नहीं करता। यह हैरानी की बात है।
यद्यपि बहुत संभव है स्वीकृत नफरी में से वर्तमान में दस से बीस फीसद तक पद खाली हों। निसंदेह कुछ लोग रिटायर हो गए होंगे, कुछ बीमार हो सकते हैं और कुछ पद रिक्त हों, किन्तु हर साल जंगलों में आग लगने के सीजन में फायर वॉचर की नियुक्ति का रूटीन कभी नहीं टूटता। हर साल पंद्रह फरवरी से पंद्रह जून तक के चार माह के सीजन के लिए फायर वॉचर की तैनाती की जाती है और ग्राउंड जीरो पर यही लोग आग बुझाते नजर आते हैं। स्थाई कर्मचारी और अधिकारी तो निर्देश देते हैं। निसंदेह यह स्थिति भयावह है। फायर वॉचर का दस लाख का बीमा करवा कर विभाग एक बड़ा अनुग्रह मानता है। फायर वॉचर मर – खप जाए तो उसकी किस्मत। जनता का दबाव हो जाए तो किसी आश्रित को अस्थाई नियुक्ति मिल सकती है किंतु वो सब उनके नसीब में नहीं जो सुख – लाभ स्थाई कार्मिक के आश्रितों को मिलता है।
अब जरा इस साल प्रदेशभर में वनाग्नि की घटनाओं पर नजर डालें। इस साल के फायर सीजन में वनाग्नि की अब तक करीब चार सौ घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं। इस बार कुमाऊं के जंगल कम धधके हैं। इस बार विगत 28 मई तक वनाग्नि की घटनाओं में करीब साढ़े चार सौ हैक्टेयर जंगल राख हुए हैं, यह सरकारी आंकड़ा है। वास्तविक नुकसान कहीं ज्यादा होगा, यह तय मानिए। सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक कुमाऊँ में करीब 75 और गढ़वाल में 285 से अधिक वनाग्नि की घटनाएं हुई। इस बीच कुछेक स्थानों पर अचानक हुई बारिश ने आग बुझा दी लेकिन ज्यादातर जंगल मई अंत तक धधकते ही रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि चीड़ के जंगलों में आग लगना एक आम बात थी, लेकिन इस बार तो बांज के जंगलों में भी आग देखी गई है। चमोली जिले के नंदानगर ब्लॉक के धुर्मा में बांज के सघन वन में लगी आग ने चौंकाया है। माना जाता है कि बांज और मिश्रित प्रजाति वाले वनों में नमी के कारण आग लगने की घटनाएं नहीं होती या बहुत कम होती हैं, लेकिन इस बार बांज के जंगलों से उठती लपटों ने खतरे का अलार्म बजा दिया है कि भविष्य में इस तरह के जंगल शायद ही सुरक्षित रह पाएंगे।
मानव वन्य जीव संघर्ष इसी तस्वीर का दूसरा पहलू है। साल दर साल वनों में लग रही आग के कारण वन्य जीवों के हमलों में दो दर्जन से अधिक लोग जनवरी से अब तक जान गंवा चुके हैं। घायलों की तो बात ही छोड़ दीजिए। मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर समस्या है, जिसमें मुख्य रूप से बाघ और गुलदार (तेंदुआ) के हमले शामिल हैं। अकेले वर्ष 2026 की पहली तिमाही में वन्य जीवों के हमलों की 117 से अधिक घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं, इनमें दो दर्जन मौतों के अलावा 97 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। रामनगर और नैनीताल डिवीजन में बाघों का सर्वाधिक आतंक देखा गया है। तीसरे नंबर पर पौड़ी जिले में गुलदार के हमलों में जान-माल का नुकसान हुआ है। वहां तो स्कूलों को कई कई दिन बंद रखना पड़ा है।
वन विभाग मानता है कि इंसानों के रिहायशी इलाकों में जानवरों का आना, जंगलों के पास मानवीय गतिविधियां और भोजन की तलाश में जंगली जानवरों का आबादी की ओर रुख करना मुख्य कारण है लेकिन सवाल अपनी जगह पर यथावत है कि यदि वन्य जीवों के प्राकृतिक पर्यावास ही सुरक्षित नहीं हैं तो भूख के मारे उन्हें मानव आबादी में आने से कैसे रोक सकते हैं।
एक बात अक्सर चिंतित करती है कि मानव वन्य जीव संघर्ष की घटना हो या वनाग्नि की। उसकी रोकथाम अथवा पीड़ितों के आंसू पोंछने में विभाग के आला अफसर अथवा मंत्री शरमाते क्यों हैं। एक खबर नजरों से नहीं गुजरी कि मुख्य वन संरक्षक अथवा प्रदेश के वन मंत्री कहीं किसी पीड़ित का हाल चाल जानने गए हों। आपकी नजर से ऐसी कोई तस्वीर गुजरे तो हमें भी खबर कर दें। अलबत्ता अभी हाल में बिरही में फायर वॉचर की मौत के मौके पर जनाक्रोश को शांत करते डीएफओ एस. के. दुबे और उनके आला अफसर आकाश वर्मा जरूर दिखे थे। अपेक्षा तो देहरादून में बैठे भाग्य विधाताओं से थी कि किसी आला हाकिम का जंगल की आग बुझाते समय निरीक्षण का ही फोटो दिख जाए या वन्य जीवों के हमले में मारे गए लोगों के परिजनों के आंसू पोंछते दिख जाएं, लेकिन संवेदनहीन व्यवस्था में इस तरह की उम्मीद मृग मरीचिका ही कहलाई जाएगी। हाकिमों से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद कैसे की जा सकती है। रुद्रप्रयाग जिले के तुलंगा गांव में पिछले पांच माह में चालीस से अधिक मवेशियों को जंगली जानवर अपना निवाला बना चुके हैं। अब तक कोई जनप्रतिनिधि वहां नहीं गया। वन विभाग के पतरोल से क्या उम्मीद की जा सकती है। उसकी अपनी सीमाएं हैं। वह ज्यादा से ज्यादा रिपोर्ट भेज सकता है। पिछले दिनों भालू के हमले में कई लोग जख्मी हुए। मौसम बदला तो फिलहाल भालू ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चले गए हैं, लेकिन बंदर, सूअर और लंगूर से खेती को हो रहे बेतहाशा नुकसान से पहाड़ के किसान तो जूझ ही रहे हैं। वन विभाग के भरोसे तो कुछ होने से रहा।
वनाग्नि और इससे जुड़े मसलों पर बात कभी खत्म नहीं हो सकती। यह हरि अनंत हरि कथा अनन्ता के समान है। विडंबना यह है कि यह मुद्दा कभी विमर्श के केंद्र में नहीं आता जबकि यह प्रदेश ही नहीं पूरे देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि हिमालय सुरक्षित रहेगा तो ये देश भी सुरक्षित रहेगा और जिस दिन मौजूदा उपेक्षा की अति हुई तो देश का अस्तित्व खतरे में पड़ते देर नहीं लगेगी।
