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न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट: भारत के ‘Gen Z’ का गुस्सा और सरकार की बड़ी चुनौती

As India’s huge youth population surges, the government faces pressure to fix an education system that leaves many ill prepared for university, let alone for the workplace.

नई दिल्ली / चेन्नई, 28 जुलाई ‘. भारत की विशाल युवा आबादी (Gen Z) के हालिया प्रचंड जन-आक्रोश और सड़कों पर उतरे विरोध प्रदर्शनों ने केंद्र सरकार को हिलाकर रख दिया है। प्रसिद्ध अमेरिकी समाचार पत्र ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ (The New York Times) में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली से लेकर चेन्नई तक भड़के इस छात्र आंदोलन के बाद देश के शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है।

अखबार की संवाददाता प्रगति के.बी. और सोमिनी सेनगुप्ता द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय युवाओं के इस अभूतपूर्व गुस्से का मुख्य कारण देश की लाचार शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा-धांधली और पढ़ाई के बाद भी रोजगार का न मिलना है।

‘अच्छे दिन’ के जवाब में लगे ‘बच्चे दिन’ के नारे

देशभर के प्रमुख शहरों में प्रदर्शन कर रहे लाखों छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित नारे “अच्छे दिन” के जवाब में हाथों में “बच्चे दिन” (Kids’ Days) लिखी तख्तियां थामकर अपना विरोध दर्ज कराया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 12 साल के कार्यकाल में मोदी सरकार के समक्ष यह अब तक की सबसे गंभीर सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों में से एक बनकर उभरा है। हालांकि सरकार ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) प्रणाली की जांच के लिए एक स्वतंत्र टास्क फोर्स के गठन का आश्वासन दिया है, लेकिन व्यापक शिक्षा तंत्र में बुनियादी बदलावों पर फिलहाल कोई ठोस नीति सामने नहीं आई है।

“स्कूलों में हम कुछ नहीं सीख रहे”

दिल्ली में जारी प्रदर्शन में शामिल 19 वर्षीय कॉलेज छात्र अबीर अग्रवाल के हवाले से रिपोर्ट में लिखा गया: “हम अपने स्कूलों में कुछ भी नहीं सीख रहे हैं। पढ़ाई का स्तर बेहद घटिया है।”

अखबार ने भारत सरकार के अपने आंकड़ों और स्वतंत्र सर्वेक्षणों के हवाले से देश की शिक्षा व्यवस्था की दयनीय तस्वीर पेश की है:

  • कमजोर बुनियादी शिक्षा: सरकारी भाषा-आकलन के अनुसार, 9वीं कक्षा के लगभग आधे छात्र किसी सामान्य खबर का सारांश (Summary) तक नहीं लिख पाते।

  • ग्रामीण भारत की हालत (ASER 2024): गांवों में 8वीं कक्षा के 30 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की हिंदी/अंग्रेजी किताब नहीं पढ़ पाते, जबकि 50 फीसदी छात्र बुनियादी गणित (भाग-गुणा) करने में असमर्थ हैं।

  • बुनियादी ढाँचे का अभाव: सरकारी समीक्षा के मुताबिक, देश के 1 लाख से अधिक स्कूलों में बिजली नहीं है, करीब 99,000 स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं हैं, और आधे सेकेंडरी सरकारी स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशालाएं (Science Labs) तक नहीं हैं

पेपर लीक और कोचिंग का बढ़ता आर्थिक बोझ

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि वर्ष 2026 की मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) में 22 लाख परीक्षार्थियों के भविष्य के साथ हुआ ‘पेपर लीक’ हादसा युवाओं के सब्र का बांध तोड़ने की मुख्य वजह बना। परीक्षा रद्द कर दोबारा कराए जाने के फैसले ने युवाओं में भारी निराशा भर दी।

इसके अलावा, गिरते स्कूली स्तर के कारण परिवारों पर प्राइवेट कोचिंग का भारी वित्तीय बोझ पड़ा है। 2017 से 2025 के बीच ट्यूशन पर होने वाला घरेलू खर्च दोगुने से ज्यादा बढ़ चुका है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की कमाई का बड़ा हिस्सा केवल कोचिंग संस्थानों की फीस में जा रहा है।

महंगी डिग्रियाँ, मगर रोजगार का ठिकाना नहीं

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की शोध रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ के हवाले से अखबार ने लिखा है कि भारत के इतिहास में आज का युवा सबसे अधिक पढ़ा-लिखा और डिजिटल रूप से जुड़ा हुआ है। लेकिन इसके बावजूद युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं।

मद्रास यूनिवर्सिटी के एक छात्र शेन एम. ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा: “आप चाहे कितनी भी लगन से पढ़ाई कर लें, यह सिस्टम आपको तोड़ देता है। डिग्री के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं, यह हमेशा एक प्रश्नचिह्न रहता है। इससे तो बेहतर है कि इंसान मवेशी चराए।”

डेमोग्राफिक डिविडेंड का घटता समय

रिपोर्ट के अंत में चेतावनी दी गई है कि 15 से 29 वर्ष की आयु वाले 36.7 करोड़ युवाओं (दुनिया का सबसे बड़ा Gen Z समूह) का यह ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) 2030 के बाद धीमा पड़ने लगेगा। यदि भारत सरकार ने अपनी शिक्षा प्रणाली में तत्काल व्यापक और गुणवत्तापूर्ण सुधार नहीं किए, तो देश की यह सबसे बड़ी ताकत एक बड़े सामाजिक-आर्थिक संकट में बदल सकती है।

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