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व्हाइट हाउस से पत्रकारों की बेदखली : क्या ट्रंप की नई पाबंदी अदालत में टिक पाएगी?

 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मीडिया के बीच लंबे समय से चला आ रहा टकराव अब एक बार फिर अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। व्हाइट हाउस ने सीएनएन, पॉलिटिको और एमएस नाउ के पत्रकारों की पहुंच रोक दी है और उनके प्रेस परिचय-पत्र वापस ले लिए हैं। तीनों मीडिया संस्थानों ने इसके खिलाफ संघीय अदालत में मुकदमा दायर कर आरोप लगाया है कि उन्हें उनकी रिपोर्टिंग के कारण दंडित किया गया और बिना किसी निर्धारित प्रक्रिया के व्हाइट हाउस से बाहर किया गया। उनका तर्क है कि यह अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन में निहित अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता तथा पांचवें संशोधन के तहत उचित प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन है। मौजूदा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अतीत में पत्रकारों की व्हाइट हाउस तक पहुंच रोकने के कई मामले अदालत पहुंचे हैं और उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित किए हैं।

ट्रंप प्रशासन का पक्ष अलग है। राष्ट्रपति ने प्रतिबंधित मीडिया संस्थानों पर गलत और पक्षपातपूर्ण खबरें देने का आरोप लगाया है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी प्रशासन का बचाव करते हुए कहा कि मीडिया संस्थानों को काम करने से नहीं रोका गया है, बल्कि उन्हें व्हाइट हाउस की विशेष पहुंच नहीं दी जा रही। यही इस विवाद का मूल कानूनी प्रश्न है—क्या व्हाइट हाउस किसी मीडिया संस्थान को प्रवेश देने या न देने का पूर्ण विवेकाधिकार रखता है, अथवा एक बार पत्रकारों के लिए प्रवेश व्यवस्था बना देने के बाद सरकार किसी संस्थान को उसके संपादकीय दृष्टिकोण या रिपोर्टिंग के कारण उससे वंचित नहीं कर सकती?

लगभग आधी सदी पुराना है कानूनी आधार

इस विवाद की जड़ें 1977 के ऐतिहासिक शेरिल बनाम नाइट मामले तक जाती हैं। ‘द नेशन’ के वाशिंगटन संवाददाता रॉबर्ट शेरिल ने व्हाइट हाउस प्रेस पास मांगा था, लेकिन सीक्रेट सर्विस ने उन्हें सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए प्रवेश देने से इनकार कर दिया। महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्हें स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया कि उनका आवेदन क्यों अस्वीकार किया गया और न ही प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।

अमेरिकी अपीली अदालत ने व्यवस्था दी कि व्हाइट हाउस तक पत्रकारों की नियमित पहुंच की व्यवस्था मौजूद होने पर प्रेस पास देने या वापस लेने की प्रक्रिया मनमानी नहीं हो सकती। सुरक्षा के वैध कारण हो सकते हैं, लेकिन संबंधित पत्रकार को कारण बताना और जवाब देने का अवसर देना आवश्यक है। यह फैसला आज भी व्हाइट हाउस प्रेस-पास विवादों का महत्वपूर्ण कानूनी आधार है।

जिम अकोस्टा प्रकरण में ट्रंप को लगा था झटका

ट्रंप के पहले कार्यकाल में 2018 में यही सवाल फिर उठा। एक संवाददाता सम्मेलन में राष्ट्रपति से तीखी बहस के बाद सीएनएन के पत्रकार जिम अकोस्टा का व्हाइट हाउस प्रेस पास निलंबित कर दिया गया। सीएनएन अदालत पहुंचा।

संघीय न्यायाधीश टिमोथी केली ने अकोस्टा का पास अस्थायी रूप से बहाल करने का आदेश दिया। अदालत का तत्काल निर्णय मुख्यतः उचित प्रक्रिया के प्रश्न पर केंद्रित था—अकोस्टा को पहले से पर्याप्त नोटिस नहीं दिया गया था और पास रद्द करने के स्पष्ट मानक तथा प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में थे। बाद में व्हाइट हाउस ने नियम बनाए और सीएनएन ने मुकदमा वापस ले लिया।

दिलचस्प बात यह है कि सीएनएन, पॉलिटिको और एमएस नाउ का वर्तमान मुकदमा भी उसी न्यायाधीश टिमोथी केली को मिला है। मौजूदा प्रतिबंध के खिलाफ अस्थायी राहत की मांग पर 23 सितंबर को सुनवाई निर्धारित है।

इसके बाद 2019 में प्लेबॉय के पत्रकार ब्रायन करेम का प्रेस पास भी व्हाइट हाउस ने निलंबित किया था। उनका व्हाइट हाउस के पूर्व अधिकारी सेबेस्टियन गोर्का से विवाद हुआ था। 2020 में अपीली अदालत ने करेम के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि उस समय लागू नियमों से पत्रकार को पर्याप्त चेतावनी नहीं मिलती थी कि इस प्रकार के आचरण के कारण उसका पास निलंबित किया जा सकता है। इस मामले ने फिर स्पष्ट किया कि पत्रकार की पहुंच सीमित करने के लिए सरकार को स्पष्ट और पूर्व निर्धारित नियमों का पालन करना होगा।

हर प्रतिबंध असंवैधानिक भी नहीं

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालतों ने पत्रकारों को व्हाइट हाउस में प्रवेश का निरपेक्ष अधिकार दे दिया है। यही अंतर समझना महत्वपूर्ण है।

बाइडेन प्रशासन के दौरान कैमरून मूल के पत्रकार साइमन अटेबा ने व्हाइट हाउस की प्रेस-पास नीति को चुनौती दी थी। व्हाइट हाउस ने ‘हार्ड पास’ के लिए निर्धारित पात्रता और मान्यता संबंधी नियम बनाए थे। अदालत ने प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया क्योंकि संबंधित मानदंड पत्रकार की खबरों या राजनीतिक दृष्टिकोण पर आधारित नहीं बल्कि सामान्य पात्रता शर्तों पर आधारित थे।

इससे एक महत्वपूर्ण सिद्धांत निकलता है—सरकार सुरक्षा, स्थान की कमी, मान्यता और पत्रकारों के आचरण के लिए तटस्थ नियम बना सकती है। विवाद तब अधिक गंभीर संवैधानिक प्रश्न बन जाता है जब किसी पत्रकार या संस्थान को इसलिए अलग किया जाए कि सरकार को उसकी रिपोर्टिंग या संपादकीय रुख पसंद नहीं है।

मेक्सिको की खाड़ीपर भी अदालत पहुंचा था विवाद

2025 में एसोसिएटेड प्रेस के साथ हुआ विवाद इसका ताजा उदाहरण है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ को ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ नाम देने का आदेश दिया था, लेकिन एसोसिएटेड प्रेस ने अपनी शैली में पुराने नाम का इस्तेमाल जारी रखा, साथ ही ट्रंप द्वारा किए गए नाम परिवर्तन का उल्लेख भी किया। इसके बाद एपी की ओवल ऑफिस और एयर फोर्स वन जैसे सीमित स्थानों वाले आयोजनों तक पहुंच प्रतिबंधित कर दी गई।

एक संघीय जिला न्यायालय ने प्रारंभिक स्तर पर एपी के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि सरकार किसी समाचार संस्था को उसकी संपादकीय अभिव्यक्ति के कारण दंडित नहीं कर सकती। लेकिन अपीली अदालत ने उस आदेश के प्रभाव पर रोक लगा दी। इसलिए एपी का मामला यह भी दिखाता है कि व्हाइट हाउस की प्रेस-पहुंच पर कानूनी स्थिति हर परिस्थिति में सरल या पूरी तरह तय नहीं है।

मौजूदा विवाद पहले से अधिक व्यापक क्यों?

सीएनएन, पॉलिटिको और एमएस नाउ का वर्तमान मामला केवल तीन संस्थानों के प्रेस पास तक सीमित नहीं रह गया है। सीएनएन उन पांच प्रमुख अमेरिकी टेलीविजन नेटवर्कों में शामिल है जो बारी-बारी से व्हाइट हाउस के ‘टेलीविजन पूल’ की जिम्मेदारी निभाते हैं। यह पूल उन कार्यक्रमों में राष्ट्रपति की तस्वीर और आवाज बाकी मीडिया तक पहुंचाता है जहां सभी पत्रकारों और कैमरों के लिए जगह नहीं होती।

सीएनएन को बाहर किए जाने के बाद एबीसी, सीबीएस, एनबीसी और फॉक्स न्यूज ने भी राष्ट्रपति के कार्यक्रमों के लिए टेलीविजन पूल कवरेज रोक दिया। परिणाम यह हुआ कि एक व्हाइट हाउस कार्यक्रम में राष्ट्रपति की स्वतंत्र टेलीविजन कवरेज उपलब्ध नहीं हो सकी और सरकारी प्रसारण पर निर्भरता बढ़ गई। इससे यह विवाद पत्रकारों की व्यक्तिगत पहुंच से आगे बढ़कर जनता तक राष्ट्रपति की स्वतंत्र दृश्य-श्रव्य कवरेज पहुंचने के सवाल से जुड़ गया है।

22 सितंबर को ट्रंप संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए न्यूयॉर्क पहुंचे तो प्रतिबंधित संस्थानों के पत्रकार संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी मान्यता-पत्रों के आधार पर वहां उनकी गतिविधियों की रिपोर्टिंग करते रहे। यानी व्हाइट हाउस का प्रतिबंध पत्रकारों को राष्ट्रपति की हर जगह रिपोर्टिंग करने से नहीं रोकता; विवाद विशेष रूप से व्हाइट हाउस परिसर और उसके नियंत्रित मीडिया प्रवेश को लेकर है।

अब अदालत के सामने असली सवाल

सीएनएन, पॉलिटिको और एमएस नाउ का आरोप है कि उनके खिलाफ कार्रवाई किसी तटस्थ सुरक्षा या पात्रता नियम के कारण नहीं, बल्कि उनकी रिपोर्टिंग से राष्ट्रपति की नाराजगी के कारण हुई। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इन संस्थानों की रिपोर्टिंग की आलोचना करते हुए प्रतिबंध का बचाव किया है। प्रशासन का तर्क है कि व्हाइट हाउस को यह तय करने का अधिकार है कि सीमित और विशेष पहुंच किसे दी जाए। अदालत को इन्हीं दोनों दावों के बीच संवैधानिक सीमा निर्धारित करनी होगी।

अतीत के फैसले एक महत्वपूर्ण भेद रेखांकित करते हैं। पत्रकार को केवल पत्रकार होने के कारण व्हाइट हाउस के प्रत्येक कमरे, कार्यक्रम या राष्ट्रपति तक असीमित पहुंच का अधिकार नहीं मिलता। सरकार सुरक्षा और व्यवस्था के लिए उचित तथा समान नियम बना सकती है। लेकिन यदि प्रवेश की स्थापित व्यवस्था मौजूद है तो किसी पत्रकार को उसकी रिपोर्टिंग या दृष्टिकोण के कारण चुनकर दंडित करना प्रथम संशोधन के तहत गंभीर संवैधानिक सवाल पैदा करता है; और बिना स्पष्ट नियम, नोटिस तथा सुनवाई की प्रक्रिया के उसका पास छीनना पांचवें संशोधन के तहत अलग सवाल खड़ा करता है।

इसीलिए यह लड़ाई केवल सीएनएन, पॉलिटिको या एमएस नाउ की नहीं है। इसका व्यापक प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में सत्ता और स्वतंत्र प्रेस के बीच दूरी कौन तय करेगा। सरकार पत्रकारों से असहमत हो सकती है, उनकी रिपोर्टिंग को गलत भी बता सकती है और तथ्यात्मक त्रुटियों का प्रतिवाद कर सकती है। दूसरी ओर पत्रकारिता भी आलोचना और जवाबदेही से परे नहीं है। लेकिन अमेरिकी अदालतों के सामने अब यह तय करने का प्रश्न है कि सरकार की मीडियाप्रवेश नियंत्रित करने की वैध शक्ति कहां समाप्त होती है और संपादकीय दृष्टिकोण के आधार पर भेदभाव की संवैधानिक मनाही कहां से शुरू होती है।

 

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