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विश्व वन्यजीव दिवस पर बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष पर चिंतन गोष्ठी

 

गोपेश्वर, 3 मार्च। विश्व वन्यजीव दिवस के अवसर पर चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र द्वारा बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष विषय पर एक चिंतन गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण, औषधीय पादपों की सुरक्षा और हिमालयी पारिस्थितिकी के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए केंद्र के प्रबंध न्यासी ओम प्रकाश भट्ट ने कहा कि इस वर्ष विश्व वन्यजीव दिवस की थीम औषधीय और सुगंधित पादपों के संरक्षण पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि हिमालय के बुग्याल क्षेत्र औषधीय पादपों से समृद्ध हैं, लेकिन वर्तमान में वे अनेक संकटों से घिरे हुए हैं। इन पादपों के संरक्षण के लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और अनियोजित पर्यटन गतिविधियों के कारण दुर्लभ वनस्पतियां खतरे में हैं। नियोजित तैयारी और जन-जागरूकता से इस संकट को कम किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक तापमान में वृद्धि और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है, जो अब सामाजिक और पर्यावरणीय समस्या का रूप लेता जा रहा है। प्रकृति के इन दो घटकों के बीच बढ़ता टकराव पर्यावरण के लिए शुभ संकेत नहीं है। समय रहते इस विषय को गंभीरता से लेकर ठोस उपाय अपनाने होंगे, ताकि भविष्य में संघर्ष की स्थिति न बने।
‘संकल्प अभियान’ के मनोज तिवारी ने कहा कि बढ़ती मानवीय गतिविधियों से प्रकृति में हो रहे बदलावों के कारण वन्यजीवों के व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहा है। जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं ने उन्हें बस्तियों की ओर रुख करने के लिए मजबूर किया है।
शैलेश मटियानी पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक डॉ. विनोद चंद्रा ने कहा कि प्रकृति में सभी जीवधारियों का अपना महत्व है और उनका अस्तित्व प्राकृतिक संतुलन के लिए आवश्यक है। मानव द्वारा प्रकृति में अनावश्यक हस्तक्षेप के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, जिनमें मानव–वन्यजीव संघर्ष भी प्रमुख है।
सुधीर चमोली ने कहा कि लगातार कटते और जलते जंगलों के कारण पारिस्थितिकी और जैव विविधता में बदलाव आ रहा है। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास घटते जा रहे हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो रही है और वन्यजीव गांवों की ओर आ रहे हैं।
इस अवसर पर केंद्र द्वारा वन्यजीव सप्ताह के तहत विद्यालयों में आयोजित भाषण और चित्रकला प्रतियोगिताओं के परिणाम भी घोषित किए गए। चित्रकला प्रतियोगिता में क्राइस्ट अकादमी, गोपेश्वर की आराध्या बिष्ट ने प्रथम, रामचंद्र भट्ट सरस्वती विद्या मंदिर की स्मिता कुंजवाल ने द्वितीय तथा सुबोध प्रेम विद्या मंदिर के वैभव जुयाल और क्राइस्ट अकादमी की वर्तिका राणा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
वीडियो भाषण प्रतियोगिता में सुबोध प्रेम विद्या मंदिर की नितिका चमोला ने प्रथम, गुरु राम राय पब्लिक स्कूल की आराध्या ने द्वितीय तथा क्राइस्ट अकादमी की आराध्या तिवारी ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
न्यास के समन्वयक विनय सेमवाल ने बताया कि प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को शीघ्र ही पुरस्कृत किया जाएगा।
रुद्रनाथ मंदिर के पुजारी आचार्य महादेव भट्ट ने बुग्यालों की बहुमूल्य जड़ी-बूटियों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इनके संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। सामाजिक कार्यकर्ता मंगला कोठियाल ने हिमालयी औषधीय पादपों के सांस्कृतिक और आजीविका संबंधी पहलुओं पर विस्तार से विचार रखते हुए कहा कि हमारी परंपराओं में इन पादपों को देवत्व से जोड़ा गया है। गांवों से निकलने वाली देव डोलियां और यात्राएं औषधीय पादपों की पूजा-अर्चना के बाद ही प्रारंभ होती हैं। उन्होंने बताया कि प्राण प्रतिष्ठा में 108 से अधिक पादपों का उपयोग किया जाता था, जिनमें से कई अब लुप्त हो चुके हैं। समय रहते इनके संरक्षण के प्रयास आवश्यक हैं, ताकि हमारी समृद्ध परंपरा और जैव विविधता दोनों सुरक्षित रह सकें।
पशुपालन अधिकारी चमोला ने कहा कि जैव विविधता का संरक्षण उसके पारंपरिक आवास में ही प्रभावी ढंग से संभव है। इसके लिए व्यवहारिक और क्षेत्र-विशेष आधारित योजनाएं बनाई जानी चाहिए।

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