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संवैधानिक पदों पर अविश्वास: लोकतंत्र कठघरे में

The recent  motions against the Speaker and the Chief Election Commissioner (CEC) highlight a deepening trust deficit in India’s constitutional pillars. While the CEC may survive the parliamentary vote through numerical strength, the true challenge lies in reclaiming public confidence. By bypassing the Supreme Court’s recommendation to include the Chief Justice in the selection process, the 2023 Appointment Act has prioritized executive dominance over institutional autonomy. Ignoring decades of expert committee recommendations, this shift threatens the ‘perceived neutrality’ essential for a vibrant democracy. Ultimately, the Election Commission’s legitimacy is validated not by legislative numbers, but by the voters’ unwavering faith.

 

जयसिंह रावत

लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव की गूँज अभी थमी भी नहीं थी कि संयुक्त विपक्ष अब मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के खिलाफ निष्कासन प्रस्ताव ले आया है। इस प्रस्ताव का हश्र भी संभवतः वही होने जा रहा है जो स्पीकर के मामले में हुआ था—संख्याबल के कठोर गणित के आधार पर इसे भी सदन में गिरा दिया जाएगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त संसद में बहुमत का विश्वास तो हासिल कर लेंगे, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या निर्वाचन आयोग देश की जनता का वह नैतिक विश्वास भी पुनः प्राप्त कर पाएगा, जो एक स्वतंत्र लोकतंत्र की पहली शर्त है?

यह प्रश्न प्रस्ताव के गिरने के बाद भी भारतीय लोकतंत्र के गलियारों में प्रतिध्वनित होता रहेगा। दरअसल, यह विवाद अब केवल किसी एक संवैधानिक पदाधिकारी की कार्यशैली या व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं रह गया है। यह उस संवैधानिक ढांचे की अग्निपरीक्षा है जिसे हमारे दूरदर्शी संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए एक ‘पवित्र आधारशिला’ के रूप में तैयार किया था। विश्वास की मर्यादा पर उपजा यह संकट हमारी राजनीतिक व्यवस्था को तो विचलित कर ही रहा है, साथ ही इसने स्वयं लोकतंत्र को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है।

संविधान सभा की दृष्टि और निष्पक्षता की कसौटी

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग की स्थापना एक ऐसी स्वायत्त शक्ति के रूप में की गई थी, जो किसी भी प्रकार के बाहरी या राजनीतिक दबाव से मुक्त हो। संविधान सभा की बहसों में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बड़ी स्पष्टता से चेतावनी दी थी कि यदि चुनाव कराने वाली संस्था कार्यपालिका (सरकार) के प्रभाव में रही, तो निष्पक्ष चुनाव का सपना कभी साकार नहीं हो पाएगा। इसी दूरदर्शिता के कारण चुनावों के संचालन की जिम्मेदारी किसी सरकारी मंत्रालय को देने के बजाय एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय को सौंपी गई।

निर्वाचन आयोग का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण उसकी ‘निष्पक्षता’ है। निष्पक्षता केवल उसके निर्णयों में होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि वह धरातल पर दिखनी भी चाहिए। कानून की भाषा में इसे ‘न्याय का सिद्धांत’ कहते हैं—न्याय होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। दुर्भाग्यवश, हाल के वर्षों में आयोग के कामकाज और विपक्षी दलों की शिकायतों के निवारण में जो अंतर दिखाई दिया है, उसने इस ‘दिखने वाली निष्पक्षता’ पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

निष्कासन की जटिल प्रक्रिया: स्वतंत्रता का कवच

संविधान निर्माताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखने के लिए उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर अत्यंत कठिन बनाया। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, उन्हें केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस रीति से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन) अनिवार्य है। यह प्रावधान इसलिए किया गया था ताकि कोई भी सत्ताधारी दल अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार आयुक्त पर दबाव न बना सके और वे निर्भय होकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें। लेकिन आज इसी सुरक्षा कवच का उपयोग सत्ता पक्ष के ‘ढाल’ के रूप में होने लगा है, जिससे विपक्ष की आवाज दब जाती है।

संस्थागत विकास और 2023 का विवादित कानून

समय के साथ निर्वाचन आयोग एक-सदस्यीय से बहु-सदस्यीय संस्था बना और 1993 से यह तीन सदस्यीय स्वरूप में कार्य कर रहा है। ईवीएम (EVM) का आगमन और आदर्श आचार संहिता की सख्ती ने आयोग को शक्तिशाली तो बनाया, लेकिन साथ ही इसकी पारदर्शिता पर बहस भी तेज हुई।

मौजूदा टकराव की मुख्य जड़ ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ है। इस कानून की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ मामले में एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होंगे।लेकिन सरकार ने इसके विपरीत जो नया कानून बनाया, उसमें मुख्य न्यायाधीश का स्थान हटाकर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को दे दिया गया। अब चयन समिति में दो सदस्य सरकार के (प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित मंत्री) और केवल एक सदस्य विपक्ष का है। इस संशोधन के चलते चयन समिति में प्रतिपक्ष के नेता की उपस्थिति महज ‘औपचारिक’ या ‘खानापूरी’ बनकर रह गई है। जब बहुमत सरकार के पास है, तो वह जिसे चाहेगी उसे मुख्य निर्वाचन आयुक्त या आयुक्त बनाएगी।

यह एक कटु सच्चाई है कि कोई भी सरकार टी.एन. शेषन जैसा ‘अक्खड़’ और ‘स्वाभिमानी’ मुख्य निर्वाचन आयुक्त क्यों बनाना चाहेगी? सामान्यतः रिटायरमेंट के बाद जिन नौकरशाहों का पुनर्वास आयोग में होता है, उनके लिए सरकार एक ‘नौकरी प्रदाता’ की भूमिका में होती है। कृतज्ञता के इस भाव में ‘अहसानफरामोशी’ करने का साहस बहुत कम अधिकारी जुटा पाते हैं।

चुनाव सुधारों की सिफारिशें और उनकी अनदेखी

भारत में चुनाव सुधारों की यात्रा दशकों पुरानी है, लेकिन विडंबना यह है कि इस संबंध में बनी विभिन्न विशेषज्ञ समितियों की महत्वपूर्ण सिफारिशें आज भी सत्ता के गलियारों में ठंडे बस्ते की शोभा बढ़ा रही हैं। यदि हम इतिहास के झरोखे से देखें, तो वर्ष 1990 की दिनेश गोस्वामी समिति ने अपनी रिपोर्ट में पुरजोर तरीके से यह सिफारिश की थी कि निर्वाचन आयोग की शुचिता और स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए उसकी चयन प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए। इसके वर्षों बाद, 2015 में न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अध्यक्षता वाले विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट ने भी इसी विचार को पुष्ट करते हुए सुझाव दिया था कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश के रूप में तीन सदस्य होने चाहिए। विधि आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि जब तक चयन प्रक्रिया से ‘कार्यपालिका का वर्चस्व’ कम नहीं होगा, तब तक आयोग की पूर्ण स्वतंत्रता केवल एक कागजी दावा ही बनी रहेगी। यहाँ तक कि वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाले द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने भी नियुक्तियों के लिए एक पारदर्शी ‘कॉलेजियम प्रणाली’ की वकालत की थी ताकि राजनीतिक हितों का टकराव टाला जा सके।

दुर्भाग्यवश, वर्ष 2023 में संसद द्वारा पारित नए कानून ने इन तमाम विशेषज्ञ समितियों और विधिक आयोगों की मूल भावना को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। जब नियुक्ति की प्रक्रिया ही एकतरफा या सत्ता के प्रभाव में झुकी हुई दिखाई देने लगे, तो उस दोषपूर्ण प्रक्रिया से चुनकर आए व्यक्ति की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में संस्थानों की मर्यादा केवल कानून से नहीं, बल्कि उनके प्रति जन-सामान्य के अटूट विश्वास से तय होती है, जिसे वर्तमान विधायी बदलावों ने गहरी चोट पहुँचाई है।

संसदीय रणनीति और विश्वसनीयता का संकट

संसद में लाया गया निष्कासन प्रस्ताव केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विपक्ष की सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। विपक्ष भली-भांति जानता है कि संख्याबल उनके पक्ष में नहीं है, परंतु इस प्रस्ताव के बहाने वे आयोग की कार्यप्रणाली पर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ना चाहते हैं। संसदीय चर्चा के दौरान दिए गए तर्क, तथ्य और साक्ष्य भविष्य के लिए एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाते हैं। यह प्रक्रिया जनता के मानस पटल पर यह संदेह अंकित करने का प्रयास है कि क्या रेफरी (आयोग) वास्तव में निष्पक्ष है? टी.एन. शेषन के दौर में निर्वाचन आयोग ने जो साख और धाक जमाई थी, उसने दुनिया भर में भारतीय चुनाव प्रणाली का लोहा मनवाया। शेषन ने दिखाया था कि निर्वाचन आयुक्त केवल एक पद नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी है। आज जब उसी संस्था पर पक्षपात के आरोप लगते हैं, तो यह केवल एक विभाग की हार नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास है।

लोकतंत्र की अंतिम कसौटी: जनता का भरोसा

लोकतंत्र केवल मतदान की एक तकनीकी प्रक्रिया या पाँच साल में होने वाला उत्सव नहीं है; यह उन संस्थाओं पर अडिग भरोसे का नाम है जो उस प्रक्रिया की पहरेदार हैं। यदि आयोग राजनीतिक दबाव में दिखेगा, तो चुनाव की पवित्रता संदिग्ध होगी। वहीं, दूसरी ओर यदि हर छोटे विवाद पर संवैधानिक संस्थाओं को निराधार तरीके से कठघरे में खड़ा किया जाएगा, तो जनता का व्यवस्था से भरोसा ही उठ जाएगा। यहाँ जिम्मेदारी द्विमुखी है। सत्ता पक्ष को चाहिए कि वह नियुक्ति प्रक्रिया में उच्च स्तर की पारदर्शिता लाए और सर्वोच्च न्यायालय की भावना का सम्मान करे। वहीं, विपक्ष का दायित्व है कि वह केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि ठोस प्रमाणों के आधार पर ही सवाल उठाए। अंततः, संसद के भीतर होने वाली जीत-हार अपनी जगह है, लेकिन मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयोग की वास्तविक परीक्षा संसद की मेजों की थपथपाहट से नहीं, बल्कि देश के करोड़ों मतदाताओं की उन आँखों से होगी जो न्याय और निष्पक्षता की उम्मीद में इस संस्था की ओर देखती हैं। यदि वह विश्वास एक बार खंडित हुआ, तो भारतीय लोकतंत्र का भविष्य अनिश्चितता और अविश्वास के गहरे अंधेरे में डूब जाएगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संस्थाएँ व्यक्तियों से नहीं, अपनी विश्वसनीयता से बड़ी होती हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कई पुस्तकों के लेखक हैं साथ ही  इस न्यूज़ पोर्टल के संपादक मंडल से मानद सदस्य भी हैं, लेकिन लेख में प्रकट विचारों से एडमिन का सहमत होना जरुरी नहीं हैं..एडमिन)

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