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टीएमयू में पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यू.यू. ललित का प्रेरक संवाद

मुरादाबाद, 3 अप्रैल। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (टीएमयू), मुरादाबाद के ऑडिटोरियम में “फ्रॉम कोर्टरूम टू नेशन बिल्डिंग: लीडरशिप लेसन फ्रॉम द ज्यूडिशरी” विषय पर लीडरशिप टॉक सीरीज (सेशन-18) का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर टीएमयू के कुलपति प्रो. वी.के. जैन, डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन, कॉलेज ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज के डीन प्रो. हरबंश दीक्षित सहित अन्य गणमान्य मौजूद रहे। बाद में प्रशासनिक भवन में मुख्य अतिथि का विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा बुके और स्मृति चिन्ह भेंट कर स्वागत किया गया। टीएमयू के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन और एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन ने भी उन्हें सम्मानित किया।
अपने संबोधन में न्यायमूर्ति ललित ने कहा कि न्यायपालिका केवल न्याय देने का माध्यम नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की संरक्षक और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति भी है। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने लोकतंत्र को मजबूत करने और समावेशी विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करें, नैतिक नेतृत्व अपनाएं और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाएं। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के समय देश आर्थिक कमजोरी, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और सामाजिक असमानताओं जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा था, लेकिन संविधान और न्यायपालिका ने देश को समानता और विकास की दिशा में आगे बढ़ाया।
न्यायमूर्ति ललित ने संविधान के अनुच्छेद 31ए, 31बी और 31सी का उल्लेख करते हुए कहा कि इन प्रावधानों ने भूमि सुधार और जनकल्याणकारी नीतियों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या का जिक्र करते हुए बताया कि इसे गरिमापूर्ण जीवन, स्वच्छ पर्यावरण और पशु संरक्षण से भी जोड़ा गया है।
उन्होंने आर्थिक सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीयकरण से उदारीकरण तक की यात्रा ने भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में उन्होंने दिल्ली में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को सीएनजी में परिवर्तित करने के न्यायालयीय निर्देश का उदाहरण भी दिया।
तीन तलाक कानून पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इसे असंवैधानिक घोषित करने से मुस्लिम महिलाओं को न्याय, सम्मान और समान अधिकार प्राप्त हुए हैं, जिससे उनकी सामाजिक भागीदारी और सशक्त हुई है। उल्लेखनीय है कि इस निर्णय देने वाली पांच सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति ललित भी शामिल थे।
उन्होंने कहा कि प्राथमिक स्तर तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया जाना लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। शिक्षा में निजी संस्थानों की भागीदारी से अवसरों का विस्तार हुआ है और विद्यार्थियों को बेहतर संसाधन मिल रहे हैं।
कार्यक्रम में प्रो. एम.पी. सिंह, प्रो. नवनीत कुमार, प्रो. सुशील सिंह, डॉ. अमित कंसल सहित विभिन्न संकायों के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। टॉक सीरीज के दौरान विद्यार्थियों ने न्यायमूर्ति ललित से सवाल भी पूछे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. नेहा आनंद ने किया।
इस अवसर पर एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों से मुख्य अतिथि को अवगत कराया।

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